Site icon बोलते पन्ने

Passive Euthanasia: 13 साल कोमा में रहे हरीश राणा का ‘इच्छा मृत्यु’ के बाद हुआ अंतिम संस्कार

हरीश राणा के अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद लोग।

  • भारत में पैसिव यूथेनेशिया का पहला मामला, 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने दी थी अनुमति।

नई दिल्ली | 13 साल का लंबा इंतजार और दर्द अब शांत हो गया है। देश में पैसिव यूथेनेशिया यानी निक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति पाने वाले पहले शख्स हरीश राणा अब हमारे बीच नहीं रहे।

इच्छा मृत्यु को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद बीती 13 मार्च को 35 वर्षीय मरीज हरीश राणा को उनके घर से दिल्ली एम्स में भर्ती कराया गया था।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान हुआ था हादसा। (साभार – एक्स)

जहां दस दिनों तक 10 डॉक्टरों की निगरानी में हरीश का लाइफ सपोर्ट धीरे-धीरे हटाया गया। इस प्रक्रिया के जरिए हरीश को प्राकृतिक मौत के करीब पहुंचाया गया, फिर आखिरकार दस दिनों के बाद उन्होंने 24 मार्च को अंतिम सांस ली।

पीटीआई के मुताबिक, हरीश राणा के पार्थिव शरीर का 25 मार्च को दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में अंतिम संस्कार किया गया है।

हरीश राणा के निधन पर उनके परिवार ने उनकी कॉर्निया (आंखें), हार्ट वाल्व और अन्य अंगों को दान कर मानवता की एक अनूठी मिसाल पेश की है।

हरीश राणा के जन्मदिन पर केक काटते उनके मम्मी-पापा, बेटे की हालत देखकर इच्छा मृत्यु की लगाई थी गुहार (फाइल फोटो)

हरीश, गाजियाबाद के रहने वाले थे और पिछले 13 साल से बिस्तर पर जिंदा लाश की तरह पड़े रहे। 2013 में जब वे इंजीनियरिंग के छात्र थे तो हॉस्टल की चौथी मंजिल से नीचे गिरने के बाद उनका पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया था।

बेटे हरीश के अंतिम समय में उनके साथ मौजूद रहे माता-पिता। एम्स में ही उन्हें अलग कमरे में रखा गया, उनकी काउंसलिंग भी की गई। (साभार – एक्स)

इच्छामृत्यु से जुड़ा फैसला देने के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ के दो जज जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन भावुक हो गए थे।

फैसला देने से पहले वे दोनों ही मरीज हरीश राणा की मां निर्मला, पिता अशोक राणा से भी मिले और उनके दर्द को समझा था।

Exit mobile version