- रोहतास में नवरात्र में लग रहा है ‘भूतों का मेला’।
- पीड़ित हैं महिलाएं और भूत उतारते हैं पुरुष तांत्रिक।
- पूर्ण शराबबंदी के बाद भी चढ़ावे में दी जाती शराब।
सासाराम | अविनाश श्रीवास्तव
नवरात्र में जहां एक तरफ लोग देवी दुर्गा की उपासना कर रहे हैं, वहीं बिहार के रोहतास जिले में इसी मौके पर भूतों का मेला लगा हुआ है।
कई दशकों से चलता आ रहा यह मेला वैज्ञानिक सोच को चुनौती देता है। यहां बिहार ही नहीं पड़ोसी उत्तर प्रदेश व झारखंड से ऐसे लोग पहुंचते हैं जो भूत-प्रेत और आत्माओं में गहरा विश्वास रखते हैं।
यहां झाड़-फूंक और तंत्र-मंत्र के नाम पर सबसे ज्यादा महिलाओं का तथाकथित तौर पर इलाज किया जाता है। जो खुद में सवाल खड़ा करता है।
दरअसल हमारे समाज में महिलाओं को कमजोर और जल्दी प्रभावित होने वाला माना जाता है। जबकि पुरुष एक ‘मुक्तिदाता’ के रूप में देखे जाते हैं।
यही कारण है कि इस मेले में 90% पीड़ित महिलाएं, और उनका इलाज करने वाले सौ फीसद तांत्रिक पुरुष हैं।
यह मेला रोहतास के संझौली ब्लॉक के घिन्हू ब्रह्म स्थान पर साल में दो बार लगता है। हर साल चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। और स्थानीय लोग इसे “भूतों का मेला” कहते हैं।
कई स्थानीय तो दावा करते हैं कि मेला सौ साल पुराना है।
शराबबंदी के बावजूद चढ़ती है शराब
यूं तो अंधविश्वास को बढ़ावा न देना हर नागरिक की जिम्मेदारी और अंधविश्वास फैलाने वालों पर कार्रवाई करना पुलिस का अधिकार है, लेकिन मेला आयोजकों पर आज तक कोई ऐक्शन नहीं हुआ।
बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बावजूद मेले में शराब की बोतलें देखी जाती हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि कुछ लोग इसे “चढ़ावा” के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं।
भूत-प्रेत को शांत करने के लिए यहां जानवरों की बलि देने की भी परंपरा है।
मेले में गरीब तबके की महिलाएं अधिक
चैत्र नवरात्र पर शुरू हुआ यह मेला नौ दिनों तक चलेगा। यह मेला गांव के करीब 2 किलोमीटर क्षेत्र में फैला है।
मेले में आने वाले ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से कमजोर तबके से होते हैं, जो अपनी समस्याओं का समाधान यहां तलाशते हैं।
इस मेले में अधिकांश महिलाएं व लड़कियां खुले बालों के साथ चीखती-चिल्लाती नजर आती हैं। कई लोग उनका वीडियो बनाते और मूक दर्शक बने उन्हें देखते नज़र आते हैं।
मेले में मौजूद तांत्रिक इसे इन महिलाओं पर “भूत सवार” होना बताते हैं और कहते हैं कि वे उसी के प्रभाव में ये हरकतें करती हैं। इस दौरान तांत्रिक उन्हें नियंत्रित करने और “भूत उतारने” की कोशिश करते हैं। इस दौरान महिलाओं को पीटा तक जाता है।
तांत्रिकों का कहना है कि वे व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसके अंदर मौजूद “आत्मा” को मारते हैं, ताकि वह शरीर छोड़कर भाग जाए।
सत्येंद्र पासवान (तांत्रिक) का कहना है कि वे पिछले 35 वर्षों से इस मेले में आ रहे हैं और सैकड़ों लोगों को भूत-प्रेत से मुक्ति दिला चुके हैं।
दरअसल पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों (जैसे हिस्टीरिया, डिप्रेशन या एंग्जायटी) को अक्सर मेडिकल समस्या के बजाय ‘ऊपरी साया’ या ‘भूत-प्रेत’ मान लिया जाता है।
इसी अंध विश्वास के चलते ये भूतों के मेले आज भी फल-फूल रहे हैं।

