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आज के अखबार

हिंडनबर्ग रिपोर्ट : सेबी-अदाणी ‘गठजोड़’ को अखबारी कवरेज से समझें

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नई दिल्ली |

अदाणी समूह पर सनसनीखेज खुलासे करने वाली अमेरिकी शॉर्टसेलर फर्म हिंडनबर्ग रिसर्च ने एक बार फिर अपनी खोजी रिपोर्ट के जरिए बड़े आरोप लगाए हैं। अपनी ताजा रिपोर्ट में हिंडनबर्ग ने गोपनीय दस्तावेजों के आधार पर दावा किया है कि सेबी (सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) की चेयरपर्सन माधवी पुरी बुच भी अदाणी समूह के साथ मिली हुई थीं। आरोप है कि इस कंपनी में बुच की 8.7 लाख डॉलर की हिस्सेदारी थी। इस तथाकथित गठजोड़ के आधार पर हिंडनबर्ग रिसर्च ने आरोप लगाया कि अदाणी पर सेबी ने कार्रवाई में रुचि नहीं दिखाई जबकि इस मामले पर सभी प्रमुख जानकारियां उपलब्ध करवा दी गई थीं।

आज के अखबार में इस बड़ी खबर की कवरेज की समीक्षा करेंगे क्योंकि हिंडनबर्ग के दावे ने एक बार फिर नरेंद्र मोदी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा दिए हैं। हिन्दी के अखबारों के पहले पन्ने पर इस खबर को इतना छोटा छापा गया है कि पाठकों की नजर में ये खबर ही न आ सके। 11 अगस्त के संस्करणों की कवरेज के जरिए इस मामले को विस्तार से समझिए।

चेयरपर्सन माधवी पुरी बुच व पति धवल बुच

चेयरपर्सन माधवी पुरी बुच व पति धवल बुच

कांग्रेस ने जेसीपी की मांग उठाई, टीएमसी ने मांगा इस्तीफा

पहले बता दें कि इस खबर को 11 अगस्त के इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने की प्रमुख खबर बनाया है। ऐसा करने वाला यह देश का एकमात्र अखबार है। हेडिंग है – Sebi chief had stake in Adani offshore entities, hence didn’t act : Hindenburg. (अनुवाद – अदाणी की ऑफशोर कंपनियों में सेबी चीफ की हिस्सेदारी थी जिसके चलते उन्होंने कार्रवाई नहीं की : हिन्डनबर्ग)। एक्सप्रेस ने लिखा है कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट के प्रतिक्रिया में कांग्रेस ने ‘अदाणी मेगा स्कैम’ की जांच संयुक्त संसदीय समिति (जेसीपी) से कराने की मांग की है जबकि तृणमूल कांग्रेस ने सेबी प्रमुख का इस्तीफा मांगा है। इस खबर में बताया गया है कि 18 महीने पहले हिंडनबर्ग ने जिस अदाणी मनी साइफिंग घोटाले का दावा किया था, उसी से जुड़े अस्पष्ट ऑफशोर संस्थाओं में सेबी प्रमुख व पति की हिस्सेदारी थी।

इंडियन एक्सप्रेस, 11 अगस्त (फ्रंट पेज टॉप बॉक्स)

इंडियन एक्सप्रेस, 11 अगस्त (फ्रंट पेज टॉप बॉक्स)

सेबी प्रमुख बनने से पहले अदाणी समूह में हिस्सेदारी पति को सौंपी 

अंग्रेजी के एक अन्य प्रमुख अखबार द टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) ने इसे पहले पन्ने पर दूसरी बड़ी स्टोरी बनाया है, जिसमें हिंडनबर्ग रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि सेबी प्रमुख बनने से पहले बच व उनके पति के अदाणी कंपनी में स्टेक थे।  सेबी चेयरपर्सन बनने के दो सप्ताह पहले माधवी पुरी बुच ने ये हिस्सेदारी अपने पति धवल बुच को स्थानांतरित कर दी थी। हालांकि सेबी में बुच होलटाइम मेंबर के तौर पर 2017 से ही जुड़ी हुई थीं। TOI ने लिखा कि शनिवार देर शाम जारी की गई इस रिपोर्टर पर बुच दंपति ने रात डेढ़ बजे एक्स पर बयान जारी करके आरोपों को निराधार बताया और कहा कि उनका वित्तीय लेनदेन एक खुली किताब है।  द हिन्दू ने भी टाइम्स ऑफ इंडिया की तरह इस खबर को पहले पन्ने की दूसरी मेन स्टोरी बनाया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया, 11 अगस्त (पहले पन्ने की स्टोरी का इनसेन)

TOI, 11 अगस्त (स्टोरी का इनसेन)

दैनिक हिन्दुस्तान, पेज-17 (11 अगस्त)

दैनिक हिन्दुस्तान, पेज-17 (11 अगस्त)

हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर खबर को प्रमुखता नहीं मिली 

दैनिक हिन्दुस्तान अखबार ने इस बड़ी खबर को पहले पन्ने पर सिर्फ सिंगल कॉलम मेें लगाया है। अंदर के पेज 17 पर इस खबर की विस्तृत रिपोर्ट छापी है (जिसका स्क्रीन शॉट ऊपर संलग्न है)।  दैनिक जागरण के पहले पन्ने के निचले हिस्से में इस खबर को मात्र आधा कॉलम लगाया गया है, अर्थ संबंधी खबरों के पन्ने पर नीचे की ओर दो कॉलम में बाकी की खबर दी है। दोनों ही अखबारों ने इस मामले में विपक्ष की प्रतिक्रिया को नहीं छापा है। इन दोनों अखबारों के मुकाबले अमर उजाला ने पहले पन्ने पर ज्यादा स्थान दिया है, करीब डेढ़ कॉलम में खबर लिखी है हालांकि इस पर अंदर कोई विस्तृत रिपोर्ट नहीं है।

 

दैनिक जागरण, पहला पन्ना

दैनिक जागरण, पहला पन्ना

हिन्दुस्तान, पहला पन्ना

हिन्दुस्तान, पहला पन्ना

अमर उजाला, पहला पन्ना

अमर उजाला, पहला पन्ना

सेबी ने सुप्रीम कोर्ट को नहीं दी थी शेयरधारकों की जानकारी 

जागरण ने अंदर के पेज पर लगाई अपनी खबर में लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए हिंडनबर्ग  ने कहा कि सेबी ने अपनी जांच में अदाणी के ऑफशोर शेयरधारकों के वित्तपोषण की कोई जानकारी नहीं दी है। अगर सेबी वास्तव में ऑफशोर फंडधारकों को ढूंढना चाहता था तो शायद अपने चेयरपर्सन से जांच शुरू कर सकता था। हिंडनबर्ग ने लिखा है कि हमें इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि सेबी ऐसी जांच करने में अनिच्छुक था जो उसे अपने चेयरपर्सन तक ले जा सकता था। इस खबर की शुरुआत में जागरण ने लिखा है कि हिंडनबर्ग की पहली रिपोर्ट को जांच के आधार पर सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है।

दैनिक जागरण, पेज-10

दैनिक जागरण, पेज-10

18 महीने पहले अदाणी पर आई थी हिंडनबर्ग की पहली रिपोर्ट

जनवरी-2023 में बजट सत्र शुरू होने से ठीक पहले हिंडनबर्ग रिसर्च की पहली रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिससे पूरे संसद सत्र में हंगामा मचा था। उस रिपोर्ट में आरोप लगाए गए थे कि अदाणी समूह के चेयरमैन गौतम अदाणी के बड़े भाई विनोद अदाणी अस्पष्ट ऑफशोर बरमूडा और मॉरीशस फंड को नियंत्रित करते हैं और इनका इस्तेमाल पैसों की हेराफेरी व शेयरों की कीमत बढ़ाने के लिए किया गया था। इस रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने छह सदस्यीय कमेेटी बनाई थी और सेबी से भी जांच पूरी करने का अतिरिक्त समय देते हुए जांच करने को कहा था। इस रिपोर्ट को इस साल मई में सार्वजनिक कर दिया गया, जिसमें कहा गया कि अडाणी के शेयरों की कीमत में कथित हेरफेर के पीछे सेबी के नाकाम होने से जुड़े किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता। कमेटी ने ये भी कहा था कि ग्रुप की कंपनियों में विदेशी फंडिंग पर सेबी की जांच बेनतीजा रही है। इस रिपोर्ट में कहा गया कि अडाणी ग्रुप के शेयरों में वॉश ट्रेड (खुद ही शेयर खरीदने व बेचने) का कोई भी पैटर्न नहीं मिला है।

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।

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‘जिनके 6 से ज्यादा भाई-बहन, वे कागज़ लाकर साबित करें पिता का नाम’: SIR में प. बंगाल के 23 लाख वोटरों को नोटिस

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वोटर लिस्ट रिवीजन की प्रक्रिया के दौरान कर्मी। (फाइल फो
  • चुनाव आयोग ने अपने सॉफ्टवेयर में लॉजिकल अनियमितता के आधार पर ये वोटर चिन्हित किए हैं।
नई दिल्ली |
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान आदेश जारी किया है जिसने नए विवाद को जन्म दे दिया है। दरअसल यहां ऐसे मतदाताओें को नोटिस भेजे जा रहे हैं, जिनके 6 या उससे ज्यादा भाई-बहन हैं। ऐसे मतदाताओं को अपने पिता से अपना संबंध साबित करने के लिए तय तारीख पर आकर कागज दिखाने होंगे।

23.64 लाख वोटरों को भेजा जा रहा नोटिस

इंडियन एक्सप्रेस की 14 जनवरी रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में ऐसे 23.64 लाख वोटर हैं, जिनके फॉर्म में ऐसी ‘लॉजिकल अनियमितता’ पाई गई है जिसमें एक ही व्यक्ति को पिता बताते हुए छह से ज्यादा वोटरों ने अपने फॉर्म जमा किए हैं। चुनाव आयोग की ओर से ऐेसे केंद्रीय रूप से जेनरेटेड मैसेज बनाकर BLO के माध्यम से वोटरों को भेजा जा रहा है, जिसमें बांग्ला में लिखा है कि “आप ऐसे बेटे/बेटी के तौर पर जोड़े गए हैं जिन्हें अन्य छह लोगों ने अपना पिता बताया है, इससे गलत संबंध का संदेह पैदा हो रहा है।”
दरअसल चुनाव आयोग एक सॉफ्टवेयर के जरिए डुप्लिकेट एंट्री और लॉजिकल अनियमितता को पकड़ रहा है, इसके आधार पर पश्चिम बंगाल में 1.67 करोड़ वोटर संदेह के घेरे में आए हैं। 

SIR वाले 11 राज्यों में जारी हो सकता है नोटिस

अखबार ने सोर्स के हवाले से दावा किया है कि ऐसे नोटिस उन राज्यों में भी तैयार किए जा रहे हैं जहां SIR का काम चल रहा है, जिसमें यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, गुजरात, केरल, गोवा, लक्ष्यद्वीप, पुडुचेरी, अंडमान निकोबार द्वीप समूह हैं। 
इंडियन एक्सप्रेस, 14 जनवरी

इंडियन एक्सप्रेस, 14 जनवरी

क्या है मामला? 
  • SIR के दौरान ECI ने पाया कि कुछ परिवारों में 6-10 या उससे ज्यादा भाई-बहनों के नाम एक ही पिता के साथ दर्ज हैं।
  • ECI का मानना है कि यह फर्जी वोटरों या पुराने रिकॉर्ड्स की गड़बड़ी हो सकती है।
  • ऐसे मतदाताओं को नोटिस जारी कर पिता का नाम साबित करने के लिए दस्तावेज (जैसे जन्म प्रमाण पत्र, आधार, राशन कार्ड, स्कूल सर्टिफिकेट आदि) मांगे गए हैं।
  • अगर दस्तावेज नहीं दिए गए तो नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा सकते हैं।

 

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MP : गो-मूत्र से कैंसर का इलाज ढूंढने के नाम पर ₹3.5 करोड़ से हुई रिसर्च, जांच में मिला बड़ा घोटाला

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गाय (सांकेतिक तस्वीर)
गाय (सांकेतिक तस्वीर)
  • नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर को 2011 में मिला था रिसर्च के लिए फंड।

नई दिल्ली|

मध्य प्रदेश में गौमूत्र और गोबर से कैंसर जैसे गंभीर रोगों का इलाज करने का दावा करने वाले एक रिसर्च प्रोजेक्ट में भारी घोटाले का मामला सामने आया है। नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर ने 2011 में इस विषय पर रिसर्च के लिए राज्य सरकार से 8 करोड़ रूपये की मदद मांगी थी। सरकार ने अपनी पंचगव्य योजना के तहत विश्वविद्यालय को 3.5 करोड़ रुपये स्वीकृत किए थे।

लगभग दस साल बाद विवाद शुरू होने पर डिविजनल कमिश्नर ने जिला कलेक्टर से जांच कराई। जांच रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं-

  • विश्वविद्यालय ने गोबर, गोमूत्र, स्टोरेज उपकरण, कच्चा माल और प्रयोग से जुड़े सामान खरीदने पर 1.92 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि इन सामानों की वास्तविक कीमत सिर्फ 15-20 लाख रुपये थी।
  • रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए मिले सरकारी फंड से 7.5 लाख रुपये की एक गाड़ी खरीदी गई, जो प्रोजेक्ट के प्रस्तावित खर्च में शामिल ही नहीं थी।
  • इतना ही नहीं, तेल और मेंटेनेंस के नाम पर भी फंड का दुरुपयोग किया गया।
  • रिसर्च के लिए कई शहरों की हवाई यात्रा की गई, कुछ ट्रेनिंग दिए जाने जिक्र है पर उसकी विस्तृत जानकारी प्रोजेक्ट में नहीं दी गई है।

इंडियन एक्सप्रेस ने इस जांच रिपोर्ट का विस्तार से खुलासा किया है। जांच में पाया गया कि प्रोजेक्ट में भारी अनियमितताएं हुई हैं और सरकारी धन का गलत इस्तेमाल किया गया। अब यह रिपोर्ट आगे भेजी जाएगी, जिसके आधार पर यूनिवर्सिटी पर ऐक्शन हो सकता है। दूसरी ओर, यूनिवर्सिटी ने प्रोजेक्ट में किसी भी अनियमितता से इनकार किया है।

इंडियन एक्सप्रेस, 10 जनवरी संस्करण

इंडियन एक्सप्रेस, 10 जनवरी संस्करण

क्या है पंचगव्य योजना ?

पंचगव्य योजना देश के कुछ राज्यों में चलाई जा रही है जिसका मुख्य उद्देश्य गाय के पांच उत्पादों जिसे पंचगव्य कहा जाता है ( जैसे- गौमूत्र, गोबर, दूध, दही और घी) के औषधीय, कृषि और औद्योगिक उपयोग को बढ़ावा दिया जाए। सरकारों का कहना है कि इस योजना के जरिए गौ-आधारित अर्थव्यवस्था और आयुर्वेदिक व परंपरागत ज्ञान को वैज्ञानिक आधार देने की शुरूआत होगी।

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आज के अखबार

दिल्ली दंगा केस: उमर ख़ालिद को ज़मानत न मिलने पर अखबारों ने क्या लिखा?

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उमर खालिद और शरजील इमाम दिल्ली दंगे के केस में बिना ट्रायल के पांच साल से जेल में हैं।
उमर खालिद और शरजील इमाम दिल्ली दंगे के केस में बिना ट्रायल के पांच साल से जेल में हैं।

नई दिल्ली| 

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगों की कथित साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी, जबकि कुछ अन्य आरोपियों को जमानत दे दी। इस फैसले की सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचना हुई और देश के प्रमुख अखबारों विशेषकर अंग्रेजी अखबारों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कड़ा रुख दिखाया है।

द हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स ने मुख्यरूप से इस बात पर चिंता जतायी है कि सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए के तहत जमानत देते हुए अपराध से जुड़ी भूमिका के पदानुक्रम (Hierarchy) को महत्व दिया है और कहा है कि उमर व शरजील मुख्य साजिशकर्ता थे इसलिए बेल नहीं दी जा सकती। ट्रायल शुरू न हो पाना बेल पाने का ट्रंप कार्ड नहीं हो सकता। जबकि इस मामले से जुड़े पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी गई है।

द हिंदू: भूमिकाओं का पदानुक्रम (Hierarchy of Roles)

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में उमर खालिद को जमानत देने से इनकार कर दिया है। यह फैसला न केवल व्यक्तिगत न्याय की दृष्टि से चिंताजनक है, बल्कि यह उन व्यापक सवालों को भी उजागर करता है जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राज्य की शक्ति और न्यायिक प्रक्रिया के बीच संतुलन से जुड़े हैं। यह फैसला “भूमिकाओं का पदानुक्रम” (hierarchy of roles) स्थापित करता लगता है, जहां प्रत्यक्ष हिंसा करने वालों को जमानत मिल सकती है, लेकिन “साजिशकर्ता” को नहीं। यह भेदभावपूर्ण है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर डालता है। कई मामलों में यूएपीए का दुरुपयोग राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए हो रहा है।
द हिन्दू, 6 जनवरी

द हिन्दू, 6 जनवरी

इंडियन एक्सप्रेस: सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली दंगे पर आदेश गहरी चिंता पैदा करने वाला (Supreme Court’s bail order in Delhi riots case raises deep concerns)

सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली दंगों मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को उनकी गिरफ्तारी के पांच साल से भी अधिक समय बाद जमानत देने से इनकार करना, खुद सर्वोच्च अदालत के अपने उस सिद्धांत से पीछे हटना है जिसमें वह खुद को याद दिलाता रहा है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद। यह भी चिंताजनक है कि कोर्ट ने जांचें गए सबूतों की ताकत के बजाय अभियोजन के नैरेटिव पर यह कहा कि खालिद और इमाम ने दंगा कराने में “केंद्रीय और रचनात्मक” भूमिका निभाई जबकि अन्य पांच केवल उस साजिश में शामिल थे।  
इंडियन एक्सप्रेस, 6 जनवरी

इंडियन एक्सप्रेस, 6 जनवरी

हिंदुस्तान टाइम्स: जब प्रक्रिया ही सजा बन जाए (When Process is Punishment)

अखबार ने लिखा कि खालिद की पांच साल की ट्रायल पूर्व कैद के बावजूद जमानत से इनकार किया जाना चिंताजनक है। यूएपीए जैसे कठोर कानूनों में जमानत मिलना मुश्किल होता है, क्योंकि यह कानून आरोपी पर ही खुद को निर्दोष साबित करने का बोझ डालता है। कोर्ट ने खालिद की भूमिका को साजिश से जुड़ा बताया जो हिंसा से अलग और उससे जुड़ी हुई है। पर यह व्याख्या खतरनाक है क्योंकि यह राज्य को बिना ठोस सबूत के आरोपी को लंबी हिरासत की शक्ति देती है। कई सह-अभियुक्तों को जमानत मिल चुकी है, लेकिन उमर खालिद को दिल्ली दंगे में “भूमिकाओं के पदानुक्रम” में ऊपर रखकर जमानत से इनकार किया गया।  यूएपीए का दुरुपयोग राजनीतिक असहमति दबाने में हो रहा है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

हिन्दुस्तान टाइम्स

हिन्दुस्तान टाइम्स, 6 जनवरी

अमर उजाला: देशविरोधी मामलों में कोई नरमी नहीं  

अखबार ने अपने सरकार समर्थित रूख के हिसाब से ही संपादकीय में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सराहना की है। हिन्दी के किसी भी अन्य अखबार ने इस फैसले पर संपादकीय नहीं लिखा। अमर उजाला लिखता है कि कोर्ट ने सख्त संदेश दिया कि ‘देशविरोधी’ गतिविधियों में कोई रियायत नहीं। अखबार कहता है कि सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि दंगे सुनियोजित थे, खालिदइमाम की भूमिका गंभीर थी। अन्य आरोपियों को जमानत मिलना सही, लेकिन लंबी हिरासत जमानत का आधार नहीं बन सकती, यह फैसला राष्ट्रविरोधी तत्वों को कड़ा सबक है।

अमर उजाला, 6 जनवरी

अमर उजाला, 6 जनवरी

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