मुक्तक
मेट्रो शहर की मांएं | कविता
भारतीय मेट्रो शहरों में रहने वाली कामकाजी महिलाएं हों या गांवों-कस्बों में रह रहीं पुरानी पीढ़ी की दादी-नानियां।
पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के मां बन जाने के बाद की भूमिकाएं या कहें कि उनके ‘जेंडर रोल’ लगभग एक से हैं। इसी मुद्दे को कलात्मक ढंग से दर्शाती है ये कविता- मेट्रो शहर की मांएं। इसे लिखा व प्रस्तुत किया है, हमारी साथी शिवांगी ने।
इसे सुनिए और हमें फीडबैक दीजिए।
अगर आपके पास भी कोई कविता है तो हमें प्रकाशन के लिए इस पते पर भेजिए – contact@boltepanne.com
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