- शराबबंदी के बीच पारंपरागत पेय की मांग ने रोजगार का नया रास्ता खोला।
पटना/बोधगया |
बोधगया में महाबोधी मंदिर आने वाले दुनिया भर के पर्यटकों की अब एक नई पसंद बन गई है – मीठी ताड़ी (नीर) से बनी तिलकुट, अनरसा, लाई, लड्डू और चाय। ये पारंपरिक मिठाइयां और पेय न सिर्फ स्वाद में लाजवाब हैं, बल्कि सेहत के लिए भी अच्छे हैं। साथ ही, यह बिहार में दस साल से जारी शराबबंदी के चलते वैकल्पिक रोजगार का रास्ता खोल रहा है जिसे जीविका का खूब सहयोग मिला है।
सफलता की यह कहानी दरअसल बोधगया के इलरा गांव के निवासी डब्ल्यू कुमार की है। वे पहले दूसरे राज्यों में मजदूरी करते थे। दस साल पहले 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बाद यहां के इलाकों में मीठी ताड़ी को बढ़ावा मिला जिसे स्थानीय लोग नीर भी कहते हैं । डब्ल्यू कुमार ने ताड़ी से गुड़ बनाना शुरू किया और उसी गुड़ से तिलकुट, अनरसा, लाई और लड्डू तैयार करने लगे। उनकी चर्चा इतनी फैली कि 2023 में खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आकर उनकी स्वादिष्ट मिठाइयों को चखा। आज उनका स्टॉल महाबोधी मंदिर के पास आकर्षण का केंद्र बन गया है।
दरअसल मीठी ताड़ी से बने उत्पादों की खासियत यह है कि ये कम मीठे होते हैं। सामान्य तिलकुट में चीनी या पारंपरिक गुड़ का इस्तेमाल होता है, लेकिन ताड़ी का गुड़ नेचुरल और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला होता है। इसी वजह से डायबिटीज के मरीज भी इन्हें बेझिझक खा रहे हैं। जापान, थाईलैंड, श्रीलंका, यूरोप और अमेरिका से आने वाले विदेशी पर्यटक इसे खास तौर पर पसंद कर रहे हैं।
डब्ल्यू कुमार बताते हैं कि सीएम से प्रोत्साहन मिलने के बाद उन्हें हिम्मत मिली। अब उनकी पत्नी पुष्पा कुमारी समेत पूरा परिवार इसी काम में लगा है। तिलकुट सीजन में रोजाना 150 किलो से ज्यादा बिक्री होती है। हालांकि इसकी कीमत सामान्य तिलकुट से थोड़ी ज्यादा करीब 400 रुपये प्रति किलो है, लेकिन स्वाद और सेहत के कारण पर्यटक खुशी-खुशी खरीदते हैं।
बिहार सरकार की जीविका (Jeevika) ने इस व्यवसाय को बढ़ावा दिया। बोधगया और गया में विशेष काउंटर दिए गए। पटना के गांधी मैदान में सरस मेले में भी स्टॉल मिला, जहां रोजाना 70-100 किलो तिलकुट बिका। इस साल एक लाख लीटर से ज्यादा मीठी ताड़ी से गुड़ तैयार किए जाने का दावा है, जिससे पेड़ा, लाई और ताड़ी की चाय भी बन रही है।
मीठी ताड़ी अब बिहार में रोजगार का नया मॉडल बन चुकी है। शराबबंदी के बाद ताड़ी टैपर्स को वैकल्पिक आजीविका मिली। गांवों में ताड़ी उत्पादन बढ़ा, परिवारों को घर पर काम मिला, और बोधगया जैसे पर्यटन स्थलों पर लोकल प्रोडक्ट ने विदेशी पर्यटकों का दिल जीता।
यह कहानी सिर्फ तिलकुट की नहीं, बल्कि बिहार में शराबबंदी के बाद सस्टेनेबल रोजगार और हेल्थी फूड इनोवेशन की है। बोधगया आने वाले हर तीर्थयात्री के लिए मीठी ताड़ी का तिलकुट अब एक जरूरी स्वाद बन चुका है।

