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विधान परिषद की सदस्यता छोड़ी पर CM पद क्यों नहीं, क्या है नीतीश कुमार की रणनीति?

नीतीश कुमार बिहार में बीस साल से सत्ता में हैं और दसवीं बार मुख्यमंत्री की शपथ 20 नवंबर को ली थी।

नई दिल्ली | नीतीश कुमार ने सोमवार (30 march) को बिहार विधान परिषद से इस्तीफा देकर अपनी राज्यसभा सदस्यता बचा ली है।

लेकिन साथ ही उन्होंने एक और राजनीतिक दांव खेलते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया।

यानी भले वे अब बिहार विधानसभा के किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं लेकिन नियम के हिसाब से अगले 6 महीने तक इस तरह भी मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं।

दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य रहे 6 महीने तक मुख्यमंत्री रह सकता है।

हालांकि यह भी अटकलें हैं कि वे 14 अप्रैल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं।

बिहार की राजनीति में खरमास के समय राजनेताओं के शुभ काम न करने का चलन रहा है, खरमास इसी तारीख को खत्म हो रहा है।

उधर, नीतीश कुमार के इस्तीफा देते ही उनके करीबी मंत्री अशोक चौधरी भावुक हो गए। पूरे बिहार में जदयू कार्यकर्ताओं के बीच निराशा देखी जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सीएम पद न छोड़ना नीतीश कुमार की एक सोची-समझी रणनीति है। वे अपने समर्थकों को संदेश देना चाहते हैं कि वे अपनी शर्तों पर विदा हो रहे हैं।

उधर, जदयू से जुड़े बाहुबली नेता आनंद मोहन ने हाल में कहा कि नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के फैसले से कार्यकर्ताओं में भगदड़ है। साथ ही चेताया कि नीतीश को दिल्ली भेजने के इस षडयंत्र का नुकसान भाजपा को भी होगा।

बता दें कि नीतीश कुमार लंबे समय से विधान परिषद के सदस्य बनकर विधानसभा में पहुंचते रहे हैं। उन्होंने आखिरी बार 1985 में हरनौत सीट से विधान सभा का चुनाव लड़ा था। आगामी 10 अप्रैल को वे राज्यसभा सदस्य पद की शपथ लेंगे।

 

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