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मुंगेर : नामी सर्जन ने बेटे का गलत ऑपरेशन किया.. कर्ज में डूबे पिता की मौत, कैंसर पीड़ित मां ने 6 साल लड़ी लड़ाई, आखिर मिला इंसाफ

समर शेखर (दाएं) जब 11 साल के थे तो नामी सर्जन ने उनका गलत ऑपरेशन कर दिया, उनकी मां (बाएं) ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।

समर शेखर (दाएं) जब 11 साल के थे तो नामी सर्जन ने उनका गलत ऑपरेशन कर दिया, उनकी मां (बाएं) ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।

मुंगेर | प्रशांत कुमार

बिहार के मुंगेर में एक बच्चे का गलत ऑपरेशन होने के बाद पूरा परिवार बर्बाद हो गया। अपेंडिसाइटिस (अपेंडिस्क) का लेप्रोस्कोपिक ऑपरेशन करने के नाम पर एक नामी सर्जन डॉ. सुधीर कुमार ने बच्चे का पेट गले से नाभि तक चीर डाला, उसकी जान बचाने के लिए परिवार को भारी कर्ज लेकर कोलकाता में ऑपरेशन कराना पड़ा। कर्ज के बोझ के चलते पिता की असमय मौत हो गई।

इतना होने पर भी कैंसर पीड़ित मां ने अपने बेटे के साथ हुए अन्याय के खिलाफ लड़ाई नहीं रोकी और अब जाकर उन्हें न्याय मिला है। छह साल चले केस में जिला उपभोक्ता विभाग ने जिले के नामी सर्जन को आदेश दिया है कि वे पीड़ित को 16.51 लाख रुपये दें। साथ ही, कहा है कि अगर दोषी डॉक्टर ने आदेश की तारीख से 60 दिनों के अंदर भुगतान नहीं किया तो पूरी राशि पर नौ प्रतिशत ब्याज के साथ भुगतान करना होगा।

बेटे के पेट में दर्द उठा था, 5 दिन में हालत बिगाड़ दी

समर शेखर नाम के 11 साल के बच्चे के पेट में एक अगस्त 2019 को अचानक काफी तेज दर्द उठा। समर की मां के मुताबिक, उन्हें नीलम सिनेमा के पास स्थित एक प्रसिद्ध सर्जन डॉ. सुधीर कुमार के यहां ले गए। जहां सर्जन ने कुछ जांच कर मरीज को अपेंडिसाइटिस होने की बात कही और तुरंत लेप्रोस्कोपिक विधि से सर्जरी का सुझाव दिया। अगले दिन दो अगस्त 2009 को लेप्रोस्कोपिक विधि से सर्जरी किया गया जो असफल रहा।

बता दें कि अपेंडिसाइटिस क चिकित्सा स्थिति है जो पेट के निचले दाहिने हिस्से में स्थित अपेंडिक्स नामक एक छोटे से अंग की सूजन से होती है।

परिवार की अनुमति बिना पेट चीड़ डाला

परिवार का आरोप है कि डॉ. सुधीर कुमार ने अभिभावक की बिना सहमति से पूरे पेट में चीड़ा लगा दिया। इसके बाद भी मरीज को पांच दिनों में पीड़ा कम नहीं हुई तो डाक्टर ने मरीज को घर ले जाने का सलाह दी। स्वजन के काफी दबाव देने के बाद डाक्टर ने अस्पताल का खर्च लेकर मरीज को छह अगस्त 2019 को रेफर किया।

हायर सेंटर में इलाज से इनकार, कहा- बच्चा मौत के करीब

जहां से उसे भागलपुर के एक निजी अस्पताल ले जाया गया, पर वहां यह कहकर उसका इलाज करने से इंकार कर दिया गया कि बच्चे का आपरेशन इस प्रकार किया गया है कि उसे मृत्यु के करीब पहुंचा दिया गया है।

10 दिन वेंटिलेटर पर रखने के बाद जान बची

इसके बाद एमएमआरआई कोलकाता में बच्चे का आपरेशन कर उसकी जांच बचाई गई। यहां दस दिनों तक उसे वेंटिलेटर पर रखा गया था। इस प्रकार बच्चे के इलाज में आठ लाख से अधिक की रशि खर्च हो गई।

डॉक्टर का जवाब- अपेंडिक्स परफोरेशन के कारण खोला पेट
आयोग को दिए अपने लिखित जवाब में डॉक्टर ने कहा कि अपेंडिक्स परफोरेशन होने के आभास होने पर मरीज का पेट खोला गया। इसके अलावा आंतों पर फ्रिवीनस फ्लेक जमा हुआ था, व अपेंडिक्स के आसपास पस जैसा फ्लूड जमा था। ऐसा पाने के बाद जहां तक संभव था अपेंडिक्स काटकर निकाल दिया गया। वहीं, चिकित्सक ने यह स्वीकार किया कि कोलकाता में जो इलाज हुआ उसमें आंत में जो छेद था उसे बंद कर दिया और अपेंडिक्स के स्टम्प का फिर से आपरेशन कर शेष बचे अपेंडिक्स को बाहर कर दिया गया।

आयोग बोला- डॉक्टर ऑपरेशन नहीं, प्रयोग कर रहे थे

जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष रमण सिन्हा ने कहा: “आपातकाल के आभास पर पूरा पेट चीरना यह सिद्ध करता है कि डॉक्टर ऑपरेशन नहीं, प्रयोग कर रहे थे। अपेंडिसाइटिस में छोटा चीरा ही लगता है, यह अमानवीय है।” 

डॉक्टर को देने होंगे कुल 16.51 लाख रुपये

  • इलाज का खर्च 8.50 लाख + 6% ब्याज (2019 से)
  • मानसिक-शारीरिक कष्ट: 2 लाख
  • वाद व्यय: 50 हजार
  • बच्चे का शरीर पोस्टमार्टम की तरह चीरने का मुआवजा: 5 लाख
  • 60 दिन में भुगतान न हुआ तो पूरी राशि पर 9% सालाना ब्याज
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