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चुनावी डायरी

‘नीतीश कुमार को दिल्ली भेजने से JDU ही नहीं BJP को भी नुकसान होगा, ये वादाखिलाफी है’ : पूर्व सांसद आनंद मोहन

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पूर्व सांसद व बाहुबली आनंद मोहन

सहरसा | मुकेश कुमार

अब यह साफ हो चुका है कि राज्यसभा के लिए चुने गए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 30 मार्च तक इस्तीफा देंगे। इस बीच पूर्व सांसद और बाहुबली आनंद मोहन ने नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले पर असहमति जताते हुए बीजेपी पर निशाना साधा है।

सहरसा से संबंध रखने वाले दो बार सांसद रह चुके बाहुबली आनंद मोहन ने मीडिया से बात करते हुए कहा,

“यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है कि यह मुख्यमंत्री की निजी इच्छा है। फैसला थोपा गया हो या स्वयं नीतीश कुमार का है, मैं और मेरे जैसे लाखों लोग इससे पूर्णतः इससे असहमत हैं। इससे जदयू को नुकसान तो होगा ही, लेकिन उससे ज्यादा नुकसान बीजेपी को होगा।”

गौरतलब है कि आनंद मोहन, जदयू के सदस्य नहीं हैं पर वे और उनका परिवार पार्टी के साथ जुड़ा रहा है।

‘जदयू-बीजेपी पर असर, विपक्ष को फायदा होगा’

आनंद मोहन का कहना है कि इससे जदयू के लव-कुश समीकरण (कुर्मी-कोइरी) पर असर पड़ेगा और विपक्ष को इसका फायदा होगा।

उन्होंने कहा कि

जिन कथित चाणक्यों, मंत्रणाकारों और योजनाकारों ने इस घटनाक्रम को अंजाम दिया है, उसने जदयू की तो मिट्टी पलीद तो की ही ही, भाजपा काे भी भारी नुकसान पहुंचाया है जो आने वाले समय में सामने आएगा। मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा सांसद बनना सीधा डिमोशन है।

‘नीतीश के फैसले से जदयू में भगदड़’

आनंद मोहन ने कहा कि नीतीश कुमार की इस घोषणा के बाद जदयू नेता भौचक्के थे और दूसरी पार्टियों की ओर देख रहे थे। ये अच्छा हुआ कि तुरंत निशांत कुमार को जदयू में लाया गया।

साथ ही बोले कि पद छोड़ने की घोषणा के बाद समृद्धि यात्रा पर निकलकर नीतीश कुमार ने कार्यकर्ताओं व आम लोगों के गुस्से को कम कर दिया वरना स्थिति अलग होती।

‘राजनीतिक पाप क्यों करना पड़ा?’

उन्होंने सवाल किया कि “हाल में हुए विधानसभा चुनाव में जब ‘फिर से नीतीश कुमार’ का नारा देकर जनता से वोट मांगा गया था तो फिर अचानक कौन सा पहाड़ टूट पड़ा कि चार महीने के अंदर यह ‘राजनीतिक पाप’ करना पड़ा?”

उन्होंने कहा कि इससे शोषितों, वंचितों, गरीबों में बहुत गलत संदेश गया है। लोग इसे राजनीतिक विश्वासघात और वादाखिलाफी मानते हैं।

‘अब संगठन पर पूरी नज़र रखें नीतीश कुमार’

पूर्व सांसद आनंद मोहन ने कहा कि अब जबकि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जा ही रहे हैं तो वे पार्टी संगठन पर अपनी पूरी कमान रखें, ताकि कार्यकर्ताओं में मैसेज जाए कि फैसले वही ले रहे हैं। अब पार्टी में कोई कार्यकारी अध्यक्ष नहीं होना चाहिए।

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बिहार कांग्रेस में 11 साल बाद बड़ा बदलाव, लेकिन ‘सोशल इंजीनियरिंग’ पर क्यों नहीं बन रही सहमति?

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पटना स्थित कार्यालय में बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष राजेश राम (फाइल फोटो - X/@INCBihar)
पटना स्थित कार्यालय में बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष राजेश राम (फाइल फोटो - X/@INCBihar)

पटना | बिहार में कांग्रेस का आधार तेज़ी से घटा है, हाल में हुए विधानसभा चुनाव में इसने मात्र छह सीटें जीतीं।  ऐसे में 11 साल के बाद बिहार के ब्लॉक व जिला स्तर के नेतृत्व में 11 साल के बाद बड़े बदलाव किए जा रहे हैं। पर कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने नए जिलाध्यक्षों की जो सूची जारी की है, इसको लेकर बिहार कांग्रेस में गहरी असहमति है।

बिहार कांग्रेस ने मांग की है कि नए जिलाध्यक्ष का चुनाव करते समय सामाजिक संतुलन को ध्यान रखा जाना चाहिए। बिहार के नेताओं ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि केंद्रीय कांग्रेस की ओर से बिहार के नए नेतृत्व की जो सूची जारी की गई है उसमें 45 फीसदी नेता ऊंची जाति से हैं। ऐसे में बिहार कांग्रेस के नेताओं की मांग है कि उनकी ओर से जो लिस्ट प्रस्तावित थी, उस पर पुनर्विचार किया जाए।

53 में से 24 जिलाध्यक्ष अगड़ी जाति के

बता दें कि बिहार में 38 प्रशासनिक जिले हैं लेकिन कांग्रेस ने इसे 53 संगठनात्मक जिलों में बांटा है। बीती 30 मार्च को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव केसी वेणु गोपाल ने बिहार के नए जिलाध्यक्षों की एक सूची जारी की थी। इस सूची में 24 जिलाध्यक्ष उच्च जाति से संबंध हैं। 12 जिलाध्यक्ष ओबीसी से हैं जिसमें आठ यादव हैं। पांच जिलाध्यक्ष पिछड़ी जाति से, तीन अति पिछड़ी जाति से संबंधित हैं। इसके अलावा, आठ मुस्लिम व एक सिख धर्म से हैं।

‘नई सूची राहुल गांधी के संदेश के विपरीत’

बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष राजेश राम के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि सही सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए हम केंद्रीय नेतृत्व से सूची में संशोधन की मांग कर रहे हैं। साथ ही हम ब्लॉक जिलाध्यक्षों की भी एक अनुमानित लिस्ट बना रहे हैं।

गौरतलब है कि राहुल गांधी ने 2025 में बिहार में संविधान बचाओ यात्रा निकाली थी, इस दौरान स्थानीय नेताओं ने उनसे पार्टी में बड़े बदलावों की मांग की थी जो सोशल जस्टिस को दर्शाते हों।

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विधान परिषद की सदस्यता छोड़ी पर CM पद क्यों नहीं, क्या है नीतीश कुमार की रणनीति?

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नीतीश कुमार बिहार में बीस साल से सत्ता में हैं और दसवीं बार मुख्यमंत्री की शपथ 20 नवंबर को ली थी। (फेसबुक-nitishkumarjdu)

नई दिल्ली | नीतीश कुमार ने सोमवार (30 march) को बिहार विधान परिषद से इस्तीफा देकर अपनी राज्यसभा सदस्यता बचा ली है।

लेकिन साथ ही उन्होंने एक और राजनीतिक दांव खेलते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया।

यानी भले वे अब बिहार विधानसभा के किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं लेकिन नियम के हिसाब से अगले 6 महीने तक इस तरह भी मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं।

दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य रहे 6 महीने तक मुख्यमंत्री रह सकता है।

हालांकि यह भी अटकलें हैं कि वे 14 अप्रैल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं।

बिहार की राजनीति में खरमास के समय राजनेताओं के शुभ काम न करने का चलन रहा है, खरमास इसी तारीख को खत्म हो रहा है।

उधर, नीतीश कुमार के इस्तीफा देते ही उनके करीबी मंत्री अशोक चौधरी भावुक हो गए। पूरे बिहार में जदयू कार्यकर्ताओं के बीच निराशा देखी जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सीएम पद न छोड़ना नीतीश कुमार की एक सोची-समझी रणनीति है। वे अपने समर्थकों को संदेश देना चाहते हैं कि वे अपनी शर्तों पर विदा हो रहे हैं।

उधर, जदयू से जुड़े बाहुबली नेता आनंद मोहन ने हाल में कहा कि नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के फैसले से कार्यकर्ताओं में भगदड़ है। साथ ही चेताया कि नीतीश को दिल्ली भेजने के इस षडयंत्र का नुकसान भाजपा को भी होगा।

बता दें कि नीतीश कुमार लंबे समय से विधान परिषद के सदस्य बनकर विधानसभा में पहुंचते रहे हैं। उन्होंने आखिरी बार 1985 में हरनौत सीट से विधान सभा का चुनाव लड़ा था। आगामी 10 अप्रैल को वे राज्यसभा सदस्य पद की शपथ लेंगे।

 

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बिहार : नीतीश की विदाई पर भावुक हुए मंत्री अशोक चौधरी, बोले- ‘मुश्किल तो है और मुसीबत भी है’

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कैबिनेट मंत्री अशोक चौधरी, बिहार भवन निर्माण विभाग

​पटना | हमारे संवाददाता

20 साल से बिहार में शासन चला चुके और दसवीं बार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे की तारीख नज़दीक आते ही उनके करीबी नेताओं की भावुकता मीडिया के सामने आने लगी है।

नीतीश सरकार के कैबिनेट मंत्री अशोक चौधरी मीडिया के सामने भावुक हो गए। जब अशोक चौधरी से पूछा गया कि सदन में अब उन्हें कौन गाइड करेगा? इस पर उन्होंने रुंधे गले से कहा— “मुश्किल तो है और मुसीबत भी है।”

गौरतलब है कि अशोक चौधरी पहले बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उसके बाद जदयू में शामिल हुए और नीतीश कुमार के वफादार बेहद करीबी नेता बन गए। वे जेडीयू के पूर्व कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

अशोक चौधरी ने नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले को लेकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा-

“निश्चित तौर पर यह फैसला हम सबको बहुत खलेगा। कौन नहीं जानता कि नीतीश कुमार ने बिहार के लिए क्या कुछ नहीं किया? कई लोगों के वीडियो वायरल हुए, आपने देखा होगा। यह हम सबके लिए बहुत ही भावुक पल है, लेकिन अंततः यह नीतीश कुमार जी का अपना फैसला है और इसमें हम लोग कुछ नहीं कर सकते।”
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निशांत सीएम मैटीरियल हैं..

नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को ‘बिहार का भविष्य’ बताने वाले शहर में लग रहे पोस्टरों के बारे में जब उनसे पूछा गया तो पलटकर सवाल करते हुए बोले- “क्यों नहीं हो सकता? हमारे कार्यकर्ता चाहते हैं। निशांत कुमार के बारे में सबको पता है। बिहार में वो लोग मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं जो मैट्रिक तक पास नहीं हैं, तो फिर निशांत क्यों नहीं? निशांत तो पढ़े-लिखे और योग्य हैं।”

30 मार्च को इस्तीफा दे सकते नीतीश कुमार

गौरतलब है कि, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नियम मुताबिक राज्यसभा सदस्य चुने जाने के 14 दिनों के अंदर इस्तीफा देना है, यह अवधि 30 मार्च को समाप्त हो रही है, ऐसे में माना जा रहा है कि वे इसी तारीख को इस्तीफा देंगे।

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