लाइव पन्ना
आंध्र प्रदेश में एक स्लीपर बस में आग लगी, 13 यात्री जिंदा जल गए, 25 झुलसे
नई दिल्ली | आंध्र प्रदेश में एक स्लीपर बस और हाइवा की टक्कर के बाद दोनों में आग लग गई। इस हादसे में स्लीपर बस में सवार 13 यात्री जिंदा जल गए, जबकि 25 यात्री झुलस गए हैं।
यह घटना मार्कापुरम जिले में रायवरम के पास गुरुवार (26 मार्च) की सुबह करीब छह बजे हुई।

हाइवा में कंक्रीट भरा था, स्लीपर बस में 41 यात्री थे। (तस्वीर- X)
द हिन्दू के मुताबिक, दुर्घटना पर जानकारी देते हुए मार्कापुरम के डीएम पी. राजा बाबू ने बताया कि,
“बस में सवार 41 यात्रियों में से 13 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई और उनके शव बरामद कर लिए गए हैं। हादसे में घायल 25 लोगों में से 10 को गंभीर चोटें आई हैं। साथ ही, 5 लोगों की हालत चिंताजनक बनी हुई है। इन्हें गुंटूर के सरकारी सामान्य अस्पताल (GGH) में रेफर किया जा रहा है।”
मरकापुरम के SP वी हर्षवर्धन राजू ने बताया कि यह दुर्घटना एक मोड पर हुई जहां निजी बस की टक्कर सामने से आ रहे कंक्रीट लगे डंपर से हो गई।
यह बस ‘हरिकृष्ण ट्रेवल्स’ की है, जो तेलंगाना के निर्मल से आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले के विंजामुरु की ओर जा रही थी।
आग पर करीब तीन घंटे में काबू पाया गया। बस में 41 यात्री सवार थे।
मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने लोगों की मौत पर दुख जताया।
लाइव पन्ना
UP : काशी के बाद श्रावस्ती में इफ्तार करने वाले मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी, जानिए पूरा मामला
नई दिल्ली| रमजान के दौरान वाराणसी में गंगा पर वोटिंग के दौरान इफ्तार करने वाले मुस्लिमों को जेल भेजे जाने के बाद इफ्तारी से जुड़े एक और मामले में यूपी पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़े हो गए हैं।
उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में सोनपथरी आश्रम मंदिर के पास इफ्तार पार्टी किए जाने की शिकायत पर अब तक 10 मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारियां हुई हैं।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना 17 मार्च को सिरसिया इलाके में हुई। जहां मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने कथित तौर पर वन क्षेत्र के भीतर स्थित मंदिर के पास इफ्तार के लिए मांसाहारी भोजन तैयार किया था।
पुलिस का दावा है कि इफ्तार के बाद बचे भोजन को उस नदी में फेंक दिया गया जिसके पानी का उपयोग मंदिर के श्रद्धालु पीने, खाना पकाने और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए करते हैं।
दावा किया गया है कि इससे मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची है।
आश्रम के पुजारी हरि शरणानंद जी महाराज ने 19 मार्च को सिरसिया थाने में लिखित शिकायत दर्ज करायी थी।
मीडिया रिपोर्ट्स से पता लगा है कि इसी मामले में वन विभाग ने भी एक रिपोर्ट दर्ज कराई है।
जिसमें आरोप लगाया गया है कि आरोपियों ने जंगल में अवैध रूप से आग जलाई थी, जिससे जंगल में आग लगने का खतरा पैदा हुआ और स्थानीय वन्यजीवों की जान जोखिम में पड़ गई।
दुनिया गोल
बांग्लादेश : ईद की छुट्टी से लौट रहे यात्रियों वाली बस पद्मा नदी में 80 फीट तक डूबी
नई दिल्ली | बांग्लादेश में एक यात्री बस फेरी पर चढ़ाए जाने के दौरान पद्मा नदी में गिर गई जिससे बड़ा हादसा हो गया। अब तक 18 यात्रियों के शव मिले हैं जिसमें बच्चे भी शामिल हैं।
सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में देखा जा सकता है कि हादसे के समय मौके पर लोग बस को नदी में डूबता देख स्तब्ध रह गए लेकिन कोई कुछ न कर सका।
हादसे में और भी यात्रियों की मौत की संभावना जतायी जा रही है क्योंकि बस नदी में 80 फीट तक डूब गई है। सेना के साथ मिलकर बचाव दल लापता लोगों को ढूंढ रहा है। यह हादसा बुधवार (25 march) शाम पांच बजे हुआ।

हादसे के दौरान स्तब्ध रह गए लोग और मौके पर पहुंचा रेस्क्यू वाहन।
बांग्लादेश की समाचार वेबसाइट bdnews24 के मुताबिक, बस में 40 से ज्यादा यात्री सवार थे, जिसमें से 5-7 लोगों ने तैर कर जान बचा ली।
अधिकारियों ने बताया कि बस ढाका जा रही थी। इसमें सवार कई यात्री ईद की छुट्टियां खत्म कर राजधानी लौट रहे थे, जिनमें बच्चे भी शामिल थे।
हादसा राजबाड़ी जिले में दाउलादिया टर्मिनल पर हुआ। हादसे के समय बस नदी पार करने के लिए फेरी (बड़ी नाव) पर चढ़ रही थी और इसी दौरान ड्राइवर का कंट्रोल छूट गया और बस सीधे नदी में जा गिरी।
जनहित में जारी
‘वंदे मातरम को गाना एक प्रोटोकॉल, इसे न गाने पर दंड का कोई प्रावधान नहीं’: सुप्रीम कोर्ट
- याचिकाकर्ता का दावा था- ‘वंदे मातरम गाने के निर्देश सामाजिक दवाब बना सकते हैं।’
नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ गाने को एक प्रोटोकॉल बताते हुए कहा कि इसका पालन करना अनिवार्य नहीं है। वंदे मातरम न गाने पर किसी भी सज़ा का प्रावधान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “अगर राष्ट्रगीत न गाने को लेकर किसी के ऊपर ऐक्शन होता है, तब हम इसे देखेंगे।”
यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश समेत तीन जजों की बेंच ने एक याचिका को खारिज कर दिया है।
यह याचिका हाल में राष्ट्रगान को लेकर गृहमंत्रालय की ओर से जारी हुए सर्कुलर के खिलाफ दायर की गई थी।
वंदे मातरम पर क्या है नया निर्देश
गौरतलब है कि गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को एक आदेश जारी किया था। जिसमें कहा गया था कि अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों या अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम’ बजाया जाएगा। इस दौरान हर व्यक्ति का खड़ा होना अनिवार्य होगा।
नए नियम में कहा गया था कि इसे राष्ट्रगान से पहले बजाया जाएगा। साथ ही, राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे, जिनकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकेंड है। अब तक मूल गीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे।
पब्लिक प्लेस के लिए यह निर्देश अनिवार्य नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सर्वोच्च अदालत ने बुधवार को अपने आदेश में कहा कि पब्लिक प्लेस और सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए जारी यह निर्देश अनिवार्य नहीं है।
CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने याचिका की सुनवाई की। बेंच ने कहा कि गृह मंत्रालय की एडवाइजरी में वंदेमातरम न गाने पर किसी भी तरह की सजा का प्रावधान नहीं है।
तीन जजों की बेंच ने कहा- “ये दिशानिर्देश केवल एक प्रोटोकॉल हैं और इनका पालन करना अनिवार्य नहीं है।”
जजों ने कहा कि “जब याचिकाकर्ता के खिलाफ राष्ट्रगान न गाने के लिए दंडात्मक कार्रवाई होगी, या फिर उनके लिए इसे गाना अनिवार्य किया जाएगा, तब हम इन सब बातों पर ध्यान देंगे।”
याचिकाकर्ता का दावा- ‘गाने को मजबूर किया जाएगा’
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले के याचिकाकर्ता मुहम्मद सईद नूरी नाम के एक व्यक्ति हैं जो एक स्कूल चलाते हैं।
उनकी ओर से वकील संजय हेगड़े ने पैरवी करते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा कि “भले ही राष्ट्रगीत गाने का नियम सलाहकारी हो लेकिन सामाजिक दवाब के कारण लोग मजबूर हो सकते हैं।”
उन्होंने कहा कि सलाह (Advisory) की आड़ में लोगों को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है।”
‘अंदेशे पर ऐक्शन नहीं लेंगे, अगर भेदभाव हो तब आइए’
इस पर CJI ने कहा- “हमें वह नोटिस दिखाइए जिसमें आपको राष्ट्रगान बजाने के लिए मजबूर किया गया है।” साथ ही यह भी टिप्पणी की कि “आप एक स्कूल चलाते हैं, हमें यह भी नहीं पता कि वह मान्यता प्राप्त है या नहीं।”
जस्टिस बागची ने कहा कि यह सिर्फ एक दृष्टिकोण है और लोग इससे असहमत हो सकते हैं। अगर आपके खिलाफ कोई ऐक्शन होता है या नोटिस आता है, तो आप फिर से कोर्ट आ सकते हैं।” सुप्रीम कोर्ट के जजों ने याचिकाकर्ता से कहा कि “फिलहाल यह याचिका भेदभाव के एक अस्पष्ट अंदेशे के अलावा और कुछ नहीं है।”
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