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New Global Tariff : ट्रंप ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट को ठेंगा दिखाते हुए फिर पूरी दुनिया पर लगाया टैरिफ

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डोनाल्ड ट्रंप (साभार इंटरनेट)
  • भारत समेत पूरी दुनिया के ऊपर तत्काल लागू होंगे 10% ग्लोबल टैरिफ।

नई दिल्ली |

अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के 20 फरवरी को दिए ऐतिहासिक फैसले को ठेंगा दिखाते हुए पूरी दुनिया के ऊपर नए 10% टैरिफ का ऐलान करके चौंका दिया है।

ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर पोस्ट करके इसकी घोषणा की है, उनके मुताबिक नए टैरिफ तत्काल ही प्रभावी हो जाएंगे। एक दिन पहले ही पूरी दुनिया के लिए अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला राहत की खबर लाया था, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति के पिछले साल लगाए वैश्विक टैरिफ को रद्द कर दिया था। ट्रंप ने फैसले के कुछ घंटों बाद ही प्रेस वार्ता करके इसकी कड़ी आलोचना की। फिर सोशल मीडिया पोस्ट के जरिेए नए ग्लोबल टैरिफ का ऐलान भी कर दिया है जो भारत समेत पूरी दुनिया पर लागू हो जाएंगे।

ट्रंप ने जजों को ‘बेवकूफ’ कहा

ट्रंप ने अमेरिकी सर्वोच्च अदालत के फ़ैसले को “भयानक” बताया और उनकी व्यापार नीति को ख़ारिज करने वाले न्यायाधीशों को “बेवकूफ़” कहा। बता दें कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने व्हाइट हाउस की ओर से पिछले साल घोषित किए गए ज़्यादातर ग्लोबल टैरिफ़ को अवैध ठहराया। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने 6-3 के बहुमत से सुनाए फैसले में कहा कि राष्ट्रपति ने अपने अधिकारों से आगे बढ़कर फ़ैसला किया। टैरिफ लगाने के लिए आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, यह असंवैधानिक है। गौरतलब है कि ट्रंप के खिलाफ यह केस लड़कर जीतने वाले वकील नील कात्याल भारतीय मूल के हैं।

टैरिफ रिफंड पर क्या बोले ट्रंप

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद माना जा रहा है कि इससे संभावित रूप से अरबों डॉलर के टैरिफ़ रिफंड का रास्ता खुल गया है। हालांकि शुक्रवार को व्हाइट हाउस में मीडिया के सामने बोलते हुए ट्रंप ने संकेत दिया कि रिफंड बिना क़ानूनी लड़ाई के नहीं मिलेंगे। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि यह मामला वर्षों तक अदालत में उलझा रह सकता है।

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।

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बड़ी राहत : राष्ट्रपति ट्रंप के लगाए Global Tariff को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

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अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति के खिलाफ फैसला देकर पूरी दुनिया के लिए राहत पहुंचाई है। (तस्वीर - प्रतीकात्मक)
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति के खिलाफ फैसला देकर पूरी दुनिया के लिए राहत पहुंचाई है। (तस्वीर - प्रतीकात्मक)
  • अप्रैल-25 में ट्रंप ने दुनिया के कई देशों पर टैरिफ की घोषणा की थी।
  • अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
  • सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ को अवैध बताया, कहा- यह आपातकालीन शक्ति नहीं।

नई दिल्ली |

भारत समेत दुनिया के कई दर्जन देशों के ऊपर बड़े-बड़े टैरिफ लगा रहे राष्ट्रपति ट्रंप को एक बड़ा झटका लगा है जो दुनेियाभर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए राहत की खबर लाया है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (20 feb) को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए टैरिफ लगाने से जुड़ी नीति को असंवैधानिक करार दे दिया है।

सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा कि International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) अमेरिकी राष्ट्रपति को इस तरह से टैरिफ लगाने की अनुमति नहीं देता। बता दें कि राष्ट्रपति ट्रंप इस आपातकालीन शक्ति का इस्तेमाल टैरिफ लगाने के लिए करते आ रहे हैं। फिलहाल दुनिया की नजरें ट्रंप के अगले कदम पर लगी हैं।

इस फैसले के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके फैसले की कड़ी आलोचना की है और जजों को ‘बेवकूफ’ तक कह डाला। उन्होंने कहा कि यह फैसला अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका है।

बता दें कि पिछले साल अप्रैल में ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए दुनिया के कई देशों से आने वाले सामान पर भारी टैरिफ यानी आयात शुल्क लगा दिए थे। टैरिफ का मतलब होता है कि किसी देश से आने वाले सामान पर ज्यादा टैक्स लगाया जाए, ताकि वह महंगा हो जाए और घरेलू कंपनियों को फायदा मिले।

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Board of Peace : बिना सदस्यता के भारत मौजूद, ट्रंप बोले- रूस और चीन भी शामिल हों

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अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की अगुवाई वाले शांति बोर्ड की पहली बैठक के लिए जुटे कई देशों के नेता। (फोटो- X/@WhiteHouse)
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की अगुवाई वाले शांति बोर्ड की पहली बैठक के लिए जुटे कई देशों के नेता। (फोटो- X/@WhiteHouse)
  • गाजा संकट पर ट्रंप की पहल ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक
  • भारत ने पहली बैठक में ऑब्जर्वर देश के रूप में हिस्सा लिया
  • भारतीय दूतावास में कार्यवाहक राजदूत नामग्या खम्पा शामिल
  • ट्रंप ने चीन और रूस को शामिल करने के लिए निमंत्रण भेजा 

 

नई दिल्ली |

गाजा संकट पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गई पहल ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) की पहली बैठक में भारत बिना सदस्यता के एक पर्यवेक्षक यानी ऑब्जर्वर देश के रूप में शामिल हुआ। इस दौरान ट्रंप ने कहा कि कई देश इस बोर्ड में शामिल होने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और वह चीन, रूस को इसमें शामिल करना पसंद करेंगे। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि इन दोनों देशों को पहले ही निमंत्रण भेजा जा चुका है। भारत की तरफ से गुरुवार  (19 Feb) को वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास में कार्यवाहक राजदूत नामग्या सी खम्पा इस बैठक में मौजूद थे।

आइए जानते हैं बोर्ड ऑफ पीस की पहली बैठक में क्या-क्या हुआ ?

ट्रंप के शांति बोर्ड का लोगो जारी हुआ। (credit- X/Whitehouse)

ट्रंप के शांति बोर्ड का लोगो। (credit- X/Whitehouse)

ट्रंप ने कहा, अमेरिका संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करेगा

अमेरिकी राष्ट्रपति (US President) ने 9 सदस्य देशों कजाकिस्तान, अजरबैजान, यूएई, मोरक्को, बहरीन, कतर, सऊदी अरब, उज्बेकिस्तान और कुवैत ने गाजा के लिए राहत पैकेज हेतु कुल 7 अरब डॉलर देने पर सहमति जताई है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनके बहुत अच्छे संबंध हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करेगा. उसकी सुविधाओं को बेहतर बनाएगा और उसे आर्थिक मदद देगा ताकि वह ठीक से काम करता रहे।

ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका शांति बोर्ड के लिए 10 अरब डॉलर दे रहा है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि यह पैसा किस पर खर्च किया जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल के कमांडर मेजर जनरल जैस्पर जेफर्स ने कहा कि मोरक्को, कजाखस्तान, कोसोवो और अल्बानिया ने गाजा में हजारों सैनिक भेजने का वादा किया है। वहीं मिस्र और जॉर्डन ने वहां के कर्मियों को ट्रेनिंग देने की बात कही है।

गज़ा शांति समझौते के तहत बनाए गए बोर्ड ऑफ पीस के पीछे ट्रंप के दामाद का दिमाग है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

गज़ा शांति समझौते के तहत बनाए गए बोर्ड ऑफ पीस के पीछे ट्रंप के दामाद का दिमाग है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

कौन-कौन हुआ शामिल

वॉशिंगटन स्थित यूएस इंस्टीट्यूट ऑफ पीस में आयोजित बैठक में लगभग 50 देशों के अधिकारियों ने भाग लिया। इनमें 27 देश बोर्ड के सदस्य हैं, जिनमें अजरबैजान, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, इजराइल, जॉर्डन, मोरक्को, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्किये, संयुक्त अरब अमीरात, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। भारत और यूरोपीय संघ सहित अन्य देश पर्यवेक्षक के रूप में इसमें शामिल हुए।

भारत का क्या है रुख 

बोर्ड का हिस्सा बनने का निमंत्रण मिलने के बाद भारत ने तुरंत इस बारे में खुलासा नहीं किया कि वह इसे स्वीकार करेगा या नहीं।

भारत (India) दावोस में इसके शुभारंभ से भी दूर रहा, 12 फरवरी को भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि प्रस्ताव विचाराधीन है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया था कि शांति बोर्ड के संबंध में हमें अमेरिकी सरकार से इसमें शामिल होने का निमंत्रण मिला है। हम इस प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं और इसकी समीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि भारत ने पश्चिम एशिया में शांति को बढ़ावा देने वाले प्रयासों का हमेशा से समर्थन किया है। हालांकि, गुरुवार की बैठक में चार्ज डी’ अफेयर्स की उपस्थिति से ये क्लीयर हो गया कि भारत बोर्ड के साथ जुड़ने को तैयार है, भले ही वह अभी पूर्ण सदस्य बनने के लिए तैयार न हो।

बोर्ड ऑफ पीस क्या है?

यह बैठक ‘डोनाल्ड जे. ट्रंप इंस्टीट्यूट ऑफ पीस’ में आयोजित की गई। बोर्ड ऑफ पीस को ट्रंप ने पिछले महीने वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की सालाना बैठक में दावोस में पेश किया था। उस समय ट्रंप ने कहा था कि हर कोई इस संगठन का हिस्सा बनना चाहता है। उन्होंने यह भी कहा था कि यह संगठन आगे चलकर संयुक्त राष्ट्र (UN) को टक्कर दे सकता है। शुरुआत में इस बोर्ड का मकसद गाजा में इजरायल और हमास के बीच युद्धविराम की निगरानी करना था। साथ ही गाजा के पुनर्निर्माण और वहां के प्रशासन में भूमिका निभाने की बात थी, लेकिन बाद में ट्रंप की योजना इससे कहीं बड़ी हो गई। इसके चार्टर के अनुसार यह दुनिया के अन्य संघर्ष क्षेत्रों में भी शांति और स्थिरता के लिए काम कर सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद इस बोर्ड के चेयरमैन हैं।

 

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America-Iran conflict : फिर ईरान के सामने आया अमेरिका, क्या बड़े हमले की आहट‍?

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अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंच गया है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंच गया है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
  • ट्रंप ने दिए दो एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़ों को ईरान की खाड़ी पर तैनात करने  के आदेश।
  • दोनों देशों में तनाव चरम पर, ईरान का होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का संकेत।

नई दिल्ली |

अमेरिका (America) और ईरान (Iran) के बीच संघर्ष की आहट बढ़ती जा रही है। डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने दो एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़ों को ईरान की खाड़ी पर तैनात करने  के आदेश दे दिए। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। ईरान ने भी होर्मुज जलडमरूमध्य में एक युद्धाभ्यास कर इस क्षेत्र को पूरी तरह बंद करने का संकेत दिया, जो वैश्विक तेल सप्लाई में बाधा पहुंचाने वाला कदम साबित हो सकता है। गौरतलब है कि यह फारस की खाड़ी का संकीर्ण मुहाना है, जिसके जरिए दुनिया के व्यापारिक तेल के पांचवां हिस्से की आवाजाही होती है। यह मुहाना बंद होने से पूरी दुनिया का तेल व्यापार थमने से बड़ा संकट पैदा हो सकता है। 

फारस की खाड़ी के इस संकीर्ण मुहाने पर हुआ युद्धाभ्यास

फारस की खाड़ी के इस संकीर्ण मुहाने पर हुआ युद्धाभ्यास

ट्रंप बोले- 10 दिन में समझौता नहीं तो हमला होगा

वाशिंगटन डीसी में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उद्घाटन बैठक में ट्रंप ने परमाणु कार्यक्रम पर ईरान से चल रही बातचीत को लेकर बयान दिया। उन्होंने कहा

“हमें एक ऐसा समझौता करना होगा जो सार्थक हो, नहीं तो बुरी चीजें होंगी। अगले दस दिन में या तो हम ईरान के साथ समझौते पर पहुंच जाएंगे या फिर ईरान के ऊपर सैन्य हमला होगा।”

डोनाल्ड ट्रंप (साभार इंटरनेट)

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (साभार इंटरनेट)

हाल के दिनों में अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है उधर स्विट्जरलैंड में अमेरिकी और ईरानी वार्ताकारों के बीच बातचीत में प्रगति की भी खबरें आई हैं। डेमोक्रेटिक सांसदों और कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने अमेरिकी संसद की मंजूरी के बिना ईरान में किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई का विरोध जताया है।

 मध्यपूर्व में अमेरिकी युद्ध विमानों की गतिविधि बढ़ी (@DailyIranNews)

मध्यपूर्व में अमेरिकी युद्ध विमानों की गतिविधि बढ़ी (@DailyIranNews)

ईरान का जवाब- हम निर्णायक जवाब देंगे

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को गुरुवार(19 feb) को लिखे एक पत्र में ईरान के संयुक्त राष्ट्र राजदूत अमीर सईद इरावानी ने साफ शब्दों में कहा है कि वह अमेरिकी आक्रमकता का निर्णायक जवाब देंगे। उन्होंने कहा-
“ईरान युद्ध शुरू नहीं करेगा लेकिन किसी भी अमेरिकी आक्रामकता का जवाब निर्णायक और समानुपातिक रूप से दिया जाएगा।”
ईरान सरकार के सर्वोच्च नेता व अन्य प्रमुख नेता। (फाइल फोटो, साभार विकिमीडिया)

ईरान सरकार के सर्वोच्च नेता व अन्य प्रमुख नेता। (फाइल फोटो, साभार विकिमीडिया)

क्या है दोनों देशों की तैयारियां?

ईरान के पास ‘मिसाइल सिटी’
  • ईरान ने सुरंग निर्माण और अंडरग्राउंड इंजीनियरिंग का इस्तेमाल करते हुए उत्पादन, भंडारण और लॉन्च सिस्टम को जमीन के नीचे समाहित कर दिया है।
  • तथाकथित मिसाइल सिटी इसी रणनीति का हिस्सा हैं। हाल के वर्षों में ईरान ने मिसाइल फार्म जैसी अवधारणाएं भी सामने रखी हैं।
  • ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरंगें बिछाकर इस अहम मार्ग को बंद करने की कोशिश कर सकता है। बता दें कि यह प्रमुख व्यापार मार्ग है, जिसके बंद होने से अमेरिका समेत वैश्विक सामान की आवाजाही ब्लॉक हो सकती है।
अमेरिका के पास परमाणु विमान वाहक पोत
  • अमेरिका ने इस क्षेत्र में दो परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत तैनात किए हैं।  
  • वर्तमान में क्षेत्र में कुल 13 विध्वंसक पोत तैनात किए जा चुके हैं।
  • पूरे पश्चिम एशिया क्षेत्र में लगभग 30,000 से 40,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं।
  • ईरानी मिसाइलों के जवाबी हमले से सुरक्षा के लिए पेंटागन ने क्षेत्र में अतिरिक्त पैट्रियट और एयर डिफेंस सिस्टम (THAAD) हवाई रक्षा प्रणालियां तैनात की हैं।

ईरान-अमेरिका के बीच कैसे-क्यों भड़का तनाव 

ईरान-अमेरिका के बीच तनाव दिसंबर 2025 में ईरान में महंगाई को लेकर विरोध प्रदर्शनों और उसके खिलाफ सरकारी कार्रवाई के बीच बढ़ा। तनाव की एक और वजह इस दौरान अमेरिका की ओर से पश्चिम एशिया में की गई सैन्य तैनाती भी रही, जिसके जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ईरान के अयातुल्ला शासन को खत्म करने की चेतावनी दे रहे हैं। ईरान का परमाणु कार्यक्रम हमेशा से ही दोनों पक्षों में तनाव का कारण रहा है।
मध्य पूर्व में वर्चस्व चाहता है अमेरिका 
मध्य पूर्व में अमेरिका अपने सहयोगी इजरायल के जरिए वर्चस्व कायम रखना चाहता है, जिसमें उसे सबसे ज्यादा चुनौती ईरान से मिलती रही है। पिछले साल ईरान पर इजरायल ने कई मिसाइल हमले किए थे। अमेरिका दावा करता है कि ईरान तमाम प्रतिबंधों के बाद भी यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को जारी रखे है। इसके अलावा सऊदी अरब, यूएई भी अलग-अलग मौकों पर ईरान को लेकर खतरा जताते रहे हैं।

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