- जहानाबाद का पंडुई गांव 19वीं सदी की जमींदारी का गवाह।
- यहां की जमींदारी में आते थे 110 गांव, हाथी-घोड़ों का हुजूम था।
- जर्जर हो चुके इस जगह के ऐतिहासिक भवनों को सहेजने की मांग।
जहानाबाद | शिवा केसरी
19वीं सदी में बिहार के जहानाबाद जिले के पंडुई में जमींदारी का दौर था, जहां की विरासत संरक्षण के अभाव में अब जर्जर भवनों में तब्दील हो चुकी है। जहानाबाद शहर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर बसा पंडुई महल इसी विरासत का मूक गवाह है।
एक जमाने में यहां रियासतें चलती थीं। आवाम के मसलों को सुलझाने के लिए मजिस्ट्रेट इस जगह पर बैठकर अदालत चलाते थे। फिर यहां जब अंग्रेजी शासनकाल आया तो इस जगह पर अंग्रेजी सैनिकों की टुकड़ियां आना-जाना करती थीं। यही वजह रही कि पंडुई जमींदारों का गढ़ माना गया और इसे आज भी लोग पंडुई स्टेट या ‘पंडुई राज’ के नाम से जानते हैं।
पंडुई रियासत मुख्य रूप से भूमिहार ब्राह्मण (भूमिहार) जमींदारों की थी, जो बिहार में मुगल और ब्रिटिश काल में प्रभावशाली रहे। पंडुई के जमींदारों ने 110 गांवों पर शासन किया, जहां कृषि, कर वसूली और स्थानीय न्याय व्यवस्था उनके हाथ में थी।
यह ब्रिटिश काल में सैनिक गतिविधियों का केंद्र बना। जमींदारी उन्मूलन (1950) के बाद रियासतें समाप्त हो गईं और महल जर्जर हो गया। गौरतलब है कि 18वीं व 19वीं सदी में जहानाबाद, तत्कालीन गयाराज जिले का हिस्सा था। यहां जमींदारी प्रथा ‘परमानेंट सेटलमेंट’ (1793) के तहत ब्रिटिशों द्वारा स्थापित की गई थी।
मुगल काल में भू-राजस्व प्रणाली से शुरू हुई जमींदारी ब्रिटिशों ने मजबूत की, जहां जमींदारों को राजस्व वसूलने का अधिकार मिला और बदले में वे ब्रिटिशों को निष्ठा दिखाते थे।
पंडुई में जमींदार वामदेव प्रसाद ने यहां महल बनवाया था जो 200 साल पुरानी धरोहर है, जो मुगल-ब्रिटिश वास्तुकला का मिश्रण दिखाती है। इसकी सुरक्षा के लिए जमींदार ने 6 एकड़ पर चहारदीवारी तक बनवाई। यहां नक्काशीदार दीवारें, बड़े हॉल और बरामदे हैं।
इतिहासकारों के अनुसार, ऐसे महल बिहार की सामंती व्यवस्था के प्रतीक हैं, जहां हाथी-घोड़ों की सेना और दरबार लगते थे। इस महल में कभी दरबारियों और घोड़े-हाथियों का हुजूम रहता था। पहले के राजा-महाराजा के महलों जैसी इस भवन की नक्काशी आज भी लोगों को अपनी खूबसूरती की ओर आकर्षित करती है। इस इमारत को आज भी देखने लोग पहुंचते हैं।
यह भवन यूं तो ऐतिहासिक धरोहर है पर इसे अब तक ऐसा दर्जा नहीं दिया गया। रंग-रोगन के अभाव में महल की रौनक फीकी हुई है। फिर भी यह इमारत बुलंद है। पंडुई महल के अंदर 4 हॉल और कई कमरे हैं। महल के चारों तरफ बस्ती बनी हुई है। यहां प्रवेश करने के लिए चारों ओर से दरवाजा बना है।
इतना ही नहीं महल के अंदर बैठने के लिए चारों तरफ बरामदा भी बना हुआ है। जमींदार वामदेव प्रसाद ने महल की सुरक्षा के खातिर 6 एकड़ जमीन पर चहारदीवारी का निर्माण करवाया था। हालांकि, वो टूट चुकी थी, लेकिन नई पीढ़ी के लोगों ने फिर से इसका निर्माण करवाया है। इतना ही नहीं इस महल के पश्चिमी छोर पर एक बड़ा सा तालाब है, जो पंडुई महल को खूबसूरत बनाने का काम करता है। परिवार के लोग आज भी इस महल के अंदर रहते हैं।
पंडुई जहानाबाद का छोटा-सा गांव है। यह शहर से चंद किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचना भी काफी आसान है। भले ही यहां के जमींदार अपनी जमीन बेचकर बाहर चले गए हों, लेकिन यहां की बिल्डिंग आज भी उस जमींदारी का गवाह बनकर सामने है। स्थानीय लोग व जिले के गणमान्य लोगों की मांग है कि पंडुई महल को सरकार संरक्षित करे।
इस जगह पर आज भले ही सन्नाटा पसरा हुआ है, लेकिन एक वक्त ऐसा था जब यहां की जमींदारी में 110 गांव आया करते थे। यह इमारत अंग्रेजी सैनिकों की तोपों का भी गवाह है। लोगों की मांग है कि सरकार 19वीं सदी की गिनी-चुनी धरोहरों की तरह इसे भी संरक्षित करे ताकि इस जगह की रौनक लौट सके। साथ ही यहां के टूरिज्म का भी विकास हो सके।

