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नीतीश कुमार ने चिराग पासवान को बैकफुट पर धकेला, 24 घंटे में राजनीति बदल दी

नीतीश कुमार

पटना | हमारे संवाददाता

बिहार की राजनीति हमेशा से उलटफेरों से भरी रही है, लेकिन हाल ही के 24 घंटों में जो ड्रामा हुआ, उसने साबित कर दिया कि नीतीश कुमार अभी भी ‘टाइगर’ हैं और बिहार की सियासत की बादशाहत उनके हाथों में ही रहेगी। यह कहानी शुरू होती है चिराग पासवान की महत्वाकांक्षा से, जो दिल्ली से बैठकर बिहार की राजनीति को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन नीतीश कुमार ने अपनी चतुर रणनीति से सब कुछ पलट दिया। आइए क्रम से समझते हैं क्या हुआ और इसका क्या मतलब है।

सबसे पहले बात सीट बंटवारे की। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए NDA गठबंधन में सीटों का बंटवारा चल रहा था। चिराग पासवान की LJP को कई महत्वपूर्ण सीटें मिल गई थीं, जैसे राजगीर, हिलसा, तारापुर, राजा पाकड़, गायघाट और रत्नेश सदा और मांझी वाली सीटें। ये वो सीटें थीं, जहां पर नीतीश कुमार की JD(U) की मजबूत पकड़ थी।

दरअसल, चिराग को ये सीटें देकर बीजेपी की रणनीति थी कि नीतीश को कमजोर किया जाए, उनका स्ट्राइक रेट 25-30 तक गिराया जाए और चुनाव बाद उन्हें साइडलाइन कर दिया जाए। साथ ही, नीतीश के वफादारों जैसे समता पार्टी के लोगों को टिकट से दूर रखने की कोशिश थी, ताकि नए चेहरे सामने आएं।

लेकिन नीतीश कुमार ने यहां अपनी चाणक्य वाली चाल चली। उन्होंने 9 सीटों पर जोरदार आपत्ति जताई। सोमवार की रात से मंगलवार की सुबह ढ़ेर सारी अफवाहें फैलीं – जैसे नीतीश की RJD से बात चल रही है, संजय यादव की मुलाकात हुई, कांग्रेस से डील हो रही है। ये खबरें प्लांटेट थी या कुछ इसमें सच्चाई भी थी, जो JD(U) की रणनीति का हिस्सा थीं। इससे बीजेपी में बेचैनी बढ़ गई। मुख्यमंत्री आवास पर भुंजा पार्टी वाले लोगों की एंट्री रोक दी गई और बातचीत रुक गई। नतीजा? नीतीश की मांग मान ली गई। उन 9 में से 8 सीटें JD(U) को वापस मिल गईं।

अब चिराग के पास वो सीटें बची हैं, जहां उन्हें सीधे RJD से मुकाबला करना पड़ेगा, जैसे मनेर, राघोपुर और अन्य मजबूत RJD गढ़। इस घटनाक्रम का विश्लेषण करें तो साफ है कि नीतीश ने न सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, बल्कि विरोधियों को एहसास दिलाया कि ‘टाइगर अभी जिंदा है’।

दरअसल, चिराग, जो खुद को हनुमान समझकर दिल्ली से बिहार चलाने चले थे, अब ‘छबे बनने दुबे बनकर लौट आए’। उनकी रणनीति फेल हो गई। नीतीश ने अपने वफादारों को टिकट। इससे JD(U) की एकजुटता मजबूत हुई।

बिहार की सियासत में एक पुरानी सच्चाई है: नीतीश कभी नहीं चाहेंगे कि लालू यादव (RJD) खत्म हो जाएं, और लालू नहीं चाहेंगे कि नीतीश कमजोर हों। दोनों एक-दूसरे की जरूरत हैं, ताकि बीजेपी हावी न हो। इस ड्रामे से नीतीश ने उन अफवाहों को भी खारिज कर दिया कि वे मानसिक रूप से कमजोर हो गए हैं या उनकी क्षमता घट गई है। चुनाव से पहले उन्होंने मजबूती से अपनी पकड़ दिखाई।

अब सवाल ये है कि चिराग क्या करेंगे? क्या वे RJD के गढ़ में जीत पाएंगे? या ये नीतीश की अंतिम चाल होगी? कुल मिलाकर, ये घटना साबित करती है कि बिहार में नीतीश जैसा कोई दूसरा नहीं। वे बाजीगर हैं, जो आखिरी पल में सब पलट देते हैं। जल्द ही किसी मंच पर पीएम मोदी के साथ उनकी साझेदारी फिर मजबूत नजर आएगी, लेकिन नीतीश की बादशाहत बरकरार रहेगी। बिहार चुनाव अब और दिलचस्प हो गया है।

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