रिपोर्टर की डायरी
डालमिया नगर: 40 साल बाद भी बिहार के हर चुनाव में क्यों जिंदा हो जाती है इसकी याद?
- रोहतास जिले में 3800 एकड़ में फैले इंडस्ट्रियल टाउनशिप में कई फैक्ट्रियां चलती थीं।
देहरी (रोहतास) | अविनाश श्रीवास्तव
आज किसी के लिए यकीन करना मुश्किल हो सकता है कि 40 साल पहले बिहार में एक इंडस्ट्रियल टाउनशिप (Industrial township) थी जिससे हजारों-हजार लोगों को रोजगार मिल रहा था। यहां बिहार ही नहीं, यूपी और पंजाब के लोग भी आकर नौकरी कर रहे थे। डालमिया नगर (Dalmia Nagar) नाम की इस टाउनशिप में कई तरह की फैक्ट्रियां थीं जिसमें सीमेंट, कागज, चीनी से लेकर वनस्पति घी तक बनता था। पर बिहार की भ्रष्ट उद्योग नीति (Bihar Industrial Policy) ने उस टाउनशिप को उजाड़ दिया।
आज दिन तक बिहार में रोजगार ऐसा सवाल है, जिसका सीधा जवाब किसी राजनीतिक पार्टी के पास नहीं हैं, उनके पास सिर्फ चुनावी वादे हैं पर उससे 40 साल बाद भी पलायन (Migration) नहीं रुका। बिहार में जब-जब चुनाव (Elections) आता है, रोहतास जिले के डालमिया नगर के खंडहर भवन फिर से जिंदा हो जाते हैं। वहां काम कर चुके कर्मचारी अपना दुखड़ा सुनाते हुए यह कहना नहीं भूलते कि वे क्या सुनहरे पल थे, जब वे और उनका परिवार आजीविका के लिए दूसरे राज्यों में जाने का मोहताज नहीं था।
3800 एकड़ में फैली थी वह इंडस्ट्रियल टाउनशिप
रोहतास जिले में सोन नदी के किनारे बसे डालमियानगर की फैक्ट्रियां 3800 एकड़ में फैली थीं। इसमें करीब 35 हजार कर्मचारी थे, इसका अलग पावर हाउस, 60-बेड का अस्पताल और 67 किलोमीटर की निजी निजी रेलवे लाइन तक थी। पर 1984 में खराब मैनेजमेंट और इस टाउनशिप के संस्थापक उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया (Ramkrishna Dalmia) के देहांत के बाद सभी यूनिटें बंद हो गईं। फिर कुछ साल बाद इसे शुरू किया गया पर ये कभी पटरी पर नहीं लौटी।
नेताजी सुभाष चंद्र ने किया था उद्घाटन, 20 से ज्यादा फैक्ट्रियां थीं
1938 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सीमेंट प्लांट का उद्घाटन किया था। 1939 में राजेंद्र प्रसाद ने पेपर मिल का उद्घाटन किया जो स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति बने। 1960 आते-आते यह कंपनी पूरे भारत में बनने वाले कागज का 20% उत्पादन अकेले करने लगी थी।
भ्रष्टाचार, यूनियन के झगड़े व जातीय हिंसा के पतन
इसके पतन की कहानी 1950 के दशक में शुरू हो गई जब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने वित्तीय अनियमितताओं की जांच कराई। फिर श्रमिक यूनियनों के आंदोलनों, बिजली बिल के बकाये, नक्सलबाड़ी आंदोलन (1970) व जातीय हिंसा और लूट ने यहां तबाही मचा दी। 1984 में सभी यूनिटें बंद करनी पड़ी।
हालात ऐसे हो गए कि कंपनी 12,000 कर्मचारियों का बकाया अदा नहीं कर सकी। सुप्रीम कोर्ट ने 1989 में पुनर्वास आयुक्त नियुक्त किया, लेकिन 1994 तक यूनिटें फिर से बंद हो गईं और 1995 में पटना हाईकोर्ट ने लिक्विडेशन शुरू किया।
चुनावों में प्रासंगिकता: 40 साल बाद भी वादों का चक्र
डालमियानगर के पुनर्वास का वादा हर विधानसभा चुनाव का हिस्सा रहा है। 2008 में लालू प्रसाद ने फ्रेट बोगी फैक्टरी की यहां नींव रखी, लेकिन वह नहीं चली। 2019 में मोदी सरकार ने वर्कशॉप घोषित की लेकिन उसमें कोई प्रगति नहीं हुई। 2024 में मोदी ने यहां के हालात के लिए ‘लाल झंडा गैंग’ (यूनियन) और RJD-Congress को दोष दिया।
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गोपालगंज : फाइलेरिया रोकने की दवा खाने के बाद स्कूली बच्चे बीमार
- गोपालगंज के हरखुआ माध्यमिक विद्यालय में 15 बच्चे बीमार पड़े।
- 58 बच्चों को फाइलेरिया रोधी दवा खिलाई, फिर तबीयत बिगड़ी।
- सभी बच्चों को सदर अस्पताल ले जाकर भर्ती कराया, सभी सुरक्षित।
गोपालगंज | आलोक कुमार
बिहार के गोपालगंज में फाइलेरिया रोधी दवा खिलाए जाने के बाद स्कूली बच्चों की तबीयत अचानक बिगड़ने से हड़कंप मच गया। स्कूल में अभिभावकों ने पहुंचकर हंगामा किया, हालांकि टीचरों ने उन्हें समझाने की कोशिश की। इस बीच हेडमास्टर ने एंबुलेंस बुलाकर 15 बीमार बच्चों को सदर अस्पताल में एडमिट कराया है। बता दें कि हाथी पांव या फाइलेरिया की रोकथाम के लिए दो साल से बड़े बच्चों को यह दवा खिलाई जाती है, जो एकदम सुरक्षित है।
गोपालगंज में बच्चों की तबीयत खराब होने की घटना शहर के हरखुआ गांव के एक माध्यमिक विद्यालय में घटी। हेडमास्टर कृष्ण मुरारी पांडे ने बताया कि स्कूल में 27 फरवरी को 58 बच्चे मौजूद थे। सभी बच्चों ने मिड डे मील खाया। फिर दोपहर करीब 3:00 बजे आशा वर्करो ने स्कूल आकर सभी 58 बच्चों को फाइलेरिया और एल्बेंडाजोल की गोलियां दीं।
प्रिंसिपल ने बताया कि दवा खाते ही कुछ बच्चों को अचानक नींद आने लगी और वे सोने लगे, जबकि कुछ को उल्टी हुई।
इस बारे में सिविल सर्जन वीरेंद्र प्रसाद ने बताया कि फाइलेरिया से बचाव की दवा खाने के बाद कुछ बच्चों में गैस बनने की शिकायत हो सकती है, जिससे उल्टी या पेट दर्द महसूस होता है। साथ ही उन्होंने कहा कि कई बार डर के कारण भी बच्चों को ऐसी समस्या होती है, इसमें किसी तरह की चिंता की बात नहीं है।
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शराब तस्करी में जेल गए आरोपी की मौत, परिवार बोला- हत्या हुई, जेल प्रशासन ने हार्टअटैक बताया
- बक्सर सेंट्रल जेल में बंदी की मौत होने से उठे सवाल।
- शराब तस्करी के आरोप में जेल में 14 दिन से था बंदी।
- जेल में अचानक हुई मौत को परिजनों ने बताया हत्या।
बक्सर | अमीषा कुमारी
बिहार में शराब तस्करी के आरोप में हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति की मौत बक्सर सेंट्रल जेल में हो गई है। बीती 12 फरवरी को उसे न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। परिजनों का आरोप है कि जेल में उसके साथ मारपीट हुई, उसके शरीर पर लाल निशान हैं। परिजनों ने न्याय की मांग करते हुए सदर अस्पताल में हंगामा किया, तब मौके पर पुलिस पहुंची।अब मेडिकल बोर्ड की निगरानी में मृतक के शव का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है। इस मामले में जेल प्रशासन ने उत्पीड़न के आरोपों से इनकार किया है।
दरअसल 40 साल के राजेंद्र सिंह को बक्सर पुलिस पकड़कर ले गई थी और 12 फरवरी को उसे जेल भेजा गया था। राजेंद्र नगर थाना क्षेत्र के विराट नगर के रहने वाले थे। मृतक के बड़े भाई राजू कुमार ने आरोप लगाया कि गिरफ्तार करने के दौरान ही पुलिस ने राजेंद्र के साथ मारपीट की थी, जबकि वह बीमार चल रहा था। राजू का आरोप है कि “जेल भेजने के बाद भी भाई को पीटा गया। शरीर पर मौजूद लाल निशान साफ बता रहे हैं कि उसकी हत्या हुई है।
राजू ने बताया कि 27 फरवरी की सुबह करीब 11 बजे जेल प्रशासन की ओर से कॉल आया कि राजेंद्र की तबीयत बिगड़ गई है और वे अस्पताल पहुंच जाएं। लेकिन जब वे लोग सदर अस्पताल पहुंचे तो एक्स-रे रूम के बाहर स्ट्रेचर पर मृत अवस्था में राजेंद्र मिले। वहां कोई मौजूद नहीं था। इसके बाद परिजनों ने हंगामा किया और मौके पर पुलिस पहुंची।
मृतक राजेंद्र पेशे से पेंटर थे और उनके दो छोटे बच्चे हैं। अचानक हुई इस मौत ने पूरे परिवार को सदमे में डाल दिया है। वहीं, यह घटना बिहार में शराबबंदी लागू कराने के दौरान पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है। साथ ही, जेल में बंदी की सुरक्षा को लेकर जेल प्रशासन पर भी सवाल खड़ा होता है। मृतक के भाई ने बताया कि 25 फरवरी को वह अपने भाई से मिलने जेल गए थे, तब उसे ऐसी कोई दिक्कत नहीं थी जिसके चलते उसकी अचानक मौत हो सकती है।
बक्सर सेंट्रल जेल के अधीक्षक ज्ञानित गौरव ने परिजनों के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मौत हार्ट अटैक से प्रतीत होती है। हालांकि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद ही इसका सही कारण पता लग सकेगा।
बक्सर सदर अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में तैनात डॉक्टर अमित कुमार ने पुष्टि की कि कैदी को अस्पताल लाने से पहले ही उसकी मौत हो चुकी थी। वहीं, नगर थानाध्यक्ष मनोज कुमार ने सदर अस्पताल में मीडिया से कहा कि अगर कहीं कोई लापरवाही पाई जाती है तो उस पर सख्त कदम उठाए जाएंगे।”
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बिहार में अब दारोगा-कोतवाल के खिलाफ केस चलाने से पहले सरकार की अनुमति जरूरी
- बिहार सरकार के गृह विभाग (आरक्षी शाखा) ने जारी की अधिसूचना।
- पुलिस कर्मियों पर मुकदमा चलाने के लिए लेनी होगी सरकार की अनुमति।
- बिहार पुलिस के सभी पदाधिकारी व कर्मियों पर लागू होगा नियम।
पटना |
बिहार में अब दारोगा से लेकर इंस्पेक्टर तक के खिलाफ किसी मामले में तब ही केस दर्ज हो सकेगा जब उसकी इजाजत राज्य सरकार देगी।
बिहार सरकार के गृह विभाग (आरक्षी शाखा) ने गुरुवार (26 feb) को इसको लेकर अधिसूचना जारी की है। यह नियम पहले DSP/ACP और ऊपर के अधिकारियों के लिए लागू था, लेकिन अब राज्य सरकार ने यह सुरक्षा कांस्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर स्तर तक बढ़ा दी है। सरकार का तर्क है कि इस तरह बदले की भावना के चलते पुलिस पर कार्रवाई व उत्पीड़न को रोका जा सकेगा।
सरकार के इस महत्वपूर्ण सर्कुलर में कहा गया है कि पुलिस अधिकारियों और पुलिस कर्मियों पर आपराधिक मुकदमा चलाने से पहले राज्य सरकार की पूर्व अनुमति (sanction) अनिवार्य होगी। यह शर्त उन कार्यों पर लागू होगी जो आधिकारिक ड्यूटी (official duty) के दौरान या उसके संबंध में किए गए हों।
यह आदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 218(2) के तहत लागू किया गया है। जिसमें पहले “केंद्रीय सरकार” के स्थान पर अब स्पष्ट रूप से “राज्य सरकार” को यह अधिकार दिया गया है।
बिहार जैसे राज्य जहां पुलिस के ऊपर भ्रष्टाचार व गलत मुकदमें में फंसाने के मामले सामने आते रहे हैं, राज्य सरकार की ओर से दी जा रही इम्यूनिटी उनकी ताकत को और बढ़ा देगी या नहीं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
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