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रिसर्च इंजन

क्या भारत में 2026 तक नष्ट हो पाएगा नक्सलवाद?

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भारत में 2000 के दशक में नक्सल प्रभावित राज्यों का मानचित्र (साभार इंटरनेट)
नई दिल्ली | 
भारत सरकार ने नक्सलवाद को 31 मार्च 2026 तक पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा है। गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2025 में संसद में घोषणा की थी कि देश नक्सल-मुक्त होगा और कोई नागरिक इस हिंसा का शिकार नहीं होगा। लेकिन क्या यह लक्ष्य हासिल हो पाएगा? 1967 से चला आ रहा नक्सलवाद, जो गरीबी और आदिवासी अधिकारों के नाम पर शुरू हुआ, आज कमजोर पड़ रहा है। 2025 में 300 से ज्यादा नक्सली निष्क्रिय हुए हैं, और प्रभावित जिलों की संख्या 126 से घटकर 18 रह गई है। आइए समझते हैं कि यह आंदोलन कैसे फैला, पहले स्थिति क्या थी, अब इसे कैसे काबू में लाया जा रहा है, और क्या 2026 तक इसे खत्म करना संभव है।
बसवराज की हत्या से नक्सल नेतृत्व को बड़ा झटका
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) में साल 2018 में नंबाला केशव राव (बसवराज) को महासचिव बनाया गया था जिसे संगठन का ‘इंजीनियरिंग ब्रेन’ माना जाता था।
बीते मई में 50 घंटे चले मिलिट्री ऑपरेशन में इसकी हत्या कर दी गई। 21 मई 2025 को छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ जंगलों में ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ के तहत CRPF, CoBRA और DRG की 500-600 सैनिकों ने ड्रोन और हेलीकॉप्टर का उपयोग कर माओवादी कैंप पर हमला बोला, जिसमें बसवराज समेत 27 माओवादी मारे गए। बसवराज की मौत माओवादी नेतृत्व के 70% हिस्से को खत्म करने वाली साबित हुई। गृह मंत्री अमित शाह ने इसे नक्सलवाद पर “निर्णायक झटका” बताया, जिससे रेड कॉरिडोर सिमट गया।
आखिर कैसे शुरू हुआ नक्सलवादी आंदोलन 
नक्सलवाद भारत में एक सशस्त्र आंदोलन है, जो गरीबों और आदिवासियों के अधिकारों की मांग को लेकर शुरू हुआ था। इसका नाम 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से पड़ा, जहाँ किसानों ने जमींदारों के खिलाफ बगावत की थी। इस आंदोलन को माओत्से तुंग (चीन के नेता) के विचारों से प्रेरणा मिली, इसलिए इन्हें माओवादी भी कहते हैं। शुरू में यह किसानों की जमीन और गरीबी के खिलाफ था, लेकिन बाद में यह हिंसा और हथियारों का रास्ता अपनाने लगा। 
छह राज्यों के 92 जिलों बन गए थे ‘रेड कॉरिडोर’
1980 और 1990 के दशक में यह आंदोलन बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के जंगलों में फैल गया, जिसका मुख्य कारण इन क्षेत्रों में सरकार की कम पहुंच होना था जिसका नक्लसवादियों ने फायदा उठाया। इसे ‘रेड कॉरिडोर’ कहा गया, जो 2004 तक 92 जिलों को प्रभावित करता था। माओवादी जंगलों में छिपकर सड़कें, रेलवे और पुलिस पर हमले करते थे, और उनका दावा था कि वे गरीबों के लिए लड़ रहे हैं।
2000 के दशक में चरम पर था नक्सलवाद
साल 2000 के दशक में नक्सलवाद अपने चरम पर था। 2010 में 1,936 नक्सली घटनाएँ हुईं, जिसमें 1,005 लोग मारे गए। इनमें ज्यादातर पुलिसकर्मी और आम नागरिक थे। माओवादियों के पास हथियार, ट्रेनिंग कैंप और हजारों सशस्त्र कैडर थे। वे जंगलों में अपनी सरकार (जोनल कमेटी) चलाते थे और सरकार को चुनौती देते थे। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ समेत नौ राज्यों में गरीबी, बेरोजगारी और आदिवासियों की अनदेखी ने नक्सलवादियों की ताकत बढ़ाई। 2005 तक छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र उनका सबसे बड़ा गढ़ बन गया, जहाँ हर साल 300-400 लोग मारे जाते थे। सरकार के पास न तो सही योजना थी और न ही सैनिकों का समन्वय, जिससे स्थिति बेकाबू हो गई थी।
दस साल में नक्सली हमले में भारी गिरावट 
पिछले कुछ सालों में सरकार ने नक्सलवाद पर कड़ा रुख अपनाया, जिससे स्थिति बदल गई। 2024 से शुरू हुए ‘ऑपरेशन कागर’ और अन्य अभियानों ने माओवादियों को कमजोर किया। 2024-2025 में हिंसा की घटनाएँ घटकर 374 रह गईं, और मृतकों की संख्या 150 तक सिमट गई। पहले दस साल पहले यह आंकड़ा 1000 से अधिक था। दुनियाभर में संघर्ष की घटनाओं पर सबसे व्यापाक डेटाबेस रखने वाले संगठन ACLED के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अब तक 255 माओवादी मारे गए है जो पहले के वर्षों (जैसे 2023 में 125 मौतें) के मुकाबले दोगुनी है। अब रेड कॉरिडोर 38 जिलों तक सिमट गया है, और ‘सबसे प्रभावित’ 6 जिले (बिजापुर, कांकेर, नारायणपुर, सुकमा, वेस्ट सिंहभूम, गढ़चिरोली) में भी उनकी पकड़ ढीली पड़ गई है।
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 नक्सलवाद कमजोर पड़ने की प्रमुख वजहें समझिए 
  1. बेहतर समन्वय और खुफिया जानकारी: केंद्रीय और राज्य बलों (CRPF, CoBRA, ग्रेहाउंड्स) के बीच यूनिफाइड कमांड ने काम किया। इंटेलिजेंस-बेस्ड ऑपरेशंस (जैसे अबूझमाड़ घुसपैठ) ने माओवादी नेतृत्व को निशाना बनाया। 2024 से ड्रोन, हेलीकॉप्टर और सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल बढ़ा, जो पहले सीमित था।
  2. सरेंडर पॉलिसी ने आकर्षित किया : सरेंडर पॉलिसी को और बेहतर बनाया जिसमें ₹50,000 की सहायता राशि व नई जिंदगी शुरू करने के लिए ट्रेनिंग व नौकरी दी जाती है। गृह मंत्रालय (MHA) के आधिकारिक डेटा के अनुसार, 2024-25 में लगभग 881 नक्सली सरेंडर हुए और मुख्यधारा में लौटे। 
  3. सरंदा डेवलपमेंट प्लानझारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के सरंदा जंगलों को माओवादियों का मजबूत गढ़ माना जाता था, यहां 2012 से 2018 तक एक पायलट योजना चली जिसे सरंदा डेवलपमेंट प्लान कहा गया। फिर इस विकास योजना को 2018 में ‘राष्ट्रीय नक्सल नियंत्रण रणनीति’ का हिस्सा बनाया। इसके तहत आदिवासी इलाकों में बुनियादी सुविधाएँ जैसे सड़कें, स्कूल, अस्पताल, बिजली और पानी मुहैया कराना शुरू किया गया। इससे आदिवासियों के बीच माओवादियों का असर घटा। इसके तहत 2024-25 में 200+ गाँवों तक बिजली और मोबाइल नेटवर्क पहुँचा, जो पहले माओवादियों की शक्ति थी। 50 नए प्राइमरी स्कूल और 10 स्वास्थ्य केंद्र खोले गए। 2025 में 15,000 घरों का निर्माण शुरू हुआ, जो अब पूरा होने की कगार पर है।
  4. सेना की संख्या बढ़ाई- पहले जो क्षेत्र माओवादियों के कब्जे में थे, अब वहां जगह-जगह सेना है।  2024 से इन क्षेत्रों में 10,000 से ज्यादा सैनिकों की तैनाती की गई है। CIAT स्कूलों (काउंटर इंटरसेप्ट एंड एंटी-टेरर ट्रेनिंग सेंटर्स) को बढ़ाया गया है, जहाँ पुलिस को जंगल युद्ध और नक्सलियों से लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है। SRE स्कीम (सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडीचर) के तहत फंडिंग बढ़ाई गई है, जो पुलिस को हथियार, ट्रेनिंग और बीमा के लिए पैसे देती है।
  5. माओवादियों की आंतरिक कलह भी मददगार बनी – 2023 में सेंट्रल कमिटी मेंबर ‘गणपति’ (एम. लक्ष्मण राव, पूर्व महासचिव) और ‘अभय’ (मल्लोजुला वेणुगोपाल राव, वर्तमान प्रवक्ता) के बीच मतभेद इतने बढ़ गए कि दोनों ने अलग-अलग गुट बना लिए। ‘गणपति’ चाहते थे हिंसक रास्ता जारी रखें, जबकि ‘अभय’ शांति वार्ता की बात कर रहे थे। इससे संगठन में एकता टूट गई और लोग एक-दूसरे से भरोसा खो बैठे। 
  6. कोविड में कैडर कमजोर हुआ- कोरोना वायरल संक्रमण के दौरान माओवादियों को बहुत नुकसान पहुँचाया। 2020-2022 में जंगलों में इलाज की कमी से 100 से ज्यादा माओवादी मर गए, जो उनके लिए बड़ा झटका था।
  7. नेतृत्व की कमी ने कमजोर किया- हाल में माओवादी संगठन को सबसे तगड़ा झटका उनके महासचिव नंबाला केशव राव (बसवराज) की मई 2025 में हत्या का लगा। वह इस संगठन का दिमाग था और उसकी कमी से माओवादियों को और कमजोर कर दिया। 
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इन सैन्य ऑपरेशनों में नक्सलियों को नुकसान हुआ 

  • ऑपरेशन कागर (2024-2025): छत्तीसगढ़ के बस्तर में 20,000 से ज्यादा सैनिकों ने माओवादी बेस पर हमले किए।
  • ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट (मई 2025) :  इसमें 31 माओवादी मारे गए, यह ऑपरेशन कागर का ही विस्तार है।
  • कांकेर क्लैश (अप्रैल 2024): 29 माओवादी मारे गए, पार्टापुर एरिया कमिटी खत्म हुई।
  • अबूझमाड़ में बड़ी कार्रवाई (अक्टूबर 2024, मई 2025): 38 और 26 माओवादी मारे गए, जिसमें महासचिव नंबाला केशव राव (बसवराज) भी शामिल थे।
  • सरेंडर और गिरफ्तारियाँ: 2024 में 163, 2025 में 142 माओवादी मारे गए। सितंबर 2025 में नारायणपुर में 16 और सेंट्रल कमिटी मेंबर सुजाता ने सरेंडर किया।
  • बिजापुर और झारखंड ऑपरेशन (2025): IED अटैक और रेलवे विस्फोट के जवाब में 5-3 माओवादी मारे गए।
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सेना के ऑपरेशनों पर उठते रहे हैं मानवाधिकार के सवाल
सेना के इन ऑपरेशनों ने माओवादियों को कमजोर तो किया, लेकिन मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल उठे हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच और PUCL (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ) जैसी संस्थाओं के अनुसार, 2024-2025 में 400 से अधिक मौतें हुईं, जिनमें आम नागरिक भी शामिल थे। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इन ऑपरेशनों के जरिए एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग्स (फर्जी मुठभेड़ें), गाँवों पर बमबारी और आदिवासियों को ‘माओवादी समर्थक’ बताकर गिरफ्तारियाँ होना आम हो गया है।  उदाहरण: जनवरी 2025 में बिजापुर में 6 महीने की बच्ची की मौत, और दिसंबर 2024 में अबूझमाड़ में 4 बच्चों पर गोलीबारी।
एसओपी को नहीं मानने के आरोप – सिविल सोसाइटी रिपोर्ट्स में कहा गया कि सिक्योरिटी फोर्सेस ने SOP (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) का पालन नहीं किया, और कई मामलों में निर्दोष आदिवासियों को ‘ह्यूमन शील्ड’ बताकर मारा गया। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने भी इन ऑपरेशंस पर चिंता जताई, और चेंज.ऑर्ग पर याचिकाएँ दायर हुईं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ऐसा भी आरोप लगाया कि ये कार्रवाइयाँ आदिवासियों के विस्थापन और कॉर्पोरेट खनन के लिए भूमि हथियाने से जुड़ी हैं। 
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जमीन हकीकत : सरकार मजबूत हुई पर मिलिट्रीकरण से चिंता 
बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में राज्य शासन धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है, लेकिन अभी भी चुनौतियाँ बाकी हैं।  यहां मिलिट्रीकरण बढ़ा है और अभी हर नौ नागरिकों पर एक सैनिक तैनात है जिससे आदिवासी डरते हैं।
साल 2025 तक बस्तर और कोण्डागाँव जैसे जिले ‘नक्सल-फ्री’ घोषित हो चुके हैं, जहाँ 29 गाँवों में पहली बार तिरंगा फहराया गया। सरकार ने 250 से अधिक सिक्योरिटी कैंप स्थापित किए, और 30 नए फॉरवर्ड बेस खोले जा रहे हैं। यहां विकास योजनाएँ लागू करके बिजली, पानी, सड़क बनाई जा रही है पर यहां की जमीनी वास्तविकता जटिल है। 
ACLED डेटा के अनुसार, 2025 में यहां 255 मौतें हुईं, साथ ही आम नागरिकों की मौत का आंकड़ा 27% बढ़ा है।  विशेषज्ञ कहते हैं कि जंगलों में माओवादी अभी भी सक्रिय हैं, और राज्य शासन विकास तक सीमित है। न्याय और मानवाधिकार अभी भी कमजोर हैं। सरकार का लक्ष्य मार्च 2026 तक नक्सलवाद खत्म करना है, लेकिन आदिवासी असंतोष बाकी है। विशेषज्ञ कहते हैं कि 2026 लक्ष्य तभी संभव है, अगर मानवाधिकार और विकास पर ध्यान दिया जाए।

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बिहार में धान की अच्छी पैदावार के बाद भी खरीद के सीजन में क्यों परेशान हैं किसान 

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बिहार में धान की खरीद कम और धीमी होने से किसान अपनी फसल कम दाम पर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं।
बिहार में धान की खरीद कम और धीमी होने से किसान अपनी फसल कम दाम पर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं।
  • 28 फरवरी तक राज्य में होनी है धान की खरीद या अधिप्राप्ति।
  • केंद्र की ओर से राज्य में खरीद का कोटा घटाने से खेतों में पड़ी फसल।
नई दिल्ली|
बिहार में धान की इस साल अच्छी पैदावार हुई है, लेकिन इसके बावजूद किसान अपने धान को खेतों में छोड़ने और खुले बाजार में औने-पौने दाम पर बेचने के लिए बेबस हैं। केंद्र सरकार ने इस बार बिहार में धान की खरीद का लक्ष्य 20% घटा दिया है, जिसका असर यह है कि हर जिले में धान खरीद लक्ष्य घटा दिया गया है।
इस पर भी जिलों में धान खरीद की गति बेहद धीमी है, जिससे किसान अपनी फसल की बिक्री को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। कई जिलों में किसानों ने लक्ष्य बढ़ाने और तेजी से खरीद करने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किए हैं। फसल का पूरा दाम न मिलते दिखने से कई धान किसानों ने इसे खुले बाजार में बेचना शुरू कर दिया है ताकि यह समय से बिक जाए और वे खेत में नई फसल लगा सके। 

धान खरीद के आंकड़े

  • 36.85 लाख मीट्रिक टन धान की होनी है खरीद।
  • 45 लाख मीट्रिक टन था पिछले साल का लक्ष्य।
  •  8.52 लाख मीट्रिक टन कम धान खरीद होगी।

अब तक सिर्फ 5100 किसानों से हुई खरीद

सहकारिता विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, 11 जनवरी तक सिर्फ 5176 किसानों से धान की खरीद हुई है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि बिहार में धान खरीद के लिए कितने किसानों ने रजिस्ट्रेशन कराया है। पर पिछले साल धान खरीद का लाभ करीब पांच लाख किसानों को हुआ था। इस हिसाब से देखे तो किसान जिस धीमी खरीद की शिकायत कर रहे हैं, सरकारी आंकड़ों से उसकी तस्दीक हो रही है।

खुले बाजार में धान बेचने को मजबूर

धान की MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) ₹2,183 प्रति क्विंटल है, अगर सरकार धान खरीदती है तो किसान को इसी भाव पर फसल का दाम मिलेगा। पर चूंकि लक्ष्य घटा दिया गया है और अब तक धीमी गति से खरीद हो रही है तो परेशान किसान खुले बाजार में धान बेचने को मजबूर है, जहां धान ₹1,800-₹2,000/क्विंटल पर बिक रहा है। यानी प्रति क्विंटल ₹200-₹300 का नुकसान किसान को उठाना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में 5-10 क्विंटल उपज वाले छोटे किसानों को सबसे ज्यादा मार सहनी पड़ेगी क्योंकि वे फसल करने के लिए कर्ज पर निर्भर होते हैं। 

धान जलाकर गुस्सा दिखा रहे किसान

रोहतास जिला मुख्यालय में किसानों ने इकट्ठा होकर प्रदर्शन किया, उन्होंने मांग की कि धान खरीद का लक्ष्य बढ़ाया जाए और पैक्स के जरिए हो रही खरीद को पारदर्शी बनाया जाए। किसानों का यह तक कहना था कि जिला पंचायत अध्यक्ष यह देखकर खरीद कर रहे हैं कि किस किसान ने उन्हें चुनाव में वोट दिया।

बेगूसराय में कई जिला पंचायतों और व्यापार मंडलों ने धरना दिया, इनका कहना है कि जिला प्रशासन खरीद करने को कह रहा है पर लक्ष्य स्पष्ट नहीं किया गया है।

किसानों की मांगें

  • धान खरीद लक्ष्य बढ़ाया जाए।
  • पैक्स में भेदभाव और गड़बड़ियां बंद हों।
  • खरीद केंद्रों पर गति बढ़ाई जाए।
  • MSP पर पूरी फसल खरीदी जाए, ताकि खुले बाजार में कम दाम न बेचना पड़े।

 जिलों में धान खरीद का लक्ष्य इतना घटा

  • रोहतास: उपज 13 लाख एमटी, लक्ष्य 3.14 लाख एमटी (पिछले साल से 90 हजार एमटी कम)। 
  • भागलपुर: लक्ष्य 37,285 एमटी (पिछले साल 40,000 एमटी था)।
  • नालंदा: लक्ष्य 1.22 लाख एमटी (पिछले साल 1.92 लाख एमटी)।
  • बेगूसराय: उपज 54,548 एमटी, लक्ष्य स्पष्ट नहीं। पैक्स और व्यापार मंडल धरना दे रहे हैं।
  • बांका: उपज 5.4 लाख एमटी, लक्ष्य 1.31 लाख एमटी (पिछले साल 1.39 लाख एमटी)।

राज्य सरकार की मांग- केंद्र कोटा बढ़ाए 

खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग मंत्री लेशी सिंह ने केंद्र से कोटा बढ़ाने की मांग की है। केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्यमंत्री निमुबाई जयंतीभाई बांभणिया के पटना दौरे पर शुक्रवार को मंत्री लेशी सिंह ने इस मामले से जुड़ा ज्ञापन सौंपा। केंद्रीय मंत्री ने इस पर कहा कि केन्द्र सरकार किसानों के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राज्यों के साथ समन्वय के आधार पर निर्णय लेगी। लेशी सिंह ने कहा है कि उन्होंने खाद्य अनुदान मद में लंबित 6,370 करोड़ की राशि भी जल्द जारी करने की मांग की।

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Deputy CM Vijay Sinha : बिहार में भूमि सुधार के जरिए खूब चर्चा पा रहे डिप्टी सीएम, जानिए क्या है अंदर की कहानी

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प्रेसवार्ता को संबोधित करते उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा

नई दिल्ली |

बिहार में नई NDA सरकार बनने के बाद जमीनी विवाद के मामलों और इनकी सुनवाई को लेकर खूब चर्चा हो रही है। नई सरकार में यह विभाग डिप्टी सीएम और बीजेपी के सीनियर नेता विजय कुमार सिन्हा को मिला है। हाल के दिनों में उनकी ओर से कुछ जिलों में जनसुनवाई कार्यक्रम आयोजित हुए, जिसमें राजस्व अफसरों के लिए कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिसको खूब मीडिया कवरेज मिला। अपने पिछले डिप्टी सीएम कार्यकाल में सधी हुई छवि से उलट इस बार विजय सिन्हा तेज-तर्रार मंत्री के तौर पर छवि गढ़ रहे हैं, जानिए इसके राजनीतिक मायने क्या हैं?

जनसुनवाई में राजस्व अफसरों पर तीखा हमला

डिप्टी सीएम के साथ बिहार के ‘राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग’ की जिम्मेदारी मिलने के बाद विजय कुमार सिन्हा ने जनसुनवाई करना शुरू किया। हाल के दिनों में लखीसराय, रोहतास, बक्सर, गया और अन्य जिलों में डिप्टी सीएम ने जनसुनवाई के दौरान शिकायतें और अफसरों की लापरवाहियां सुनकर राजस्व अफसरों को जमकर लताड़ा।
उनके कहे कुछ वाक्य मीडिया में सुर्खी बन गए, जैसे- ‘खड़े-खड़े सस्पेंड कर दूंगा‘, ‘यही जनता के सामने जवाब दो‘, ‘स्पष्टीकरण लो और तुरंत कार्रवाई करो’, ‘ऑन द स्पॉट फैसला होगा‘। इन वीडियो क्लिप्स को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया। बिहार राजस्व सेवा संघ ने मंत्री के इन बयानों को लेकर कहा कि ऐसा करके वे विभाग की छवि को जानबूझकर सार्वजनिक उपहास का विषय बना रहे हैं। 

नाराज राजस्व संघ ने सीएम को लेटर लिखा 

बिरसा की ओर से सीएम को लिखा गया लेटर।

बिरसा की ओर से सीएम को लिखा गया लेटर।

पब्लिक मीटिंग में अपने साथ हो रहे व्यवहार के खिलाफ राजस्व अफसरों में खासा नाराजगी है। इसको लेकर बीती 24 दिसंबर को राजस्व विभाग के अफसरों के संगठन ‘बिहार राजस्व सेवा संघ’ (Bihar Revenue Service Association) ने बाकायदा सीएम नीतीश कुमार को पत्र लिखकर कहा-
“वर्तमान मंत्री पब्लिक मीटिंग में यह भूल जाते हैं कि पिछले 20 साल से अधिकांश समय NDA की सरकार रही है, वे अपने पूर्ववर्ती मंत्रियों और विभागीय प्रमुखों के योगदान को नकारते हुए ऐसा आभास कराते हैं कि जैसे विभाग में कोई काम ही नहीं हुआ। जैसे बीते सौ साल का प्रशासनिक बोझ उनके कंघों पर आ गया हो।”

लेटर में लिखा गया है कि मंत्री लोकप्रियता और तात्कालिक तालियों की अपेक्षा में राजस्व कर्मियों को जनता के सामने अपमानित कर रहे हैं। लेटर में चेतावनी दी गई है कि अगर इसमें सुधार नहीं हुआ तो संघ ऐसे आयोजनों व गतिविधियों का सामूहिक बहिष्कार करेगा। 

बिहार DGP बोले- “भूमि विवाद में हम नहीं पड़ेंगे”

भूमि विवाद के मामलों पर डिप्टी सीएम सिन्हा की ‘सक्रियता’ के बीच बिहार DGP का एक बयान जानने योग्य है। 9 जनवरी को पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विनय कुमार ने कहा कि- बिहार में 60% अपराध की वजह भूमि विवाद है जो समय पर हल न होने से अक्सर आपराधिक घटनाओं में बदल जाते हैं। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था के तहत जमीन विवादों का निपटारा किया जाएगा, हम इसमें सीधे हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
उनका कहना है कि पुलिस के पास खतियान, नक्शा या अद्यतन राजस्व रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते, जिससे उनके लिए विवाद का निष्पक्ष समाधान कर पाना मुश्किल होता है।

डिप्टी सीएम सिन्हा के तेबर को कैसे देखते विशेषज्ञ

बिहार में नीतीश जैसा नेता बनाने की चाह –

इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को जदयू से ज्यादा सीटें मिलीं, पर अब भी उनके पास नीतीश कुमार जैसी एक मास अपील वाला कोई नेता राज्य में नहीं है। ऐसे में डिप्टी सीएम सिन्हा अपनी जनसुनवाई के जरिए जमीन मालिक व गरीब किसानों को साधने की कोशिश करते नज़र आते हैं, जो भाजपा का वोटबैंक भी है।

बीजेपी है बिग ब्रदर

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में भूमि सुधार एक बड़ी समस्या है, इसे नई सरकार में तुरंत उठाकर भाजपा यह दर्शाना चाहती है कि सरकार में उनका ‘अपरहैंड’ है। कई मौकों पर जदयू कहती रही है कि NDA में वह बड़े भाई की भूमिका में है पर हालिया चुनावों में ज्यादा सीटें पाने के बाद भाजपा ने यह भूमिका अख्तियार कर ली है।


जमीन पर क्या होगा असर ?

  • पुरानी फाइलें खुलने और मौके पर मंत्री से भरोसा मिलने से आम जनता को कुछ उम्मीद तो बंधी है। हालांकि इसका असर लॉन्ग टर्म में सामने आएगा।
  • पुलिस महानिदेशक ने जिस तरह कहा है कि जमीन मामलों में पुलिस सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगी, इससे किसी आदेश को लागू करवाने में समस्या पैदा हो सकती है।

बिहार में कितनी बड़ी है भूमि विवाद समस्या ?

बिहार में भूमि विवाद के कितने मामले लंबित हैं, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। पर विशेष मानते हैं कि यह संख्या लाखों में है। इसमें वे केस शामिल हैं जो अदालत में लटके हुए हैं, इसके अलावा जमीन विवाद के चलते हत्या व अन्य अपराध के केस और हाल तक जारी भूमि सर्वे के चलते पैदा हुए नए भूमि विवादों ने इनकी संख्या काफी बढ़ा दी है।

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चुनावी डायरी

बिहार में किसके वोट कहां शिफ्ट हुए? महिला, मुस्लिम, SC–EBC के वोटिंग पैटर्न ने कैसे बदल दिया नतीजा?

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नीतीश कुमार 9 बार सीएम बन चुके हैं और इस बार भी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और अप्रत्याशित जीत मिली।
नीतीश कुमार 9 बार सीएम बन चुके हैं और इस बार भी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और अप्रत्याशित जीत मिली।
  • महागठबंधन का वोट शेयर प्रभावित नहीं हुआ पर अति पिछड़ा, महिला व युवा वोटर उन पर विश्वास नहीं दिखा सके।

नई दिल्ली| महक अरोड़ा

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने साफ कर दिया है कि इस बार की लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं थी—बल्कि वोटिंग पैटर्न, नए सामाजिक समीकरण, और वोट के सूक्ष्म बदलावों की थी।

कई इलाकों में वोट शेयर में बड़ा बदलाव नहीं दिखा, लेकिन सीटें बहुत ज्यादा पलट गईं। यही वजह रही कि महागठबंधन (MGB) का वोट शेयर सिर्फ 1.5% गिरा, लेकिन उसकी सीटें 110 से घटकर 35 पर आ गईं।

दूसरी ओर, NDA की रणनीति ने महिलाओं, SC-EBC और Seemanchal के वोट पैटर्न में बड़ा सेंध लगाई, जो इस प्रचंड बहुमत (massive mandate) की असली वजह माना जा रहा है।

 

महिला वोटर बनीं Kingmaker, NDA का वोट शेयर बढ़ाया

बिहार में इस बार महिलाओं ने 8.8% ज्यादा रिकॉर्ड मतदान किया:

  • महिला वोटिंग: 71.78%
  • पुरुष वोटिंग: 62.98%

(स्रोत- चुनाव आयोग)

महिला वोटर वर्ग के बढ़े हुए मतदान का सीधा फायदा NDA विशेषकर जदयू को हुआ, जिसने पिछली बार 43 सीटें जीती और इस बार 85 सीटों से दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी।


 

वोट शेयर का गणित — MGB का वोट कम नहीं हुआ, पर सीटें ढह गईं

  • NDA Vote share: 46.5%
    MGB Vote share: 37.6%

2020 की तुलना में: 9.26% ज्यादा वोट NDA को पड़ा

  •  NDA के वोट share में बड़ी बढ़त – 37.26%
  •  MGB का वोट share सिर्फ 1.5% गिरा – 38.75%
  •  पर महागठबंधन की सीटें 110 → 35 हो गईं

(स्रोत- चुनाव आयोग)

यानी इस चुनाव में महागठबंधन का वोट प्रतिशत लगभग बराबर रहा पर वे वोट शेयर को सीटों में नहीं बदल सके।

यह चुनाव vote consolidation + social engineering + seat-level micro strategy का चुनाव था।


 

SC वोटर ने NDA का रुख किया — 40 SC/ST सीटों में 34 NDA के खाते में

बिहार की 40 आरक्षित सीटों (38 SC + 2 ST) में NDA ने लगभग क्लीन स्वीप किया:

  •  NDA: 34 सीट
  •  MGB: 4 सीट (2020 में NDA = 21 सीट)

(स्रोत- द इंडियन एक्सप्रेस)

सबसे मजबूत प्रदर्शन JDU ने किया—16 में से 13 SC सीटें जीतीं। BJP ने 12 में से सभी 12 सीटें जीत लीं।

वहीं महागठबंधन के लिए यह सबसे खराब प्रदर्शन रहा — RJD 20 SC सीटों पर लड़कर भी सिर्फ 4 ला सकी।

RJD का वोट शेयर SC सीटों में सबसे ज्यादा (21.75%) रहा, लेकिन सीटें नहीं मिल सकीं।

वोट share और seat conversion में यह सबसे बड़ा असंतुलन रहा।


 

मुस्लिम वोट MGB और AIMIM के चलते बंटा, NDA को फायदा हुआ

सीमांचल – NDA ने 24 में से 14 सीटें जीत लीं

सीमांचल (Purnia, Araria, Katihar, Kishanganj) की 24 सीटों पर इस बार सबसे दिलचस्प तस्वीर दिखी।

मुस्लिम वोट महागठबंधन और AIMIM में बंट गए, और इसका सीधा फायदा NDA को मिला।

  • NDA: 14 सीट
  • JDU: 5
  • AIMIM: 5
  • INC: 4
  • RJD: सिर्फ 1
  • LJP(RV): 1

 

सबसे कम मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचेंगे – सूबे में 17.7% मुस्लिम आबादी के बावजूद इस बार सिर्फ 10 मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचे — 1990 के बाद सबसे कम।

  • यह NDA की सामाजिक इंजीनियरिंग, EBC–Hindu consolidation और मुस्लिम वोटों के बंटवारे का संयुक्त परिणाम है।
  • EBC–अति पिछड़ा वोट NDA के साथ गया — MGB की सबसे बड़ी हार की वजह
  • अतिपिछड़ा वर्ग (EBC) बिहार में सबसे बड़ा वोट बैंक है। इस बार ये पूरा वोट NDA के पक्ष में चला गया।
  • JDU की परंपरागत पकड़ + BJP का Welfare Model मिलकर EBC वर्ग में मजबूत प्रभाव डाल गए।
  • यही वोट EBC बेल्ट (मिथिला, मगध, कोसी) में NDA को करारी बढ़त देने का कारण बना।

 


 

रिकॉर्ड संख्या में निर्दलीय लड़े पर नहीं जीत सके

Independent उम्मीदवारों की रिकॉर्ड संख्या — 925 में से 915 की जमानत जब्त

इस चुनाव में:

  •  कुल उम्मीदवार: 2616
  •  Independent: 925
  •  जमानत ज़ब्त: 915 (98.9%)

ECI ने ज़ब्त हुई जमानतों से 2.12 करोड़ रुपये कमाए

 

क्यों इतने Independent मैदान में उतरे?
1. पार्टियों ने पुराने नेताओं के टिकट काटे
2. कई स्थानीय नेताओं ने बगावत कर दी
3. कई सीटों पर बिखराव की वजह बने

VIP, CPI, AIMIM, RJD, INC – हर पार्टी के बड़ी संख्या में उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई।

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