आज के अखबार
वक्फ़ मामले में सरकार की लाइन पर हिन्दी अखबार
अरबी का लफ्ज़ ‘वक्फ’ इन दिनों इंटरनेट पर कीवर्ड बन चुका है। कारण ..ये कि बीते एक सप्ताह के भीतर वक्फ बोर्ड की शक्तियां घटाने की सरकारी कोशिशों पर खूब खबरें छपीं। 8 अगस्त को मोदी नेतृत्व वाली एनडीए सरकार इस पर संसद में संशोधन विधेयक भी ले आई। पर विपक्ष के विरोध व गठबंधन दलों की शंकाओं के बाद इस संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया है। यानी अब इस मामले में कोई भी बदलाव तभी हो पाएगा, जब विपक्षी दल भी उन बदलावों से सहमत होंगे। इस मामले पर विपक्ष का कहना है कि केंद्र सरकार मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को खत्म करना चाहती है, जिसके क्रम में वक्फ बोर्ड के कानून में संशोधन लाया जा रहा है।
इस मामले पर अखबारों की कवरेज इसलिए देखी जानी चाहिए ताकि बतौर पाठक आप तक पहुंचाई जा रही सूचनाओं की सच्चाई से आप अवगत हो सकें। आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं कि आखिर यह वक्फ है क्या, और ये खबर पैदा कैसे हुई क्योंकि सरकार ने बिल लाने से पहले संसद को कोई पूर्व सूचना नहीं दी थी।
वक्फ का मतलब दान देना – किसी चल-अचल संपत्ति को इस्लाम को मानने वाले लोग धार्मिक, गरीबों की मदद (चैरिटेबल) कार्यों के लिए दान दे दें तो इस नेक काम को वक्फ कहा जाता है।
वक्फ बोर्ड के अधिकार – मुस्लिम समाज के बुजुर्गों ने अब तक जो संपत्तियां दान की हैं, उनका मैनेजमेंट हर राज्य का वक्फ बोर्ड करता है और इन संपत्तियों का मालिकाना हक अल्लाह को माना जाता है। वक्फ बोर्ड को प्रबंधन की शक्तियां साल 1950 मेेें लागू हुए वक्फ अधिनियम से मिलती है। इसके जरिए बोर्ड, वक्फ के रूप में दान में दी गईं व अधिसूचित संपत्तियों को नियंत्रित करता है। 2013 में वक्फ बोर्ड में संशोधन किए गए थे, अब की केंद्र सरकार का कहना है कि 2013 में हुए संशोधनों ने वक्फ को किसी भी संपत्ति को अपना बताने का अनावश्यक अधिकार दे दिया, जिसके चलते ये जब चाहे संपत्तियों पर हक जमा लेते हैं और इसी के चलते सरकार इस एक्ट में बदलाव लाना चाहती है।
अखबारी कवरेज – सोर्स को क्रेडिट दिए बिना ही लिखीं खबरें
पहले यह जान लीजिए कि वक्फ बोर्ड में बदलाव की ये खबर आखिर आई कैसे? दरअसल, समाचार एजेंसी आईएनएस ने सूत्रों के हवाले से चार अगस्त को खबर ब्रेक की कि वक्फ बोर्ड में संशोधन का विधेयक इसी संसद सत्र में आ सकता है। इसी के आधार पर सभी अखबारों ने पांच अगस्त के एडिशन में इस खबर को कवर किया है। ये बात अलग है कि आपको खबर पढ़ते हुए इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल होगा कि हिन्दी के प्रमुख अखबार (जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान) किस आधार पर यह खबर छाप रहे हैं।
दैनिक जागरण ने वक्फ बोर्ड एक्ट में संभावित बदलावों को पहली खबर बनाया है। इसी मामले पर अंदर फुल पेज कवरेज है और संपादकीय लिखकर भी दैनिक जागरण ने एनडीए सरकार के इस संभावित कदम को सराहा है। इस संपादकीय की हेडिंग है- ‘सुधार की नई पहल’ । इसी खबर को अमर उजाला ने भी पहले पन्ने पर प्रमुखता दी है, हेडिंग है — ‘किसी संपत्ति को अपना घोषित नहीं कर पाएंगे वक्फ बोर्ड’। दैनिक हिन्दुस्तान ने भी आसार जताते हुए पहले पन्ने पर स्टोरी लगाई है, जिसकी हेडिंग सधी हुई है – ‘वक्फ संशोधन विधेयक संसद में पेश करने की तैयारी’।
जागरण ने अपनी खबर में लिखा है कि केंद्र सरकार इस कानून को इसलिए ला रही है क्योंकि आम मुस्लिम व मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने इस कानून में सुधार की मांग उठाई थी। हालांकि अखबार अपनी बात को आधार देने के लिए एक भी मुस्लिम बुद्धिजीवी को कोट नहीं कर पाया है।
वक्फ बोर्ड से जुड़े आंकड़ों में फेर और अमर उजाला की भाषा
दैनिक जागरण ने लिखा है कि पूरे देश में 30 वक्फ बोर्ड से हर साल करीब दो सौ करोड़ राजस्व मिलने का अनुमान है। मूल रूप से वक्फ की 52 हजार संपत्तियां थीं जिसकी संख्या बढ़कर 8,72,292 हो गई है। अब अमर उजाला के आंकड़े और भाषा देखिए… लिखा है कि देश में तीस वक्फ बोर्ड हैं, इनका देश की 9.4 लाख एकड़ जमीन पर कब्जा है। अमर उजाला जमीन के स्वामित्व को कब्जा लिख रहा है, इस शब्द के इस्तेमाल के ही पता लगता है कि वक्फ की संपत्तियों को अखबार कब्जाई संपत्तियां बता रहा है। खबर में यह भी बताया है कि सबसे अमीर बोर्ड यूपी, दिल्ली और बिहार का है। कब्जा और अमीर जैसे शब्दों के भाव बता रहे हैं, अमर उजाला इस मामले में वक्फ को लेकर क्या राय रखता है, जबकि खबर में बतौर मीडिया संस्थान अपने विचार नहीं रखे जा सकते, इसके लिए संपादकीय का पन्ना आरक्षित होता है।
अंग्रेजी अखबारों ने वक्फ के विरोध को दी प्राथमिकता
इसी मामले पर अंग्रेजी अखबार The Indian Express की कवरेज में अहम बात ये है कि उन्होंने भले समाचार एजेंसी का नाम नहीं लिया (इन वायर एजेंसियों की सेवाएं खरीदी जाती हैं ) लेकिन अपनी खबर की शुरूआत इसी बात से की कि मीडिया रिपोर्टों के आधार पर वक्फ बोर्ड में बदलाव की संभावना है। साथ ही, इस अखबार ने यह भी स्पष्ट किया कि इन खबरों को उन्होंने सरकार से जुड़े अपने सूत्रों से भी वेरिफाई किया है कि संशोधन विधेयक इसी सत्र में लाया जाएगा।
एक्सप्रेस ने इस मामले में ऑल इंडिया मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड के जारी किए गए बयान को विस्तार से छापा है कि वक्फ को कमजोर करने से जुड़ा सरकार का कोई कदम उन्हें स्वीकार नहीं होगा। मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. एसक्यूआर इलियास के हवाले से अखबार ने यह भी बताया कि वक्फ एक्ट व वक्फ जमीनों को भारतीय संविधान व शरियत एप्लीकेशन एक्ट – 1937 से संरक्षित है, इसमेेें सरकार कोई ऐसा बदलाव नहीं कर सकती जो इस अधिनियम की प्रकृति और वक्फ संपत्तियों की स्थितियों में बदलाव ला सके। Express की हेडिंग है — Amid talk of Bill to Amend wakf act, Muslim Personal law Board urges BJP allies, Opp leaders to oppose move. ( अनुवाद – वक्फ मेें बदलाव की चर्चा के बीच पर्सनल लॉ बोर्ड की बीजेपी सहयोगी दलों व विपक्षी नेतृत्व से विरोध की अपील )
The Hindu की बात करें तो इस अखबार ने पर्सनल लॉ बोर्ड व एआईएमआईएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष नेता असदुद्दीन ओवैसी के बयानों के आधार पर खबर लगाई है। इसकी हेडिंग है— Any change in Wakf Act will not be tolerated, says Muslim Personal Law Board (अनुवाद – वक्फ एक्ट में कोई बदलाव सहन नहीं होगा)।
विपक्षी दलों ने जताया विरोध पर कांग्रेस चुप
छह अगस्त के एडिशन में हिन्दी के तीनों प्रमुख अखबार व अंग्रेजी में एक्सप्रेस ने इस मुद्दे पर फॉलोअप किया। हिन्दी अखबारों ने लिखा कि सच्चर कमेटी की सिफारिशों व संसद की वक्फ पर आई एक रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार अपने कदम का बचाव करेगी। दैनिक हिन्दुस्तान के मुताबिक, इन दोनों में ही वक्फ एक्ट में संशोधन की जरूरत पर बताई गई थी। बाद में यह बात सच भी साबित हुई जब संसद में किरेन रिजिजू ने इन दोनों बातों को सरकार के बचाव के तौर पर रखा। वहीं, इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा कि विपक्षी दल राजद, सपा, शिवसेना (उद्दव गुट) ने इसका विरोध करने से जुड़ा बयान दिया है जबकि अबतक कांग्रेस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
जब कोर्ट बोला– तो क्या ताजमहल को वक्फ का घोषित कर दें!
वक्फ पर अखबारी रिपोर्टिंग यहीं नहीं रुकी, सात अगस्त को दैनिक जागरण ने पहले पन्ने पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एक टिप्पणी को पहले पन्ने की एंकर स्टोरी बनाया। हेडिंग – क्या ताजमहल और लाल किला भी वक्फ प्रॉपर्टी घोषित कर दें..। मामला मुगल बादशाह की बहू की कब्र समेत तीन ऐतिहासिक इमारतों पर वक्फ के दावे से जुड़ा है जिसमें वक्फ का कहना है कि एएसआई ने उनकी जमीन पर अतिक्रमण कर लिया है। इस सुनवाई के दौरान अदालत ने ये टिप्पणी की है। जाहिर है कि कुछ मामलों में सरकारी जमीनों व वक्फ की जमीनों के बीच विवाद बने हुए हैं।
किरेन रिजिजू बोले- बिल ला रहे, दरगाह प्रतिनिधियों ने समर्थन किया
वक्फ में मामले पर द हिन्दू से अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि गरीब मुस्लिम समूहों की मांग के चलते सरकार वक्फ में बदलाव करने जा रही है। इस खबर में बताया गया है कि वक्फ एक्ट में बदलाव की जानकारी मिलने के बाद सोमवार को ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल ने रिजिजू से मिलकर इसका समर्थन किया। इनका कहना है कि वक्फ की जमीनों में दरगाहें सबसे बड़ी पक्षकार हैं लेकिन इस एक्ट के चलते इनके साथ भेदभाव हो रहा है। साथ ही, शिया मुस्लिमों के कुछ समूहों ने भी सरकार के कदम का समर्थन किया है।
वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिम की एंट्री, डीएम को शक्तियां
द हिन्दू व इंडियन एक्सप्रेस ने आठ अगस्त को पहले पन्ने पर प्रस्तावित संशोधनों को लेकर खबर दी कि संसद में इस सप्ताह प्रस्तावित हो सकने वाले बिल में यह बदलाव भी प्रस्तावित है कि इसमें दो गैर मुस्लिम सदस्य शामिल होंगे व दो मुस्लिम महिला सदस्य भी होंगी। इसके अलावा, वक्फ जिन जमीनों को अपने होने का दावा करेगा, उनका सत्यापन डीएम करेगा न कि वक्फ ट्रिव्यूनल। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर में यह भी बताया है कि उपयोग के आधार पर वक्फ के प्रावधान को भी नया संशोधन खत्म कर देगा। इससे कई ऐसी जमीनों को लेकर समस्या आएगी जिनका वक्फनामा नहीं बना हुआ है और उन्हें मौखिक रूप से वक्फ किया गया था और अब वह धार्मिक उपयोग में आ रही है, जैसे- मस्जिद की जमीन। यह भी लिखा गया है कि यह कानून लागू होने के बाद जितने भी ‘विवादित’ मामले हैं, उनका सत्यापन दोबारा कराया जाएगा। यानी विशेषज्ञ मान रहे हैं कि जिन मामलों में वक्फनामा न हुआ हो, नए नियम के बाद उन्हें विवादित मानते हुए डीएम सत्यापित कर सकता है कि वह सरकारी जमीन मानी जाएगी या फिर वक्फ की।
बिल JCP को क्यों गया, हिन्दी अखबार चुप्पी साध गए
लोकसभा में आठ अगस्त को पेेश किए जाने के बाद आखिर वक्फ सुधार विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेसीपी) के पास क्यों भेज दिया गया, इस बारे मेें नौ अगस्त के संस्करणों में दैनिक जागरण, अमर उजाला ने कारण स्पष्ट नहीं किया। उल्टा जागरण ने लिखा कि सरकार ने खुद इस विधेयक को जेसीपी के पास भेजकर संदेश दे दिया कि वह इसपर कोई विवाद नहीं चाहती। जागरण ने ठीक यही सराहना अपने संपादकीय पर भी की है। फ्रंट पेज की पहली खबर की हेडिंग काफी हल्की है – ‘वक्फ बोर्ड में सुधार का बिल पेश।’ कह सकते हैं कि इसे हल्का जानबूझकर रखा गया है क्योंकि सरकार समर्थित माना जाने वाला यह अखबार अपने पाठकोें को यह कैसे बताएगा कि जिस बिल को लेकर इतना माहौल बनाया गया था, उसे अब और मंथन के लिए ऐसी समिति के पास भेज दिया गया है जिसमें विपक्षी दल भी शामिल होंगे। पूरी खबर में अखबार ने कहीं नहीं लिखा कि एनडीए के सहयोगी दलों ने बिल को सशर्त समर्थन दिया है। अमर उजाला ने भी इसे पहले पन्ने की लीड बनाया जिसकी हेडिंग है – वक्फ संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश, विचार के लिए जेसीपी भेजा।
हालांकि अमर उजाला की हेडिंग में ये बात शामिल है। हेडिंग – ‘वक्फ संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश, विचार के लिए भेजा गया।’ दैनिक हिन्दुस्तान नेे इस खबर को विशेष महत्व न देते हुए एक कॉलम पहले पन्ने पर लगाया जिसकी हेडिंग है – वक्फ संशोधन बिल विरोध के बीच पेश। अंदर लिखा है कि इंडिया गठबंधन को इस मामले पर वाईएसआर कांग्रेस का साथ मिल गया जबकि जदयू व टीडीपी सरकार के साथ है। द हिन्दू ने भी अमर उजाला के एंगल पर ही खबर लगाई है लेकिन तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के सांसद के हवाले से लिखा है कि ‘वे इस विधेयक का समर्थन करते हैं, अगर इसे विचार के लिए संसदीय समिति को भेज दिया जाता है।’ मतलब साफ है कि सहयोगी दल ने सशर्त समर्थन दिया है, इसी एंगल को एक्सप्रेस ने उठाते हुए पहले पन्ने पर ये खबर बनाई है – सहयोगी दलों के भी चिंता जताने के बाद सरकार ने संसदीय पैनल को भेजा वक्फ बिल (हिन्दी अनुवाद) । इसी दिन एक्सप्रेस ने वक्फ व इस अधिनियम के प्रस्तावित बदलावों पर आधे पन्ने का एक्सप्लेनर भी प्रकाशित किया है।
आज के अखबार
‘जिनके 6 से ज्यादा भाई-बहन, वे कागज़ लाकर साबित करें पिता का नाम’: SIR में प. बंगाल के 23 लाख वोटरों को नोटिस
- चुनाव आयोग ने अपने सॉफ्टवेयर में लॉजिकल अनियमितता के आधार पर ये वोटर चिन्हित किए हैं।
23.64 लाख वोटरों को भेजा जा रहा नोटिस
SIR वाले 11 राज्यों में जारी हो सकता है नोटिस
- SIR के दौरान ECI ने पाया कि कुछ परिवारों में 6-10 या उससे ज्यादा भाई-बहनों के नाम एक ही पिता के साथ दर्ज हैं।
- ECI का मानना है कि यह फर्जी वोटरों या पुराने रिकॉर्ड्स की गड़बड़ी हो सकती है।
- ऐसे मतदाताओं को नोटिस जारी कर पिता का नाम साबित करने के लिए दस्तावेज (जैसे जन्म प्रमाण पत्र, आधार, राशन कार्ड, स्कूल सर्टिफिकेट आदि) मांगे गए हैं।
- अगर दस्तावेज नहीं दिए गए तो नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा सकते हैं।
आज के अखबार
MP : गो-मूत्र से कैंसर का इलाज ढूंढने के नाम पर ₹3.5 करोड़ से हुई रिसर्च, जांच में मिला बड़ा घोटाला
- नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर को 2011 में मिला था रिसर्च के लिए फंड।
नई दिल्ली|
मध्य प्रदेश में गौमूत्र और गोबर से कैंसर जैसे गंभीर रोगों का इलाज करने का दावा करने वाले एक रिसर्च प्रोजेक्ट में भारी घोटाले का मामला सामने आया है। नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर ने 2011 में इस विषय पर रिसर्च के लिए राज्य सरकार से 8 करोड़ रूपये की मदद मांगी थी। सरकार ने अपनी पंचगव्य योजना के तहत विश्वविद्यालय को 3.5 करोड़ रुपये स्वीकृत किए थे।
लगभग दस साल बाद विवाद शुरू होने पर डिविजनल कमिश्नर ने जिला कलेक्टर से जांच कराई। जांच रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं-
- विश्वविद्यालय ने गोबर, गोमूत्र, स्टोरेज उपकरण, कच्चा माल और प्रयोग से जुड़े सामान खरीदने पर 1.92 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि इन सामानों की वास्तविक कीमत सिर्फ 15-20 लाख रुपये थी।
- रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए मिले सरकारी फंड से 7.5 लाख रुपये की एक गाड़ी खरीदी गई, जो प्रोजेक्ट के प्रस्तावित खर्च में शामिल ही नहीं थी।
- इतना ही नहीं, तेल और मेंटेनेंस के नाम पर भी फंड का दुरुपयोग किया गया।
- रिसर्च के लिए कई शहरों की हवाई यात्रा की गई, कुछ ट्रेनिंग दिए जाने जिक्र है पर उसकी विस्तृत जानकारी प्रोजेक्ट में नहीं दी गई है।
इंडियन एक्सप्रेस ने इस जांच रिपोर्ट का विस्तार से खुलासा किया है। जांच में पाया गया कि प्रोजेक्ट में भारी अनियमितताएं हुई हैं और सरकारी धन का गलत इस्तेमाल किया गया। अब यह रिपोर्ट आगे भेजी जाएगी, जिसके आधार पर यूनिवर्सिटी पर ऐक्शन हो सकता है। दूसरी ओर, यूनिवर्सिटी ने प्रोजेक्ट में किसी भी अनियमितता से इनकार किया है।
क्या है पंचगव्य योजना ?
पंचगव्य योजना देश के कुछ राज्यों में चलाई जा रही है जिसका मुख्य उद्देश्य गाय के पांच उत्पादों जिसे पंचगव्य कहा जाता है ( जैसे- गौमूत्र, गोबर, दूध, दही और घी) के औषधीय, कृषि और औद्योगिक उपयोग को बढ़ावा दिया जाए। सरकारों का कहना है कि इस योजना के जरिए गौ-आधारित अर्थव्यवस्था और आयुर्वेदिक व परंपरागत ज्ञान को वैज्ञानिक आधार देने की शुरूआत होगी।
आज के अखबार
दिल्ली दंगा केस: उमर ख़ालिद को ज़मानत न मिलने पर अखबारों ने क्या लिखा?
नई दिल्ली|
सुप्रीम कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगों की कथित साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी, जबकि कुछ अन्य आरोपियों को जमानत दे दी। इस फैसले की सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचना हुई और देश के प्रमुख अखबारों विशेषकर अंग्रेजी अखबारों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कड़ा रुख दिखाया है।
द हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स ने मुख्यरूप से इस बात पर चिंता जतायी है कि सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए के तहत जमानत देते हुए अपराध से जुड़ी भूमिका के पदानुक्रम (Hierarchy) को महत्व दिया है और कहा है कि उमर व शरजील मुख्य साजिशकर्ता थे इसलिए बेल नहीं दी जा सकती। ट्रायल शुरू न हो पाना बेल पाने का ट्रंप कार्ड नहीं हो सकता। जबकि इस मामले से जुड़े पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी गई है।
द हिंदू: भूमिकाओं का पदानुक्रम (Hierarchy of Roles)
इंडियन एक्सप्रेस: सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली दंगे पर आदेश गहरी चिंता पैदा करने वाला (Supreme Court’s bail order in Delhi riots case raises deep concerns)
हिंदुस्तान टाइम्स: जब प्रक्रिया ही सजा बन जाए (When Process is Punishment)
अखबार ने लिखा कि खालिद की पांच साल की ट्रायल पूर्व कैद के बावजूद जमानत से इनकार किया जाना चिंताजनक है। यूएपीए जैसे कठोर कानूनों में जमानत मिलना मुश्किल होता है, क्योंकि यह कानून आरोपी पर ही खुद को निर्दोष साबित करने का बोझ डालता है। कोर्ट ने खालिद की भूमिका को साजिश से जुड़ा बताया जो हिंसा से अलग और उससे जुड़ी हुई है। पर यह व्याख्या खतरनाक है क्योंकि यह राज्य को बिना ठोस सबूत के आरोपी को लंबी हिरासत की शक्ति देती है। कई सह-अभियुक्तों को जमानत मिल चुकी है, लेकिन उमर खालिद को दिल्ली दंगे में “भूमिकाओं के पदानुक्रम” में ऊपर रखकर जमानत से इनकार किया गया। यूएपीए का दुरुपयोग राजनीतिक असहमति दबाने में हो रहा है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
अमर उजाला: देशविरोधी मामलों में कोई नरमी नहीं
अखबार ने अपने सरकार समर्थित रूख के हिसाब से ही संपादकीय में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सराहना की है। हिन्दी के किसी भी अन्य अखबार ने इस फैसले पर संपादकीय नहीं लिखा। अमर उजाला लिखता है कि कोर्ट ने सख्त संदेश दिया कि ‘देशविरोधी’ गतिविधियों में कोई रियायत नहीं। अखबार कहता है कि सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि दंगे सुनियोजित थे, खालिद–इमाम की भूमिका गंभीर थी। अन्य आरोपियों को जमानत मिलना सही, लेकिन लंबी हिरासत जमानत का आधार नहीं बन सकती, यह फैसला राष्ट्रविरोधी तत्वों को कड़ा सबक है।
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Shivangi
August 10, 2024 at 5:22 pm
शुरूआत में भले लगा हो कि नरेंद्र मोदी पुराने तरीके से ही सरकार चलाते रहेंगे लेकिन जैसे-जैसे वे पुराने तरीकों वाले कदम आगे बढ़ा रहे हैं, उनके सहयोगी दलों की नाराजगी के चलते उन्हें कदम पीछे खींचने पड़ रहे हैं। अच्छा है कि अब देश में विपक्ष भी है और सत्ता के सहयोगी दलों की असहमतियां भी ये भूमिका निभा दे रही हैं।
Ricky Singh
August 10, 2024 at 6:42 pm
आज का अखबार का कॉन्सेप्ट बढ़िया है। मुद्दे को अच्छे से समझाया गया है। शानदार। बोलते पन्ने टीम को बधाई।