- सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी और इस पर केंद्र से कानून बनाने को कहा।
नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा-मृत्यु) के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 12 साल से कोमा में पड़े 32 वर्षीय मरीज के लाइफ सपोर्ट सिस्टम (जीवन रक्षक मशीनें) को हटाने की अनुमति दे दी है।
यह फैसला उन हजारों परिवारों के लिए राहत की ओर एक कदम माना जा रहा है जो कई साल से कोमा में पड़े अपनों के लिए इच्छा मृत्यु की न्यायिक अनुमति मांगते रहे हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि पैसिव यूथेनेशिया में सीधे दवा देकर मौत नहीं दी जाती है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस लंबे समय से लंबित और भावनात्मक मुद्दे पर फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि
“जब किसी व्यक्ति का जीवन केवल कृत्रिम साधनों के सहारे खींचा जा रहा हो और उसके ठीक होने की कोई उम्मीद न हो, तो उसे गरिमा के साथ मृत्यु चुनने का अधिकार है।”
सम्मानजनक मृत्यु के लिए एम्स को निर्देश
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में जीवन को लाइफ सपोर्ट सिस्टम के जरिए बनाए रखना व्यक्ति की गरिमा के खिलाफ हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि एम्स-दिल्ली एक विशेष योजना तैयार करे ताकि लाइफ सपोर्ट हटाने की पूरी प्रक्रिया मरीज की गरिमा और सम्मान के साथ हो।
ब्रेन इंजरी के बाद से कोमा में मरीज
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु का फैसला जिस यह मरीज को लेकर सुनाया है, वह यूपी के गाजियाबाद के 32 साल के हरीश राणा हैं। वह 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान हॉस्टल की चौथी मंजिल से नीचे गिर गए थे और ब्रेन इंजरी हो गई थी। तब से वे लाइफ सपोर्ट पर हैं और डॉक्टरों का कहना है कि उनकी तबीयत में कोई सुधार संभव नहीं है।
पैसिव यूथेनेशिया क्या है?
अगर कोई मरीज लंबे समय से कोमा में है, ठीक होने की कोई संभावना नहीं बची है और वह सिर्फ लाइफ सपोर्ट मशीनों के सहारे जीवित है, तो मशीनें हटाकर उसे प्राकृतिक मृत्यु की ओर जाने दिया जा सकता है। यह सक्रिय यूथेनेशिया (दवा देकर मौत देना) से अलग है।
कोर्ट ने केंद्र से क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पैसिव यूथेनेशिया के लिए व्यापक और स्पष्ट कानून बनाने पर विचार करने को कहा है। कोर्ट ने माना कि इस तरह के मामलों में परिवार, डॉक्टरों और कानून के बीच स्पष्ट दिशानिर्देशों की कमी है, जिससे मरीजों और परिवारों को अनावश्यक पीड़ा होती है।

