आज के अखबार
कब्जे से जुड़ी ट्रंप की धमकियों के बीच क्या सोच रहे ग्रीनलैंड के लोग?
- न्यूयॉर्क टाइम्स ने ग्रीनलैंड के लोगों से बातचीत के आधार पर प्रकाशित की रिपोर्ट।
नई दिल्ली|
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को खरीदने या अमेरिका में उसे शामिल करने की बात बार-बार दोहराई जा रही है, इसको लेकर ग्रीनलैंड के लोग बेहद परेशान हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में ग्रीनलैंड की राजधानी नूउक और अन्य शहरों में लोगों से बातचीत के आधार पर बताया गया है कि वे हैरान-परेशान और गुस्से और डर के मिश्रित भावों से जूझ रहे हैं।
अख़बार की यह रिपोर्ट ग्रीनलैंड और डेनमार्क के विदेशमंत्रियों के अमेरिकी विदेशमंत्री के साथ हुई मुलाक़ात के दिन प्रकाशित हुई है। ट्रंप की घोषणा से ग्रीनलैंड के 57,000 लोग डरे हुए हैं कि कहीं उनकी किस्मत बाहर के लोग तय न करने लगें। बता दें कि ग्रीनलैंड, डेनमार्क देश का एक स्वायत्त क्षेत्र है, लेकिन अपनी संस्कृति और पहचान को लेकर बहुत संवेदनशील है।
ट्रंप क्यों चाहते हैं ग्रीनलैंड
ट्रंप का कहना है कि डेनमार्क, ग्रीनलैंड की सुरक्षा नहीं कर सकता। उनका कहना है कि आगे चलकर रूस या चीन इसे कब्जा सकते हैं और वे नहीं चाहते कि अमेरिका के पड़ोसी रूस-चीन हों, यह उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में भी ग्रीनलैंड को खरीदने की बात कह चुके हैं तब इसे ग्रीनलैंड ने ‘मूर्खतापूर्ण’ बताया था। वेनेजुएला में नियंत्रण करने के बाद ट्रंप ने दोबारा ग्रीनलैंड पर दावा दोहराया है, इस पर ग्रीनलैंड की संसद में विदेश नीति समिति की प्रमुख विवियन मोत्ज़फेल्ट ने कहा है कि हम अपनी आत्मा नहीं बेचेंगे, हम मूर्ख नहीं हैं।
ग्रीनलैंड किस तरह डेनमार्क का उपनिवेश बना?
ग्रीनलैंड पर डेनमार्क का दावा 18वीं सदी से है। यहां 1721 में डेनिश मिशनरी ने पहली कॉलोनी बसाई। साल 1953 में ग्रीनलैंड को डेनमार्क का अभिन्न अंग घोषित किया गया। फिर साल 1979 में होम रूल दिया गया और 2009 में ग्रीनलैंड को स्व-शासन (Self-Rule) मिला। लेकिन ग्रीनलैंड की विदेश नीति, रक्षा और मुद्रा अभी भी डेनमार्क के नियंत्रण में हैं।
ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व क्या ?
ग्रीनलैंड का सबसे नजदीकी बिंदु अमेरिका के अलास्का से लगभग 3,200 किलोमीटर दूर है। ग्रीनलैंड की राजधानी नूउक (दक्षिणी हिस्सा) से अमेरिका की मुख्य भूमि (न्यूयॉर्क) की दूसरी करीब 4,000 से 4,500 किलोमीटर दूर है। यह दूरी उत्तर ध्रुव के करीब होने के कारण रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी और व्यापारिक रास्ता यहां से होकर गुजरता है।
आज के अखबार
अमेरिकी मीडिया का दावा- ‘ईरान को खुफिया मदद दे रहा रूस’
- दावा है कि रूसी खुफिया मदद से ईरान अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना पा रहा है।
नई दिल्ली| अमेरिकी मीडिया ने 7 मार्च को दावा किया है कि रूस ईरान को ऐसी खुफिया जानकारी उपलब्ध करवा रहा है, जिसके जरिए वह पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य ठिकानों, अमेरिकी लड़ाकू विमानों व अन्य अमेरिकी संपत्तियों पर हमला कर पा रहा है। रूसी मीडिया ने लिखा है कि अमेरिकी मीडिया के इस दावे पर रूस सरकार ने सीधे कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
लेकिन रूसी राष्ट्रपति पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने 5 मार्च को बयान दिया था कि ईरान ने उससे कोई सैन्य मदद नहीं मांगी है।
दावा- ‘हमले से ईरानी क्षमता घटी इसलिए मदद मांगी’
अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट व अमेरिकी समाचार एजेंसी एसोसिएट प्रेस (AP) ने अपनी रिपोर्ट में ऐसा दावा किया है। दोनों मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले हफ्ते अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हुए हमलों के बाद ईरानी सेना की अमेरिकी ठिकानों का पता लगाने की क्षमता कमजोर हो गई है। इसके बाद ईरान इसका पता लगाने के लिए रूस की मदद ले रहा है।
‘रूस की खुफिया जानकारी से हमले कर पा रहा’
वॉशिंगटन पोस्ट ने तीन अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा है कि रूस ईरान को ऐसी टारगेटिंग इंटेलिजेंस दे रहा है, जिससे वह अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना सके।
एसोसिएट प्रेस की रिपोर्ट में अमेरिकी खुफिया विभाग के दो अधिकारियों के हवाले से यही दावा किया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पश्चिम एशिया क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों के अलावा, अमेरिकी हवाई जहाज व अन्य संपत्तियों पर भी ईरान इसलिए हमला कर पा रहा है क्योंकि उनकी लोकेशन पता करने में रूस मदद कर रहा है।
व्हाइट हाउस की प्रतिक्रिया जानिए
एपी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति आवास ने इन दावों को कमतर आंका है। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट ने शुक्रवार (6 march) को इन रिपोर्टों पर कहा, “इससे साफ तौर पर ईरान में चल रहे हमारे सैन्य अभियानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि हम उन्हें पूरी तरह तबाह कर रहे हैं।”
साथ ही, व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी लेविट ने पत्रकारों को यह बताने से इनकार कर दिया कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से कथित खुफिया जानकारी साझा करने के बारे में बात की या नहीं? उन्होंने कहा कि वे चाहती हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप खुद ही इस पर बोलें।
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भारत-EU संयुक्त बयान में ऐसा क्या, जिसे यूक्रेन पर भारत के बदले रुख की तरह देखा जा रहा?
- भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में रूस-यूक्रेन युद्ध पर संयुक्त बयान जारी हुआ जो नई दिल्ली के पुराने रूख से अलग।
नई दिल्ली|
भारत और यूरोपीय संघ के बीच 27 जनवरी को हुई शिखर वार्ता के दौरान FTA समझौते पर वार्ता पूरी होने के साथ एक और अहम घटना हुई। भारत-यूरोपीय संघ ने रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें इस युद्ध को लेकर भारत का बयान अपने पूर्व के बयानों से अलग है। संयुक्त बयान में भारत-यूरोपीय संघ ने कहा है कि “वे ऐसे प्रयासों का समर्थन करेंगे जो स्वतंत्रता, संप्रभु, क्षेत्रीय अखंडता पर आधारित हो।”
द इंडियन एक्सप्रेस ने इस बयान को लेकर लिखा है कि भारत का यह बयान यूक्रेन पर उसके पुराने रूख से बिल्कुल अलग है क्योंकि चार साल से जारी युद्ध को लेकर कभी भारत ने यूक्रेन पर रूसी आक्रामकता का खंडन नहीं किया था। भारत का यह रूख ही पिछले चार साल से यूरोपीय संघ और भारत के बीच बड़ा रोड़ा बना हुआ था। अखबार ने लिखा है कि भारत की नई पोजिशन रूस हित के विपरीत है क्योंकि 2022 में रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण करके उसकी स्वतंत्रता, संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता को प्रभावित किया है।
EU ने भारत से रूस पर दवाब डालने को कहा
द हिन्दू ने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काज़ा कल्लास के हवाले से लिखा है कि शिखर सम्मेलन के दौरान यूरोपीय संघ ने भारत से कहा कि वह रूस पर यूक्रेन युद्ध को लेकर दवाब बनाए। कल्लास ने शिखर सम्मेलन के तुरंत बाद हुए थिंक टैंक इवेंट में कहा कि रूस ने यूक्रेन के साथ संघर्ष विराम पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया है और आम नागरिकों पर बमबारी कर रहा है। इस मामले में हमने अपने भारतीय सहयोगी से कहा है कि वे रूस पर शांति के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए दवाब बनाएं।
बोर्ड ऑफ पीस पर क्या रूख ?
ट्रंप के बनाए Board of Peace को लेकर भी संयुक्त बयान में जिक्र है, अखबार के मुताबिक दोनों ने इसके गज़ा में शांति व पुर्ननिर्माण के उद्देश्य से समर्थन जताया है, हालांकि दोनों ही इसके उद्देश्य को गज़ा तक ही सीमित रखने का संकेत दे रहे हैं। दोनों ने ही अब तक ट्रंप के बनाए इस बोर्ड को ज्वाइन नहीं किया है।
ईरान पर क्या रुख ?
ईरान में हुए प्रदर्शन को लेकर संयुक्त बयान में कहा गया है कि वे चाहते हैं कि इस स्थिति को डिप्लोमेसी व वार्ता के जरिए सुलझाया जाए। अखबार का कहना है कि इस तरह भारत व ईयू ब्लॉक संदेश दे रहा है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका व यूरोपीय संघ की आक्रामकता के वे पक्षधर नहीं हैं।
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