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नतीजों से पहले मैसेजिंग: JDU दफ्तर में पोस्टर लगा- ‘टाइगर अभी जिंदा है’

पटना में नीतीश कुमार को लेकर ये पोस्टर काउंटिंग से एक दिन पहले लगाए गए हैं।

पटना में नीतीश कुमार को लेकर ये पोस्टर काउंटिंग से एक दिन पहले लगाए गए हैं।

पटना | हमारे संवाददाता

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आने में अब कुछ ही घंटे बचे हैं, लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने अभी से अपनी-अपनी मैसेजिंग तेज कर दी है। एग्ज़िट पोल में एनडीए को भारी बढ़त मिलने के बाद जदयू और बीजेपी दोनों में जश्न का माहौल दिख रहा है, जबकि आरजेडी अभी भी साफ दावा कर रही है कि सरकार वही बनाबाएगी।

 

JDU के पोस्टर से सीएम की सक्रियता का संदेश 

सबसे बड़ा संदेश 20 साल से बिहार के सीएम को लेकर देने की कोशिश हुई है क्योंकि उनकी सेहत को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। जदयू दफ्तर के बाहर एक बड़ा पोस्टर लगाया गया है, जिसमें नीतीश कुमार की तस्वीर के साथ लिखा है, “टाइगर अभी ज़िंदा है।

पोस्टर में आगे नीतीश कुमार को दलित, महादलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा और स्वर्ण–अल्पसंख्यक का संरक्षक बताया गया है।

यह पोस्टर जदयू नेता और मंत्री रणजीत सिंह ने लगाया है। एग्जिट पोल में जदयू के मजबूत पार्टी बनने के संकेत से कार्यकर्ता बेहद उत्साहित हैं।

 

BJP दफ्तर में भी तैयारी- पोस्टर, नारे और लड्डू

पटना के बीजेपी कार्यालय में भी हलचल बढ़ गई है। यहां बड़े-बड़े पोस्टर लगे हैं, “जंगलराज नहीं चाहिए”, “नरेंद्र–नीतीश भाई-भाई”

कुछ जगहों पर कार्यकर्ताओं ने लड्डू भी बनवाने शुरू कर दिए हैं, संकेत साफ है – बीजेपी एग्जिट पोल को ट्रेंड मानकर खुश है।

 

RJD का पलटवार-“18 नवंबर को शपथ मैं ही लूंगा”

भले ही राजद ने कोई पोस्टर नहीं लगाया, लेकिन तेजस्वी यादव ने कल प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा, “लिखकर रख लीजिए… 18 नवंबर को महागठबंधन की सरकार आ रही है और मैं शपथ लूंगा।”

RJD और कांग्रेस एग्जिट पोल को मनगढ़ंत और पक्षपाती बता रहे हैं।

 

सपा ने पोस्टर लगाया – अलविदा चाचा 

बिहार में सपा के यूथ विंग ने भी एक पोस्टर लगाया है, जिसमें नीतीश के पोस्टर के आगे लिखा है- “अलविदा चाचा”। हालांकि महागठबंधन के बाकी दलों ने कोई पोस्टर नहीं लगाया है।

 

अब सबकी निगाहें कल पर

पोस्टरों की जंग, बयानबाज़ी और तैयार होती मिठाइयों ने माहौल पहले से ही चुनावी बना दिया है। अब देखना है कि कल नतीजों में किसका दावा सही साबित होता है – एनडीए का विश्वास या महागठबंधन का भरोसा?

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