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‘वंदे मातरम को गाना एक प्रोटोकॉल, इसे न गाने पर दंड का कोई प्रावधान नहीं’: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट (साभार- इंटरनेट)

सुप्रीम कोर्ट (साभार- इंटरनेट)

नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ गाने को एक प्रोटोकॉल बताते हुए कहा कि इसका पालन करना अनिवार्य नहीं है। वंदे मातरम न गाने पर किसी भी सज़ा का प्रावधान नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “अगर राष्ट्रगीत न गाने को लेकर किसी के ऊपर ऐक्शन होता है, तब हम इसे देखेंगे।”

यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश समेत तीन जजों की बेंच ने एक याचिका को खारिज कर दिया है।

यह याचिका हाल में राष्ट्रगान को लेकर गृहमंत्रालय की ओर से जारी हुए सर्कुलर के खिलाफ दायर की गई थी।

वंदे मातरम पर क्या है नया निर्देश

गौरतलब है कि गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को एक आदेश जारी किया था। जिसमें कहा गया था कि अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों या अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम’ बजाया जाएगा। इस दौरान हर व्यक्ति का खड़ा होना अनिवार्य होगा।

नए नियम में कहा गया था कि इसे राष्ट्रगान से पहले बजाया जाएगा। साथ ही, राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे, जिनकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकेंड है। अब तक मूल गीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे।

पब्लिक प्लेस के लिए यह निर्देश अनिवार्य नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सर्वोच्च अदालत ने बुधवार को अपने आदेश में कहा कि पब्लिक प्लेस और सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए जारी यह निर्देश अनिवार्य नहीं है।

CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने याचिका की सुनवाई की। बेंच ने कहा कि गृह मंत्रालय की एडवाइजरी में वंदेमातरम न गाने पर किसी भी तरह की सजा का प्रावधान नहीं है।

तीन जजों की बेंच ने कहा- “ये दिशानिर्देश केवल एक प्रोटोकॉल हैं और इनका पालन करना अनिवार्य नहीं है।”

जजों ने कहा कि “जब याचिकाकर्ता के खिलाफ राष्ट्रगान न गाने के लिए दंडात्मक कार्रवाई होगी, या फिर उनके लिए इसे गाना अनिवार्य किया जाएगा, तब हम इन सब बातों पर ध्यान देंगे।”

याचिकाकर्ता का दावा- ‘गाने को मजबूर किया जाएगा’

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले के याचिकाकर्ता मुहम्मद सईद नूरी नाम के एक व्यक्ति हैं जो एक स्कूल चलाते हैं।

उनकी ओर से वकील संजय हेगड़े ने पैरवी करते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा कि “भले ही राष्ट्रगीत गाने का नियम सलाहकारी हो लेकिन सामाजिक दवाब के कारण लोग मजबूर हो सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि सलाह (Advisory) की आड़ में लोगों को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है।”

‘अंदेशे पर ऐक्शन नहीं लेंगे, अगर भेदभाव हो तब आइए’

इस पर CJI ने कहा- “हमें वह नोटिस दिखाइए जिसमें आपको राष्ट्रगान बजाने के लिए मजबूर किया गया है।” साथ ही यह भी टिप्पणी की कि “आप एक स्कूल चलाते हैं, हमें यह भी नहीं पता कि वह मान्यता प्राप्त है या नहीं।”

जस्टिस बागची ने कहा कि यह सिर्फ एक दृष्टिकोण है और लोग इससे असहमत हो सकते हैं। अगर आपके खिलाफ कोई ऐक्शन होता है या नोटिस आता है, तो आप फिर से कोर्ट आ सकते हैं।” सुप्रीम कोर्ट के जजों ने याचिकाकर्ता से कहा कि “फिलहाल यह याचिका भेदभाव के एक अस्पष्ट अंदेशे के अलावा और कुछ नहीं है।”

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