- सरकारी अस्पतालों पर आम लोगों का भरोसा बढ़ाने के लिए सीएम नीतीश कुमार का कदम।
पटना |
बिहार में जल्द सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर बैन लगाने के लिए पॉलिसी तैयार हो जाएगी। बीते मंगलवार (27 जनवरी) को स्वास्थ्य विभाग ने नीति तैयार करने के लिए एक हाईलेवल कमेटी का गठन कर दिया है। गौरतलब है कि समृद्धि यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसको लेकर घोषणा की थी और कहा था कि निजी प्रैक्टिस बंद कराने की पॉलिसी से आम जनता को लाभ होगा क्योंकि तब सरकारी डॉक्टरों की अस्पतालों में उपलब्धता बढ़ेगी।
विशेष सचिव (स्वास्थ्य) हिमांशु शर्मा की ओर से 27 जनवरी को जारी आदेश में जो समिति बनाई गई है, उसमें सात सदस्य हैं। इस कमेटी की अध्यक्ष डॉ. रेखा झा होंगी जो बिहार स्वास्थ्य सेवाओं की निदेशक-प्रमुख (नर्सिंग एवं रोग नियंत्रण) हैं। समिति के सदस्यों में पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (पीएमसीएच) के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट, नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (एनएमसीएच) के प्राचार्य, बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ के अध्यक्ष डॉ. केके मणि, महासचिव डॉ. रोहित कुमार और इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आईजीआईएमएस) के नेत्र रोग विभाग के अध्यक्ष और प्रोफेसर डॉ. विभूति प्रसन्न सिन्हा शामिल हैं।
इन मॉडलों पर विचार कर सकती है समिति
द हिन्दुस्तान टाइम्स ने अधिकारियों के हवाले से कहा है कि यह समिति पॉलिसी बनाने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर) के मॉडल की जांच कर सकती है। इन संस्थानों में निजी प्रैक्टिस पर पूर्ण प्रतिबंध है और डॉक्टरों को गैर-प्रैक्टिसिंग भत्ता (NPA) के रूप में मुआवजा दिया जाता है जो आमतौर पर उनके मूल वेतन का 20% तक होता है। यह कदम इन संस्थानों में मरीजों को गुणवत्तापूर्ण देखभाल सुनिश्चित करने के लिए किया गया है। इसी तरह पटना का IGIMS भी डॉक्टरों को निजी प्रैक्टिस नहीं करने देता और उन्हें NPA देता है।
पॉलिसी का क्या फायदा होगा ?
अगर प्राइवेट प्रैक्टिस बैन करने की नीति ठीक ढंग से लागू होती है तो सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए लंबे इंतजार की सूरत बदलेगी। अस्पतालों में डॉक्टरों की गैरमौजूदगी और रेफरल सिस्टम की मनमानी पर काफी हद तक लगाम लग सकती है।

