दुनिया गोल
Board of Peace : बिना सदस्यता के भारत मौजूद, ट्रंप बोले- रूस और चीन भी शामिल हों
- गाजा संकट पर ट्रंप की पहल ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक
- भारत ने पहली बैठक में ऑब्जर्वर देश के रूप में हिस्सा लिया
- भारतीय दूतावास में कार्यवाहक राजदूत नामग्या खम्पा शामिल
- ट्रंप ने चीन और रूस को शामिल करने के लिए निमंत्रण भेजा
नई दिल्ली |
गाजा संकट पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गई पहल ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) की पहली बैठक में भारत बिना सदस्यता के एक पर्यवेक्षक यानी ऑब्जर्वर देश के रूप में शामिल हुआ। इस दौरान ट्रंप ने कहा कि कई देश इस बोर्ड में शामिल होने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और वह चीन, रूस को इसमें शामिल करना पसंद करेंगे। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि इन दोनों देशों को पहले ही निमंत्रण भेजा जा चुका है। भारत की तरफ से गुरुवार (19 Feb) को वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास में कार्यवाहक राजदूत नामग्या सी खम्पा इस बैठक में मौजूद थे।
आइए जानते हैं बोर्ड ऑफ पीस की पहली बैठक में क्या-क्या हुआ ?
ट्रंप ने कहा, अमेरिका संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करेगा
अमेरिकी राष्ट्रपति (US President) ने 9 सदस्य देशों कजाकिस्तान, अजरबैजान, यूएई, मोरक्को, बहरीन, कतर, सऊदी अरब, उज्बेकिस्तान और कुवैत ने गाजा के लिए राहत पैकेज हेतु कुल 7 अरब डॉलर देने पर सहमति जताई है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनके बहुत अच्छे संबंध हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करेगा. उसकी सुविधाओं को बेहतर बनाएगा और उसे आर्थिक मदद देगा ताकि वह ठीक से काम करता रहे।
ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका शांति बोर्ड के लिए 10 अरब डॉलर दे रहा है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि यह पैसा किस पर खर्च किया जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल के कमांडर मेजर जनरल जैस्पर जेफर्स ने कहा कि मोरक्को, कजाखस्तान, कोसोवो और अल्बानिया ने गाजा में हजारों सैनिक भेजने का वादा किया है। वहीं मिस्र और जॉर्डन ने वहां के कर्मियों को ट्रेनिंग देने की बात कही है।

गज़ा शांति समझौते के तहत बनाए गए बोर्ड ऑफ पीस के पीछे ट्रंप के दामाद का दिमाग है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
कौन-कौन हुआ शामिल
वॉशिंगटन स्थित यूएस इंस्टीट्यूट ऑफ पीस में आयोजित बैठक में लगभग 50 देशों के अधिकारियों ने भाग लिया। इनमें 27 देश बोर्ड के सदस्य हैं, जिनमें अजरबैजान, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, इजराइल, जॉर्डन, मोरक्को, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्किये, संयुक्त अरब अमीरात, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। भारत और यूरोपीय संघ सहित अन्य देश पर्यवेक्षक के रूप में इसमें शामिल हुए।
भारत का क्या है रुख
बोर्ड का हिस्सा बनने का निमंत्रण मिलने के बाद भारत ने तुरंत इस बारे में खुलासा नहीं किया कि वह इसे स्वीकार करेगा या नहीं।
भारत (India) दावोस में इसके शुभारंभ से भी दूर रहा, 12 फरवरी को भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि प्रस्ताव विचाराधीन है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया था कि शांति बोर्ड के संबंध में हमें अमेरिकी सरकार से इसमें शामिल होने का निमंत्रण मिला है। हम इस प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं और इसकी समीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि भारत ने पश्चिम एशिया में शांति को बढ़ावा देने वाले प्रयासों का हमेशा से समर्थन किया है। हालांकि, गुरुवार की बैठक में चार्ज डी’ अफेयर्स की उपस्थिति से ये क्लीयर हो गया कि भारत बोर्ड के साथ जुड़ने को तैयार है, भले ही वह अभी पूर्ण सदस्य बनने के लिए तैयार न हो।
बोर्ड ऑफ पीस क्या है?
यह बैठक ‘डोनाल्ड जे. ट्रंप इंस्टीट्यूट ऑफ पीस’ में आयोजित की गई। बोर्ड ऑफ पीस को ट्रंप ने पिछले महीने वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की सालाना बैठक में दावोस में पेश किया था। उस समय ट्रंप ने कहा था कि हर कोई इस संगठन का हिस्सा बनना चाहता है। उन्होंने यह भी कहा था कि यह संगठन आगे चलकर संयुक्त राष्ट्र (UN) को टक्कर दे सकता है। शुरुआत में इस बोर्ड का मकसद गाजा में इजरायल और हमास के बीच युद्धविराम की निगरानी करना था। साथ ही गाजा के पुनर्निर्माण और वहां के प्रशासन में भूमिका निभाने की बात थी, लेकिन बाद में ट्रंप की योजना इससे कहीं बड़ी हो गई। इसके चार्टर के अनुसार यह दुनिया के अन्य संघर्ष क्षेत्रों में भी शांति और स्थिरता के लिए काम कर सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद इस बोर्ड के चेयरमैन हैं।
दुनिया गोल
बड़ी राहत : राष्ट्रपति ट्रंप के लगाए Global Tariff को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द
- अप्रैल-25 में ट्रंप ने दुनिया के कई देशों पर टैरिफ की घोषणा की थी।
- अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
- सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ को अवैध बताया, कहा- यह आपातकालीन शक्ति नहीं।
नई दिल्ली |
भारत समेत दुनिया के कई दर्जन देशों के ऊपर बड़े-बड़े टैरिफ लगा रहे राष्ट्रपति ट्रंप को एक बड़ा झटका लगा है जो दुनेियाभर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए राहत की खबर लाया है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (20 feb) को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए टैरिफ लगाने से जुड़ी नीति को असंवैधानिक करार दे दिया है।
सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा कि International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) अमेरिकी राष्ट्रपति को इस तरह से टैरिफ लगाने की अनुमति नहीं देता। बता दें कि राष्ट्रपति ट्रंप इस आपातकालीन शक्ति का इस्तेमाल टैरिफ लगाने के लिए करते आ रहे हैं।
इस फैसले के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टीम की ओर से जानकारी दी गई है कि वे आज ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करके फैसले पर अपना पक्ष रखेंगे।
बता दें कि पिछले साल अप्रैल में ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए दुनिया के कई देशों से आने वाले सामान पर भारी टैरिफ यानी आयात शुल्क लगा दिए थे। टैरिफ का मतलब होता है कि किसी देश से आने वाले सामान पर ज्यादा टैक्स लगाया जाए, ताकि वह महंगा हो जाए और घरेलू कंपनियों को फायदा मिले।
दुनिया गोल
America-Iran conflict : फिर ईरान के सामने आया अमेरिका, क्या बड़े हमले की आहट?
- ट्रंप ने दिए दो एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़ों को ईरान की खाड़ी पर तैनात करने के आदेश।
- दोनों देशों में तनाव चरम पर, ईरान का होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का संकेत।
नई दिल्ली |
अमेरिका (America) और ईरान (Iran) के बीच संघर्ष की आहट बढ़ती जा रही है। डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने दो एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़ों को ईरान की खाड़ी पर तैनात करने के आदेश दे दिए। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। ईरान ने भी होर्मुज जलडमरूमध्य में एक युद्धाभ्यास कर इस क्षेत्र को पूरी तरह बंद करने का संकेत दिया, जो वैश्विक तेल सप्लाई में बाधा पहुंचाने वाला कदम साबित हो सकता है। गौरतलब है कि यह फारस की खाड़ी का संकीर्ण मुहाना है, जिसके जरिए दुनिया के व्यापारिक तेल के पांचवां हिस्से की आवाजाही होती है। यह मुहाना बंद होने से पूरी दुनिया का तेल व्यापार थमने से बड़ा संकट पैदा हो सकता है।
ट्रंप बोले- 10 दिन में समझौता नहीं तो हमला होगा
वाशिंगटन डीसी में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उद्घाटन बैठक में ट्रंप ने परमाणु कार्यक्रम पर ईरान से चल रही बातचीत को लेकर बयान दिया। उन्होंने कहा –
“हमें एक ऐसा समझौता करना होगा जो सार्थक हो, नहीं तो बुरी चीजें होंगी। अगले दस दिन में या तो हम ईरान के साथ समझौते पर पहुंच जाएंगे या फिर ईरान के ऊपर सैन्य हमला होगा।”
हाल के दिनों में अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है उधर स्विट्जरलैंड में अमेरिकी और ईरानी वार्ताकारों के बीच बातचीत में प्रगति की भी खबरें आई हैं। डेमोक्रेटिक सांसदों और कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने अमेरिकी संसद की मंजूरी के बिना ईरान में किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई का विरोध जताया है।
ईरान का जवाब- हम निर्णायक जवाब देंगे
“ईरान युद्ध शुरू नहीं करेगा लेकिन किसी भी अमेरिकी आक्रामकता का जवाब निर्णायक और समानुपातिक रूप से दिया जाएगा।”
क्या है दोनों देशों की तैयारियां?
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Epstein Files : एपस्टीन मामले में नाम के बाद ब्रिटेन के राजा चार्ल्स के छोटे भाई एंड्रयू गिरफ्तार
- सार्वजनिक पद पर रहते हुए सरकारी फाइलों में हेरफेर के आरोप।
- बर्थडे के दिन उन्हें सैंड्रिंघम में उनके घर से हिरासत में लिया गया।
नई दिल्ली | ब्रिटेन के शाही परिवार को एक बड़ा झटका लगा है। एपस्टीन फाइल में फंसे ब्रिटेन के राजा चार्ल्स के छोटे भाई और पूर्व प्रिंस एंड्रयू (Prince Andrew) को यूनाइटिड किंगडम (UK ) पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उन पर सार्वजनिक पद पर रहते हुए सरकारी फाइलों में हेरफेर के आरोप लगे हैं। बता दें कि पूर्व प्रिंस एंड्रयू का आज 66वां जन्मदिन है। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें पुलिस ने उन्हें गुरुवार (19 feb) सुबह करीब 8 बजे सैंड्रिंघम में उनके घर से हिरासत में लिया। हांलाकि एंड्रयू को पुलिस ने रिहा कर दिया है।
थॉमस वैली पुलिस ने गुरुवार को पुष्टि की कि एंड्रयू को पूरी तरह से जांच के बाद गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने यह भी बताया कि वे उन रिपोर्टों की भी जांच कर रहे थे जिसमें एंड्रयू माउंटबेटन-विंडसर ने 2010 में सेक्स अपराधी जेफरी एपस्टीन (Jeffrey Epstein) को ट्रेड रिपोर्ट भेजी थीं।
भाई की गिरफ्तारी पर बोले किंग चार्ल्स, निष्पक्ष जांच होगी
वहीं किंग चार्ल्स ने एंड्रयू की गिरफ्तारी पर बयान दिया है। किंग चार्ल्स ने कहा कि एंड्रयू माउंटबेटन विंडसर के सार्वजनिक पद के दुरुपयोग की खबर मैंने अत्यंत चिंता के साथ सुनी है। अब इस मामले की पूर्ण, निष्पक्ष और उचित प्रक्रिया के तहत जांच होगी।
एंड्रयू पर लग चुके हैं यौन शोषण के संगीन आराेप
एंड्रयू माउंटबेटन विंडसर पर कई संगीन आरोप लगाए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार एपस्टीन मामले में एक पीड़िता ने आरोप लगाया था कि 2001 में जब वह 17 साल की थी तब प्रिंस एंड्रयू ने उनका यौन शोषण किया था। हालांकि, एंड्रयू ने उसके सभी आरोपों को खारिज किया था। पीड़िता की अप्रैल 2025 में मौत हो गई थी। इसकी वजह आत्महत्या बताई गई थी।
एपस्टीन से संबंधों को लेकर विवादों में रहे हैं एंड्रयू
अमेरिका में राजदूत पद से हटाए गए थे मैंडेलसन
क्या है पूरा मामला
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