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कैसे समृद्ध बनेगा बिहार? हर 100 में से 72 रुपये के लिए हम केंद्र के भरोसे, CAG Report में खुलासा

नीतीश कुमार 9 बार सीएम बन चुके हैं और इस बार भी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और अप्रत्याशित जीत मिली।

नीतीश कुमार 9 बार सीएम बन चुके हैं और इस बार भी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और अप्रत्याशित जीत मिली।

पटना |
नीतीश कुमार की सरकार लगातार कहती आ रही है कि वे विकसित बिहार बनाएंगे, पर सच्चाई यह है कि अब भी बिहार सबसे गरीब राज्य है और आत्मनिर्भरता से कोसों दूर है। इसी बात की तस्दीक CAG (कैग) की रिपोर्ट में हुई है जो 26 फरवरी को विधानसभा में पेश की गई। रिपोर्ट बताती है कि बिहार सरकार के पास आने वाले कुल रुपये (₹1,72,688 करोड़) में से 72.12% हिस्सा केंद्र सरकार से मिला है। आसान भाषा में कहें तो बिहार को चलाने के लिए लगने वाले हर 100 रुपये में से ₹72 केंद्र से आते हैं। इतने पर भी सरकार में भ्रष्टाचार इतना है कि 70.8 हजार करोड़ रुपये के खर्च का लेखा-जोखा गायब है।

1- 72.12% बजट के लिए केंद्र पर निर्भर 

बिहार की समृद्धि के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा इसकी अत्यधिक निर्भरता है। 2022-2023 में सरकार के पास आए कुल रुपये (₹1,72,688 करोड़) में से 72.12% हिस्सा केंद्र सरकार से मिला है। राज्य का अपना राजस्व (Internal Revenue) मात्र ₹48,152 करोड़ है। यानी ₹1,24,536 रुपये केंद्र ने दिए। समझा जा सकता है कि बड़े विकास कार्यों के लिए बिहार को केंद्र की मदद पर निर्भर रहना पड़ा। 

2. भारी-भरकम खर्च का हिसाब नहीं

CAG ने रिपोर्ट में सरकारी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। राज्य सरकार ने 2022-23 में ₹70,877 करोड़ खर्च तो कर दिए, लेकिन अभी तक इनका ‘उपयोगिता प्रमाण पत्र’ (UC) जमा नहीं किया गया है। यानी इस खर्च की रसीद व वाउजर कैग को नहीं सौंपे गए। जब इतने भारी बजट के खर्च का पारदर्शी हिसाब नहीं होगा, तो भ्रष्टाचार की आशंका बनी रहती है और केंद्र से मिलने वाली अगली किस्तों में भी देरी होती है।

3. राजस्व वसूली में सुस्ती से कमाई घटी 

भ्रष्ट नेता व अफसरों के चलते सरकार के खाते में राजस्व कमाई नहीं पहुंच रही। 2022-23 में राज्य के सभी विभागों को राजस्व के रूप में जनता और संस्थाओं से लगभग ₹4,884 करोड़ वसूलने थे, जो पेडिंग हैं। इसमें से ₹1,430 करोड़ तो ऐसे हैं जो पिछले 5 साल से भी ज्यादा समय से अटके हुए हैं। परिवहन और खनन जैसे प्रमुख विभागों में करोड़ों की टैक्स वसूली पेंडिंग है।

4. आधी सरकारी कंपनियां ‘सफेद हाथी’

बिहार की कई सरकारी कंपनियां सफेद हाथी साबित हो रही हैं। 37 सरकारी कंपनियों (SPSEs) में से सिर्फ 18 ही मुनाफे में हैं। बाकी कंपनियां भारी घाटे में चल रही हैं, जिसका कुल बोझ ₹27,307 करोड़ तक पहुंच गया है। 

5. बिहार पर GSDP के 39% हिस्से का कर्ज 

कैग रिपोर्ट से पता लगा है कि साल 2022-23 में बिहार की कुल देनदारियां (कर्ज) ₹2.88 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान था। यह बिहार की कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का लगभग 38.66% था। 

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धीमी गति से सुधार : मात्र ₹5 रुपये की निर्भरता घटी

साल 2021-22 के CAG और बजट विश्लेषण के मुताबिक, तब बिहार अपने हर सौ रुपये में से 78 रुपये के लिए केंद्र सरकार पर निर्भर था। एक साल बाद यानी 2022-23 में यह निर्भरता मात्र पांच रुपये कम हुई है, यह बेहद धीमी गति है। उस पर भी 70.8 हजार करोड़ रुपये के खर्च का कोई हिसाब नहीं दिया गया है।
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कैसे बदलेगी तस्वीर?

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