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क्या भारत में 2026 तक नष्ट हो पाएगा नक्सलवाद?

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भारत में 2000 के दशक में नक्सल प्रभावित राज्यों का मानचित्र (साभार इंटरनेट)
नई दिल्ली | 
भारत सरकार ने नक्सलवाद को 31 मार्च 2026 तक पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा है। गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2025 में संसद में घोषणा की थी कि देश नक्सल-मुक्त होगा और कोई नागरिक इस हिंसा का शिकार नहीं होगा। लेकिन क्या यह लक्ष्य हासिल हो पाएगा? 1967 से चला आ रहा नक्सलवाद, जो गरीबी और आदिवासी अधिकारों के नाम पर शुरू हुआ, आज कमजोर पड़ रहा है। 2025 में 300 से ज्यादा नक्सली निष्क्रिय हुए हैं, और प्रभावित जिलों की संख्या 126 से घटकर 18 रह गई है। आइए समझते हैं कि यह आंदोलन कैसे फैला, पहले स्थिति क्या थी, अब इसे कैसे काबू में लाया जा रहा है, और क्या 2026 तक इसे खत्म करना संभव है।
बसवराज की हत्या से नक्सल नेतृत्व को बड़ा झटका
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) में साल 2018 में नंबाला केशव राव (बसवराज) को महासचिव बनाया गया था जिसे संगठन का ‘इंजीनियरिंग ब्रेन’ माना जाता था।
बीते मई में 50 घंटे चले मिलिट्री ऑपरेशन में इसकी हत्या कर दी गई। 21 मई 2025 को छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ जंगलों में ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ के तहत CRPF, CoBRA और DRG की 500-600 सैनिकों ने ड्रोन और हेलीकॉप्टर का उपयोग कर माओवादी कैंप पर हमला बोला, जिसमें बसवराज समेत 27 माओवादी मारे गए। बसवराज की मौत माओवादी नेतृत्व के 70% हिस्से को खत्म करने वाली साबित हुई। गृह मंत्री अमित शाह ने इसे नक्सलवाद पर “निर्णायक झटका” बताया, जिससे रेड कॉरिडोर सिमट गया।
आखिर कैसे शुरू हुआ नक्सलवादी आंदोलन 
नक्सलवाद भारत में एक सशस्त्र आंदोलन है, जो गरीबों और आदिवासियों के अधिकारों की मांग को लेकर शुरू हुआ था। इसका नाम 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से पड़ा, जहाँ किसानों ने जमींदारों के खिलाफ बगावत की थी। इस आंदोलन को माओत्से तुंग (चीन के नेता) के विचारों से प्रेरणा मिली, इसलिए इन्हें माओवादी भी कहते हैं। शुरू में यह किसानों की जमीन और गरीबी के खिलाफ था, लेकिन बाद में यह हिंसा और हथियारों का रास्ता अपनाने लगा। 
छह राज्यों के 92 जिलों बन गए थे ‘रेड कॉरिडोर’
1980 और 1990 के दशक में यह आंदोलन बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के जंगलों में फैल गया, जिसका मुख्य कारण इन क्षेत्रों में सरकार की कम पहुंच होना था जिसका नक्लसवादियों ने फायदा उठाया। इसे ‘रेड कॉरिडोर’ कहा गया, जो 2004 तक 92 जिलों को प्रभावित करता था। माओवादी जंगलों में छिपकर सड़कें, रेलवे और पुलिस पर हमले करते थे, और उनका दावा था कि वे गरीबों के लिए लड़ रहे हैं।
2000 के दशक में चरम पर था नक्सलवाद
साल 2000 के दशक में नक्सलवाद अपने चरम पर था। 2010 में 1,936 नक्सली घटनाएँ हुईं, जिसमें 1,005 लोग मारे गए। इनमें ज्यादातर पुलिसकर्मी और आम नागरिक थे। माओवादियों के पास हथियार, ट्रेनिंग कैंप और हजारों सशस्त्र कैडर थे। वे जंगलों में अपनी सरकार (जोनल कमेटी) चलाते थे और सरकार को चुनौती देते थे। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ समेत नौ राज्यों में गरीबी, बेरोजगारी और आदिवासियों की अनदेखी ने नक्सलवादियों की ताकत बढ़ाई। 2005 तक छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र उनका सबसे बड़ा गढ़ बन गया, जहाँ हर साल 300-400 लोग मारे जाते थे। सरकार के पास न तो सही योजना थी और न ही सैनिकों का समन्वय, जिससे स्थिति बेकाबू हो गई थी।
दस साल में नक्सली हमले में भारी गिरावट 
पिछले कुछ सालों में सरकार ने नक्सलवाद पर कड़ा रुख अपनाया, जिससे स्थिति बदल गई। 2024 से शुरू हुए ‘ऑपरेशन कागर’ और अन्य अभियानों ने माओवादियों को कमजोर किया। 2024-2025 में हिंसा की घटनाएँ घटकर 374 रह गईं, और मृतकों की संख्या 150 तक सिमट गई। पहले दस साल पहले यह आंकड़ा 1000 से अधिक था। दुनियाभर में संघर्ष की घटनाओं पर सबसे व्यापाक डेटाबेस रखने वाले संगठन ACLED के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अब तक 255 माओवादी मारे गए है जो पहले के वर्षों (जैसे 2023 में 125 मौतें) के मुकाबले दोगुनी है। अब रेड कॉरिडोर 38 जिलों तक सिमट गया है, और ‘सबसे प्रभावित’ 6 जिले (बिजापुर, कांकेर, नारायणपुर, सुकमा, वेस्ट सिंहभूम, गढ़चिरोली) में भी उनकी पकड़ ढीली पड़ गई है।
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 नक्सलवाद कमजोर पड़ने की प्रमुख वजहें समझिए 
  1. बेहतर समन्वय और खुफिया जानकारी: केंद्रीय और राज्य बलों (CRPF, CoBRA, ग्रेहाउंड्स) के बीच यूनिफाइड कमांड ने काम किया। इंटेलिजेंस-बेस्ड ऑपरेशंस (जैसे अबूझमाड़ घुसपैठ) ने माओवादी नेतृत्व को निशाना बनाया। 2024 से ड्रोन, हेलीकॉप्टर और सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल बढ़ा, जो पहले सीमित था।
  2. सरेंडर पॉलिसी ने आकर्षित किया : सरेंडर पॉलिसी को और बेहतर बनाया जिसमें ₹50,000 की सहायता राशि व नई जिंदगी शुरू करने के लिए ट्रेनिंग व नौकरी दी जाती है। गृह मंत्रालय (MHA) के आधिकारिक डेटा के अनुसार, 2024-25 में लगभग 881 नक्सली सरेंडर हुए और मुख्यधारा में लौटे। 
  3. सरंदा डेवलपमेंट प्लानझारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के सरंदा जंगलों को माओवादियों का मजबूत गढ़ माना जाता था, यहां 2012 से 2018 तक एक पायलट योजना चली जिसे सरंदा डेवलपमेंट प्लान कहा गया। फिर इस विकास योजना को 2018 में ‘राष्ट्रीय नक्सल नियंत्रण रणनीति’ का हिस्सा बनाया। इसके तहत आदिवासी इलाकों में बुनियादी सुविधाएँ जैसे सड़कें, स्कूल, अस्पताल, बिजली और पानी मुहैया कराना शुरू किया गया। इससे आदिवासियों के बीच माओवादियों का असर घटा। इसके तहत 2024-25 में 200+ गाँवों तक बिजली और मोबाइल नेटवर्क पहुँचा, जो पहले माओवादियों की शक्ति थी। 50 नए प्राइमरी स्कूल और 10 स्वास्थ्य केंद्र खोले गए। 2025 में 15,000 घरों का निर्माण शुरू हुआ, जो अब पूरा होने की कगार पर है।
  4. सेना की संख्या बढ़ाई- पहले जो क्षेत्र माओवादियों के कब्जे में थे, अब वहां जगह-जगह सेना है।  2024 से इन क्षेत्रों में 10,000 से ज्यादा सैनिकों की तैनाती की गई है। CIAT स्कूलों (काउंटर इंटरसेप्ट एंड एंटी-टेरर ट्रेनिंग सेंटर्स) को बढ़ाया गया है, जहाँ पुलिस को जंगल युद्ध और नक्सलियों से लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है। SRE स्कीम (सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडीचर) के तहत फंडिंग बढ़ाई गई है, जो पुलिस को हथियार, ट्रेनिंग और बीमा के लिए पैसे देती है।
  5. माओवादियों की आंतरिक कलह भी मददगार बनी – 2023 में सेंट्रल कमिटी मेंबर ‘गणपति’ (एम. लक्ष्मण राव, पूर्व महासचिव) और ‘अभय’ (मल्लोजुला वेणुगोपाल राव, वर्तमान प्रवक्ता) के बीच मतभेद इतने बढ़ गए कि दोनों ने अलग-अलग गुट बना लिए। ‘गणपति’ चाहते थे हिंसक रास्ता जारी रखें, जबकि ‘अभय’ शांति वार्ता की बात कर रहे थे। इससे संगठन में एकता टूट गई और लोग एक-दूसरे से भरोसा खो बैठे। 
  6. कोविड में कैडर कमजोर हुआ- कोरोना वायरल संक्रमण के दौरान माओवादियों को बहुत नुकसान पहुँचाया। 2020-2022 में जंगलों में इलाज की कमी से 100 से ज्यादा माओवादी मर गए, जो उनके लिए बड़ा झटका था।
  7. नेतृत्व की कमी ने कमजोर किया- हाल में माओवादी संगठन को सबसे तगड़ा झटका उनके महासचिव नंबाला केशव राव (बसवराज) की मई 2025 में हत्या का लगा। वह इस संगठन का दिमाग था और उसकी कमी से माओवादियों को और कमजोर कर दिया। 
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इन सैन्य ऑपरेशनों में नक्सलियों को नुकसान हुआ 

  • ऑपरेशन कागर (2024-2025): छत्तीसगढ़ के बस्तर में 20,000 से ज्यादा सैनिकों ने माओवादी बेस पर हमले किए।
  • ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट (मई 2025) :  इसमें 31 माओवादी मारे गए, यह ऑपरेशन कागर का ही विस्तार है।
  • कांकेर क्लैश (अप्रैल 2024): 29 माओवादी मारे गए, पार्टापुर एरिया कमिटी खत्म हुई।
  • अबूझमाड़ में बड़ी कार्रवाई (अक्टूबर 2024, मई 2025): 38 और 26 माओवादी मारे गए, जिसमें महासचिव नंबाला केशव राव (बसवराज) भी शामिल थे।
  • सरेंडर और गिरफ्तारियाँ: 2024 में 163, 2025 में 142 माओवादी मारे गए। सितंबर 2025 में नारायणपुर में 16 और सेंट्रल कमिटी मेंबर सुजाता ने सरेंडर किया।
  • बिजापुर और झारखंड ऑपरेशन (2025): IED अटैक और रेलवे विस्फोट के जवाब में 5-3 माओवादी मारे गए।
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सेना के ऑपरेशनों पर उठते रहे हैं मानवाधिकार के सवाल
सेना के इन ऑपरेशनों ने माओवादियों को कमजोर तो किया, लेकिन मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल उठे हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच और PUCL (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ) जैसी संस्थाओं के अनुसार, 2024-2025 में 400 से अधिक मौतें हुईं, जिनमें आम नागरिक भी शामिल थे। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इन ऑपरेशनों के जरिए एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग्स (फर्जी मुठभेड़ें), गाँवों पर बमबारी और आदिवासियों को ‘माओवादी समर्थक’ बताकर गिरफ्तारियाँ होना आम हो गया है।  उदाहरण: जनवरी 2025 में बिजापुर में 6 महीने की बच्ची की मौत, और दिसंबर 2024 में अबूझमाड़ में 4 बच्चों पर गोलीबारी।
एसओपी को नहीं मानने के आरोप – सिविल सोसाइटी रिपोर्ट्स में कहा गया कि सिक्योरिटी फोर्सेस ने SOP (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) का पालन नहीं किया, और कई मामलों में निर्दोष आदिवासियों को ‘ह्यूमन शील्ड’ बताकर मारा गया। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने भी इन ऑपरेशंस पर चिंता जताई, और चेंज.ऑर्ग पर याचिकाएँ दायर हुईं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ऐसा भी आरोप लगाया कि ये कार्रवाइयाँ आदिवासियों के विस्थापन और कॉर्पोरेट खनन के लिए भूमि हथियाने से जुड़ी हैं। 
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जमीन हकीकत : सरकार मजबूत हुई पर मिलिट्रीकरण से चिंता 
बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में राज्य शासन धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है, लेकिन अभी भी चुनौतियाँ बाकी हैं।  यहां मिलिट्रीकरण बढ़ा है और अभी हर नौ नागरिकों पर एक सैनिक तैनात है जिससे आदिवासी डरते हैं।
साल 2025 तक बस्तर और कोण्डागाँव जैसे जिले ‘नक्सल-फ्री’ घोषित हो चुके हैं, जहाँ 29 गाँवों में पहली बार तिरंगा फहराया गया। सरकार ने 250 से अधिक सिक्योरिटी कैंप स्थापित किए, और 30 नए फॉरवर्ड बेस खोले जा रहे हैं। यहां विकास योजनाएँ लागू करके बिजली, पानी, सड़क बनाई जा रही है पर यहां की जमीनी वास्तविकता जटिल है। 
ACLED डेटा के अनुसार, 2025 में यहां 255 मौतें हुईं, साथ ही आम नागरिकों की मौत का आंकड़ा 27% बढ़ा है।  विशेषज्ञ कहते हैं कि जंगलों में माओवादी अभी भी सक्रिय हैं, और राज्य शासन विकास तक सीमित है। न्याय और मानवाधिकार अभी भी कमजोर हैं। सरकार का लक्ष्य मार्च 2026 तक नक्सलवाद खत्म करना है, लेकिन आदिवासी असंतोष बाकी है। विशेषज्ञ कहते हैं कि 2026 लक्ष्य तभी संभव है, अगर मानवाधिकार और विकास पर ध्यान दिया जाए।

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कैसे समृद्ध बनेगा बिहार? हर 100 में से 72 रुपये के लिए हम केंद्र के भरोसे, CAG Report में खुलासा

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नीतीश कुमार 9 बार सीएम बन चुके हैं और इस बार भी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और अप्रत्याशित जीत मिली।
  • बिहार में साल 2022-23 के लेखे-जोखे से जुड़ी कैग रिपोर्ट विधानसभा में पेश हुई।
  • नीतीश सरकार ने ₹70,877 करोड़ के खर्च का कोई हिसाब नहीं सौंपा।
पटना |
नीतीश कुमार की सरकार लगातार कहती आ रही है कि वे विकसित बिहार बनाएंगे, पर सच्चाई यह है कि अब भी बिहार सबसे गरीब राज्य है और आत्मनिर्भरता से कोसों दूर है। इसी बात की तस्दीक CAG (कैग) की रिपोर्ट में हुई है जो 26 फरवरी को विधानसभा में पेश की गई। रिपोर्ट बताती है कि बिहार सरकार के पास आने वाले कुल रुपये (₹1,72,688 करोड़) में से 72.12% हिस्सा केंद्र सरकार से मिला है। आसान भाषा में कहें तो बिहार को चलाने के लिए लगने वाले हर 100 रुपये में से ₹72 केंद्र से आते हैं। इतने पर भी सरकार में भ्रष्टाचार इतना है कि 70.8 हजार करोड़ रुपये के खर्च का लेखा-जोखा गायब है।

1- 72.12% बजट के लिए केंद्र पर निर्भर 

बिहार की समृद्धि के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा इसकी अत्यधिक निर्भरता है। 2022-2023 में सरकार के पास आए कुल रुपये (₹1,72,688 करोड़) में से 72.12% हिस्सा केंद्र सरकार से मिला है। राज्य का अपना राजस्व (Internal Revenue) मात्र ₹48,152 करोड़ है। यानी ₹1,24,536 रुपये केंद्र ने दिए। समझा जा सकता है कि बड़े विकास कार्यों के लिए बिहार को केंद्र की मदद पर निर्भर रहना पड़ा। 

2. भारी-भरकम खर्च का हिसाब नहीं

CAG ने रिपोर्ट में सरकारी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। राज्य सरकार ने 2022-23 में ₹70,877 करोड़ खर्च तो कर दिए, लेकिन अभी तक इनका ‘उपयोगिता प्रमाण पत्र’ (UC) जमा नहीं किया गया है। यानी इस खर्च की रसीद व वाउजर कैग को नहीं सौंपे गए। जब इतने भारी बजट के खर्च का पारदर्शी हिसाब नहीं होगा, तो भ्रष्टाचार की आशंका बनी रहती है और केंद्र से मिलने वाली अगली किस्तों में भी देरी होती है।

3. राजस्व वसूली में सुस्ती से कमाई घटी 

भ्रष्ट नेता व अफसरों के चलते सरकार के खाते में राजस्व कमाई नहीं पहुंच रही। 2022-23 में राज्य के सभी विभागों को राजस्व के रूप में जनता और संस्थाओं से लगभग ₹4,884 करोड़ वसूलने थे, जो पेडिंग हैं। इसमें से ₹1,430 करोड़ तो ऐसे हैं जो पिछले 5 साल से भी ज्यादा समय से अटके हुए हैं। परिवहन और खनन जैसे प्रमुख विभागों में करोड़ों की टैक्स वसूली पेंडिंग है।

4. आधी सरकारी कंपनियां ‘सफेद हाथी’

बिहार की कई सरकारी कंपनियां सफेद हाथी साबित हो रही हैं। 37 सरकारी कंपनियों (SPSEs) में से सिर्फ 18 ही मुनाफे में हैं। बाकी कंपनियां भारी घाटे में चल रही हैं, जिसका कुल बोझ ₹27,307 करोड़ तक पहुंच गया है। 

5. बिहार पर GSDP के 39% हिस्से का कर्ज 

कैग रिपोर्ट से पता लगा है कि साल 2022-23 में बिहार की कुल देनदारियां (कर्ज) ₹2.88 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान था। यह बिहार की कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का लगभग 38.66% था। 

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धीमी गति से सुधार : मात्र ₹5 रुपये की निर्भरता घटी

साल 2021-22 के CAG और बजट विश्लेषण के मुताबिक, तब बिहार अपने हर सौ रुपये में से 78 रुपये के लिए केंद्र सरकार पर निर्भर था। एक साल बाद यानी 2022-23 में यह निर्भरता मात्र पांच रुपये कम हुई है, यह बेहद धीमी गति है। उस पर भी 70.8 हजार करोड़ रुपये के खर्च का कोई हिसाब नहीं दिया गया है।
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कैसे बदलेगी तस्वीर?

  • बुनियादी ढांचे पर जोर : सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने से उद्योग को बढ़ावा मिलेगा।
  • उद्योगों को बढ़ावा: जब तक राज्य में निजी निवेश नहीं आएगा, राज्य का अपना टैक्स (SGST) नहीं बढ़ेगा।
  • टैक्स चोरी पर लगाम: परिवहन और खनन जैसे क्षेत्रों में लीकेज रोककर राजस्व बढ़ाया जा सकता है।
  • सरकारी कंपनियों का कायाकल्प: घाटे में चल रही कंपनियों को बंद करना या उनमें सुधार करना अनिवार्य। 
  • नॉन-टैक्स राजस्व बढ़ाना: बालू खनन और पर्यटन की आय को व्यवस्थित व पारदर्शी बनाना होगा।
  • वित्तीय पारदर्शिता : सरकारी विभाग अपने हर खर्च के हिसाब को पारदर्शी बनाएं, वरना केंद्र से मदद में देरी होगी।

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दुनिया गोल

Critical Minerals Deal: भारत-ब्राजील के बीच हुआ समझौता, कितनी घटाएगा चीन पर निर्भरता?

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भारत दौरे पर आए ब्राजीली राष्ट्रपति लुला के साथ भारतीय पीएम मोदी। (Photo Credit - X/@narendramodi)
भारत दौरे पर आए ब्राजीली राष्ट्रपति लुला के साथ भारतीय पीएम मोदी। (Photo Credit - X/@narendramodi)
  • ब्राजील के राष्ट्रपति ने भारत दौरे पर महत्वपूर्ण समझौता किया।
  • महत्वपूर्ण खनिज और दुर्लभ मृदा को लेकर हुआ एमओयू।
  • अभी इस क्षेत्र में भारत 95% खनिजों का आयात करता है।

नई दिल्ली |

भारत और ब्राजील ने महत्वपूर्ण खनिज (critical minerals) और दुर्लभ मृदा (rare earths) को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौता (MoU) किया है। इन प्राकृतिक संसाधनों की खरीद के लिए भारत की निर्भरता चीन पर बहुत ज्यादा है, ऐसे में इस समझौते (Memorandum of Understanding) के जरिए भारत को ब्राजील के रूप में नया आयातक मिलेगी जो उसकी चीन पर निर्भरता घटाने की रणनीति का हिस्सा है। यह समझौता ब्राजीली राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा के भारत दौरे के दौरान 21 फरवरी को हुआ।

आवश्यक खनिज से जुड़े MoU हस्ताक्षर से पहले हुई बैठक। (X/@narendramodi)

आवश्यक खनिज से जुड़े MoU हस्ताक्षर से पहले हुई बैठक। (X/@narendramodi)

इस समझौते से वैश्विक सप्लाई चेन (Global Supply Chain) को भी मजबूती मिलेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को विश्वास का प्रतिबिंब बताया है। जबकि राष्ट्रपति लुला (Lula da Silva) ने कहा कि इस समझौते से ब्राजील के खनिज भंडार के उपयोग में वृद्धि हो सकती है, जो अभी सिर्फ 30% ही उपयोग हो रहा है। इसके अलावा, दोनों देशों का लक्ष्य अगले 5 साल में द्विपक्षीय व्यापार को 20 अरब डॉलर तक पहुंचाने का है।

गौरतलब है कि क्रिटिकल मिनरल्स (जैसे लिथियम, कोबाल्ट, नियोबियम, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ्स) का इस्तेमाल हरित ऊर्जा, EVs, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा के लिए जरूरी है। भारत अपनी खनिज जरूरत का 95% हिस्सा आयात करता है। दूसरी ओर, खनिज क्षेत्र में पूरी दुनिया के उत्पादन का 90 फीसदी से अधिक हिस्से का नियंत्रण चीन के पास है। ऐसे में इस MoU से भारत को वैकल्पिक स्रोत मिलेगा, जो भू-राजनीतिक जोखिम कम करेगा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की खनिज खरीद में तत्काल बड़ी कमी नहीं आएगी लेकिन आने वाले 3 से 5 साल में चीन पर निर्भरता 20 से 30% तक घट सकती है।

भारत व ब्राजील के बीच हुआ समझौता।

MoU साइन होने के दौरान ब्राजीली राष्ट्रपति व भारतीय पीएम।

समझौते की डिटेल जानिए 

विदेश मंत्रालय की ओर से जारी दस्तावेजों के अनुसार, ब्राजील के साथ हस्ताक्षर किया गया MoU, रेयर अर्थ मिनरल्स और क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में सहयोग पर केंद्रित है। इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं-

1- अनछुए खनिज खोजने में भारतीय कंपनियां मदद कर सकेंगी –   अनछुए खनिज भंडार का पता लगाने में (Exploration) भारतीय कंपनियां हिस्सा ले सकती हैं। लुला ने कहा कि भारत की तकनीकी विशेषज्ञता से ब्राजील के 70% अनछुए भंडारों का फायदा उठाया जा सकता है। ब्राजील के अभी तक उपयोग में नहीं लाए जा सके (Unused) खनिज भंडार – नीओबियम, लिथियम व आयरन (Iron Ore) से जुड़े हैं।

2- लौह अयस्क के लिए बनेगा स्पेशल इकोनॉमिक जोन – भारत-ब्राजील के संयुक्त उद्यम के जरिए लौह अयस्क का खनन बढ़ाया जाएगा। इसके लिए भारत में लौह अयस्क के सबसे बड़े उत्पादक NMDC (राष्ट्रीय खनिज विकास निगम), ब्राजील की Vale और अडानी गंगावरम पोर्ट के बीच एक त्रिपक्षीय MoU पर हस्ताक्षर हुए हैं, जो $500 मिलियन का है। इसके जरिए लौह अयस्क या आयरन ओर की ब्लेंडिंग फैसिलिटी के लिए स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाया जाएगा।

3- भारतीय कंपनियों को ब्राजील में खनन प्रोजेक्ट मिलेंगे – भारतीय निवेशकों को ब्राजील में खनन प्रोजेक्ट्स में हिस्सेदारी मिलेगी। और ब्राजील को भारत में तकनीकी निवेश मिलेगा।


समझौते पर आगे की राह

भारत-ब्राजील के बीच का यह एक गैर-बाध्यकारी MoU है, जो व्यावहारिक सहयोग के लिए रोडमैप देता है। इससे आगे जॉइंट वर्किंग ग्रुप्स बनेंगे, जो मिनिस्ट्री ऑफ माइन्स और विदेश मंत्रालय के तहत काम करेंगे।

गौरतलब है कि 2023 में भारत ने ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिशन’ के तहत लक्ष्य रखा था कि वह साल 2030 तक इन आवश्यक खनिजों का 50% उत्पादन घरेलू स्तर पर करेगा।


By <a href="//commons.wikimedia.org/wiki/User:RCraig09" title="User:RCraig09">RCraig09</a> - <span class="int-own-work" lang="en">Own work</span>, <a href="https://creativecommons.org/licenses/by-sa/4.0" title="Creative Commons Attribution-Share Alike 4.0">CC BY-SA 4.0</a>, <a href="https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=148115012">Link</a>

आवश्यक खनिज की जितनी ज्यादा आवश्यकता बढ़ती जा रही है, जलवायु परिवर्तन के चलते उतनी ही तेजी से इनके अस्तित्व पर भी संकट पैदा हो गया है। (साभार – विकिमीडिया)

भारत की चीन पर निर्भरता कितनी ?

  • भारत अपनी रेयर अर्थ्स की जरूरत का 95 से 100% हिस्सा चीन से खरीदता है, यानी पूरी तरह चीन पर निर्भर है।
  •  ग्रेफाइट का 80%, लिथियम का 60-70% हिस्सा चीन से खरीदा जाता है।
  • 2025 में भारत ने चीन से 1.5 अरब डॉलर के मिनरल्स आयात किए।

चीन के अलावा किससे होता है आयात

  • लिथियम का आयात ऑस्ट्रेलिया व चिली से।
  • कोबाल्ट का आयात कांगो व इंडोनेशिया से।
  • निकेल के लिए भारत चीन के अलावा इंडोनेशिया पर निर्भर।

भारत को इतने खनिज की आखिर क्या जरूरत?

क्रिटिकल मिनिरल या आवश्यक खनिज का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी निर्माण, सोलर विंड एनर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा (मिसाइल्स) व फार्मा के क्षेत्र में होता है। बैटरी बनाने में 70% आवश्यक खनिज इस्तेमाल होता है।

1- इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी निर्माण : 

भारत में बढ़ती बाइक-कारों की मांग, मंहगे होते पेट्रोल-डीजल व बढ़ते प्रदूषण के चलते सरकार ने 2030 तक कुल वाहनों का 30% इलेक्ट्रिक वाहन (EVs) करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए ज्यादा आवश्यक खनिज चाहिए। 

2- सोलर और विंड एनर्जी :

कोयले पर भारत की निर्भरता घटाने के लिए सौर ऊर्जा व पवन ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाना होगा। 2030 तक 500 गीगावाट (GW) नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता बनाने का लक्ष्य है। अभी इसकी दक्षता लगभग 200 GW है। 

3- इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र :

स्मार्टफोन, कंप्यूटर, LED लाइट, सेमीकंडक्टर चिप्स में रेयर अर्थ लगते हैं। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात को $300 बिलियन तक ले जाना चाहता है। डिजिटल इंडिया, AI व 5G जैसे क्षेत्र बिना क्रिटिकल मिनरल्स के नहीं चल सकते। 

4- रक्षा (मिसाइल्स, एयरोस्पेस):

टाइटेनियम, टंगस्टन व रेयर अर्थ्स के जरिए मिसाइल, फाइटर जेट, रडार व सैटेलाइट बनते हैं। आत्मनिर्भर भारत और रक्षा उत्पादन बढ़ाने के लिए इन मिनरल्स की आवश्यकता है वरना विदेशी निर्भरता कम नहीं होगी।  

5- फार्मास्यूटिकल्स (दवाइयां):

भारत दुनिया का बड़ा जेनेरिक दवा उत्पादक है। कुछ रेयर अर्थ और मिनरल कैटेलिस्ट के रूप में दवा बनाने में मदद करते हैं। इससे प्रोसेसिंग स्पीड बढ़ती है और शुद्धिकरण में इस्तेमाल होते हैं। ये मिनरल सप्लाई चेन में महत्वपूर्ण हैं।

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AI Impact Summit-2026 : 88 देश जिस घोषणा पत्र पर सहमत हुए, उसे जानिए

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India AI Impact Summit 2026 (Representational Photo)
India AI Impact Summit 2026 (Representational Photo)
  • एआई तकनीक को लेकर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन 16 से 21 फरवरी के बीच हुआ।

नई दिल्ली|

भारत में आयोजित हुए पहले एआई इम्पैक्ट समिट- 2026 (India AI Impact Summit 2026) का समापन शनिवार (21 feb) को हो गया। दिल्ली के भारत मंडपम में चली इस सम्मेलन में 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने घोषणा पत्र (डिक्लेरेशन) पर हस्ताक्षर किए हैं।

इस बात की जानकारी केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक्स पर दी।

मानव केंद्रित AI का दिया संदेश

इस घोषणा पत्र की प्रस्तावना (Preamble) में स्पष्ट किया गया है कि एआई के वादे को तभी साकार किया जा सकता है जब उसके लाभ मानवतावादी हों।  इसी घोषणापत्र को लेकर IT मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक्स पर लिखा – “पूरी दुनिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ह्यूमन सेंट्रिक एआई सोच को समर्थन दिया है। यह डिक्लेरेशन ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के सिद्धांत से प्रेरित है, ताकि एआई संसाधन पूरी दुनिया के लोगों के लिए उपलब्ध हो सकें।”

इन घोषणाओं पर बनी सहमति

  • एआई संसाधनों का लोकतंत्रीकरण किया जाए, जिसमें मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सस्ती कनेक्टिविटी हो।
  • “वसुधैव कुटुम्बकम” से प्रेरित होकर सभी देशों तक एआई संसाधनों की पहुंच बढ़ानी चाहिए।
  • डेमोक्रेटिक डिफ्यूजन ऑफ एआई चार्टर को एक स्वैच्छिक फ्रेमवर्क के रूप में नोट किया गया, जो फाउंडेशनल एआई संसाधनों तक पहुंच बढ़ाएगा।
  • आर्थिक विकास और सामाजिक भलाई के लिए एआई की व्यापक स्वीकृति हो।
  • सुरक्षित और मजबूत एआई विश्वास बनाने और सामाजिकआर्थिक लाभों को अधिकतम करने के लिए बुनियादी है।
  • एआई सिस्टम में सुरक्षा महत्वपूर्ण है, उद्योगप्रेरित स्वैच्छिक उपायों, तकनीकी समाधानों और नीतिगत फ्रेमवर्क को अपनाने पर जोर।

गौरतलब है कि यह घोषणापत्र बाध्यकारी नहीं है, यह देशों व संगठनों के लिए स्वैच्छिक है।

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