जनहित में जारी
सरकारी कागजों में तो ‘VIP’ और ‘VVIP’ की कोई औक़ात नहीं !
- यूपी के बरेली कॉलेज के पूर्व लॉ विभागाध्यक्ष और आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. प्रदीप कुमार ने लगाई आरटीआई।
- गृह मंत्रालय से पूछा कि वीआईपी और वीवीआईपी दर्जे के लिए कौन पात्र, सरकार का जवाब चौंकाने वाला।
नई दिल्ली | शिवांगी
9 जून 2025 को बरेली कॉलेज के पूर्व लॉ विभागाध्यक्ष और आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. प्रदीप कुमार ने गृह मंत्रालय से पूछा कि वीआईपी और वीवीआईपी दर्जे के लिए कौन पात्र है, और इससे संबंधित नियम, अधिसूचनाएं, या सरकारी आदेश उपलब्ध कराए जाएं। 16 जून 2025 को गृह मंत्रालय की वीआईपी सिक्योरिटी यूनिट ने जवाब दिया कि “ऐसा कोई आधिकारिक नामकरण (nomenclature) नहीं है जो किसी व्यक्ति को वीआईपी या वीवीआईपी का दर्जा देता हो।” सुरक्षा का निर्धारण खुफिया एजेंसियों द्वारा खतरे के आकलन (threat perception) के आधार पर होता है। डॉ. प्रदीप ने इस जवाब को असंतोषजनक बताया, उनका कहना है कि यूनिट का नाम ही ‘वीआईपी सिक्योरिटी यूनिट’ है, जो स्वयं विरोधाभासी है।
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वीआईपी (Very Important Person): सामाजिक, राजनीतिक, या आर्थिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति, जैसे राजनेता, सेलिब्रिटी, उद्योगपति, वरिष्ठ अधिकारी, या धार्मिक नेता।
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वीवीआईपी (Very Very Important Person): उच्चतर श्रेणी, जैसे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, या शीर्ष न्यायाधीश।
वीआईपी संस्कृति लोकतांत्रिक नैतिकता के ख़िलाफ़ : सुप्रीम कोर्ट
2013 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इन शब्दों की उत्पत्ति और लोकतांत्रिक भारत में इनके उपयोग की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया। कोर्ट ने इसे “लोकतांत्रिक नैतिकता” के खिलाफ माना और सुरक्षा संसाधनों के दुरुपयोग पर चिंता जताई। 2012 और 2013 में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और गृह मंत्रालय के जवाबों के अनुसार, इन शब्दों की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है। “वॉरंट ऑफ प्रेसिडेंस” केवल औपचारिक समारोहों के लिए प्राथमिकता तय करता है, लेकिन दैनिक सुविधाएं अनौपचारिक और खतरे के आकलन पर आधारित हैं।
सुरक्षा श्रेणियों को जानिए:
भारत में सुरक्षा छह स्तरों में बांटी गई है: SPG, Z+, Z, Y+, Y, और X।
- SPG (Special Protection Group): यह केवल प्रधानमंत्री और उनके परिवार (तथा पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिवारों को 10 साल तक) के लिए है। SPG एक कुलीन बल है, जिसके विवरण गोपनीय हैं। 1988 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद SPG अधिनियम लागू हुआ।
- Z+: उच्चतम गैर-SPG सुरक्षा, जिसमें 55 कर्मी (10+ NSG कमांडो, दिल्ली पुलिस/CRPF/ITBP) शामिल हैं। उदाहरण: राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ, मायावती, राहुल गांधी, अमित शाह। मार्च 2021 में लगभग 40 व्यक्तियों को Z+ सुरक्षा थी।
- Z: 22 कर्मी (4-6 NSG कमांडो, एक एस्कॉर्ट कार)। इसमें मंत्रियों, जजों, और अन्य प्रमुख व्यक्तियों को शामिल किया जाता है।
- Y+: 11 कर्मी (2-4 कमांडो, पुलिस)।
- Y: 2 व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (PSO)।
- X: 1 PSO, सामान्यतः सशस्त्र राज्य पुलिस द्वारा।
फायदे : विशेष छूट, सुरक्षा से लेकर सुविधाओं में प्राथमिकता
- प्राथमिकता पहुंच: हवाई अड्डों पर विशेष सुरक्षा जांच, होटल चेक-इन, और रेस्तरां में आरक्षण।
- विशेष स्थान: समारोहों में वीआईपी/वीवीआईपी के लिए अलग सीटें, लाउंज, और निजी स्थान।
- सुरक्षा व्यवस्था: सशस्त्र गार्ड, लाल बत्ती (हालांकि 2017 में हटाई गई), और काफिले।
- अन्य सुविधाएं: मंदिरों में विशेष दर्शन (जैसे तिरुपति, लालबागचा राजा), टोल छूट, और प्राथमिक चिकित्सा सेवाएं।
खुफिया एजेंसियों के इनपुट पर तय होता है सुरक्षा का स्तर
- गृह मंत्रालय, इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB), और अन्य खुफिया एजेंसियों की समिति खतरे के आधार पर सुरक्षा स्तर तय करती है। “ब्लू बुक” में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, और प्रधानमंत्री के लिए दिशानिर्देश हैं, जबकि “येलो बुक” में अन्य वीआईपी/वीवीआईपी के लिए नियम हैं।
- राज्य सरकारें भी अपने स्तर पर सुरक्षा प्रदान करती हैं, लेकिन यह अक्सर राजनीतिक प्रभाव से प्रभावित होती है।
इतिहास : दूसरे विश्व युद्ध के बाद प्रचलन में आई ये टर्म
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- VIP: यह शब्द 1930 के दशक में सामने आया और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लोकप्रिय हुआ। इसका पहला दर्ज उपयोग 1933 में कॉम्पटन मैकेंज़ी की पुस्तक “Water on the Brain” में मिलता है, जहां इसे “Very Important Personage” कहा गया। कुछ स्रोत इसे रॉयल एयर फोर्स (RAF) से जोड़ते हैं, जो इसे उच्च अधिकारियों के लिए इस्तेमाल करते थे।
- VVIP: यह शब्द बाद में संभवतः 1940-50 के दशक में उच्चतर महत्व वाले व्यक्तियों को अलग करने के लिए शुरू हुआ। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए है, जिनके पास अत्यधिक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव या खर्च करने की क्षमता है।
- भारत में वीआईपी/वीवीआईपी संस्कृति ब्रिटिश राज से शुरू हुई, जहां औपनिवेशिक शासकों ने विशेष सुविधाएं बनाए रखीं। स्वतंत्रता के बाद, यह “लाल बत्ती संस्कृति” के रूप में विकसित हुई, जिसमें राजनेता, नौकरशाह, और प्रभावशाली लोग शामिल हुए।
विवादों में घिरा रहा है वीआईपी कल्चर
- लाल बत्ती विवाद: 2017 में केंद्र सरकार ने लाल बत्ती के उपयोग पर रोक लगाई, लेकिन वीआईपी संस्कृति बनी रही। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में लाल बत्ती के दुरुपयोग और सायरन के उपयोग पर आपत्ति जताई थी।
- राजनीतिक दबाव: वीआईपी/वीवीआईपी सुरक्षा अक्सर राजनीतिक प्रभाव से तय होती है, जिसके कारण गैर-जरूरी व्यक्तियों को भी सुरक्षा दी जाती है। पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने NSG को केवल गंभीर मामलों में उपयोग करने की नीति शुरू की थी। 2017 में बाबा रामदेव को 30 पुलिसकर्मियों की सुरक्षा इसका उदाहरण है।
- संसाधनों का दुरुपयोग: गृह मंत्रालय ने 2022 में कहा कि 2019 में 19,467 व्यक्तियों को सुरक्षा दी गई थी, जिसमें मंत्री, सांसद, विधायक, जज व नौकरशाह शामिल थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, उस वर्ष लखनऊ के एक ग्रामीण थाने में 35 में से केवल 1 से 5 पुलिसकर्मी ही सामान्य जनता के लिए उपलब्ध थे क्योंकि बाकी को वीआईपी सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था।
सुधार की ओर :
1- वीआईपी सुरक्षा से NSG को हटाया गया
2024 में NSG को वीआईपी/वीवीआईपी सुरक्षा से हटाने की योजना लागू हुई। इसके बाद नौ प्रमुख व्यक्तियों (जैसे- योगी आदित्यनाथ, मायावती, राजनाथ सिंह) की सुरक्षा CRPF को सौंप दी गई। यह NSG को आतंकवाद-रोधी कार्यों के लिए मुक्त करने का कदम है।
2- मंदिरों में वीआईपी दर्शन के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट (SC) ने 31 जनवरी 2025 को मंदिरों में वीआईपी दर्शन शुल्क के मामले को मनमाना और असमानता को बढ़ावा देने वाला बताया। हालांकि इस पर बैन लगाने की अपील वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया और कहा कि यह नीतिगत मामला है और राज्य सरकारें इस पर कार्रवाई कर सकती हैं।
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बिहार : गाेपालगंज में बेटे ने 100 रुपये के लिए मां का गला रेता
- नशे में आया था आरोपी, रुपये न देने पर कर दी हत्या
- वारदात के बाद गुस्साए लोगों ने जमकर पीटा, गिरफ्तार
- नशे का आदी है आरोपी और दो पत्नियां उसे छोड़ चुकीं
गोपालगंज | आलोक कुमार
बिहार में शराबबंदी लागू करते हुए सरकार का मानना था कि इससे महिला हिंसा में कमी आएगी पर राज्य में हर रोज होने वाली घटनाएं बताती हैं कि न तो शराब बंदी ठीक से लागू है और न ही शराबबंदी अकेले घरेलू हिंसा रोकने में मददगार है।
दरअसल गोपालगंज जिले में नशे में घर पहुंचे एक जवान बेटे ने केवल 100 रुपये के लिए अपनी मां की गला रेतकर हत्या कर दी है। अपनी मां को मार डालने वाला आरोपी पकड़ लिया गया है, वह पहले भी हिंसा करता रहा है। गांव वालो का कहना है कि उसके इस व्यवहार के चलते ही उसकी दो शादियां हुईं पर एक भी रिश्ता नहीं चल पाया। अब बीते 22 फरवरी को भी इस व्यक्ति ने अपनी मां को मार डाला।
गांव वालो ने पीटकर पुलिस को सौंपा

आरोपी रामभरोसे रावत को जमकर हुई पिटाई के बाद अस्पताल में भर्ती किया गया। (गाेपालगंज संवाददाता )
यह वारदात गाेपालगंज जिले की है, वहां के बैकुंठपुर थाना क्षेत्र उसरी बिनटोली में रविवार शाम (22 Feb) को यह घटना हुई। हमले के बाद गुस्साए लोगों ने आरोपी को जमकर पीटा और पुलिस के हवाले किया। पुलिस ने आरोपी रामभरोसे रावत को हिरासत में लेकर जांच शुरू कर दी है। मृतका की पहचान सुमित्रा देवी (55) के रूप में हुई है।
वारदात के समय अकेली थी मां
मृतका के पति गणेश रावत ने बताया, उनका बेटा शराब पीकर घर आया था, उस समय घर पर उनकी पत्नी अकेली थी। जबकि वे घर के बाहर काम कर रहे थे। पिता का कहना है कि बेटा बार-बार सौ रूपये मांग रहा था जो उनकी पत्नी के पास नहीं थे। इस पर गुस्साए बेटे ने वहीं पर रखे धारदार हथियार से मां का गला रेत दिया। मौके पर पत्नी चीखीं तो आसपास के लोग जुटे। उनके बेटे ने मां को मारकर भागने की कोशिश की तब सबने पकड़कर उसको खूब पीटा और पुलिस को बुलाकर उन्हें सौंप दिया।
आरोपी से पूछताछ जारी, धारधार हथियार बरामद

घटना की जानकारी देते सदर एसडीपीओ 2 राजेश कुमार। (गाेपालगंज संवाददाता )
इस मामले में सदर एसडीपीओ-2 राजेश कुमार ने बताया कि आरोपी रामभरोसे रावत को गिरफ्तार करके महिला के शव को पोस्टमार्टम के लिए मॉडल अस्पताल भेज दिया है। आरोपी घायल है इसलिए उसे भी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, उससे पूछताछ की जा रही है, आगे जेल भेजा जाएगा।
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बिहार की सड़कों पर सुरक्षित पैदल चल सकेंगे: सरकार ने दिए बड़े निर्देश, जानिए क्या बदलेगा?
- सड़क सुरक्षा को लेकर बिहार सरकार का बड़ा कदम पर योजना स्पष्ट नहीं।
पटना | हमारे संवाददाता
बिहार सरकार ने पैदल यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए बड़ा ऐलान किया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शनिवार सुबह अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट कर कहा कि राज्य की सड़कों पर बढ़ते वाहनों के बीच पैदल चलने वालों को सम्मान और सुविधा मिलेगी। अपनी घोषणा में मुख्यमंत्री ने कहा है कि राज्य की सड़कों पर फुटपाथ, जेब्रा क्रॉसिंग व ऐसी सुविधायें बढ़ाई जाएंगी जिससे पैदल चलने वालोे की सुरक्षा सुनिश्चित हो। गौरतलब है कि बिहार में सड़कों पर पैदल चलने के लिए या तो फुटपाथ है ही नहीं, या फिर वे जगह-जगह टूटे या अतिक्रमण से घिरे हैं, जिससे राहगीरों को सड़क पर चलने को विवश होना पड़ता है और वे दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं। ऐसे में यह घोषणा काफी अहम मानी जा रही है।
सभी बड़ी सड़कों पर ये बदलाव होंगे
सरकार के ‘सात निश्चय-3’ (2025-2030) के सातवें निश्चय ‘सबका सम्मान-जीवन आसान’ के तहत परिवहन विभाग को 5 बड़े निर्देश दिए गए हैं।
- भीड़-भाड़ वाले शहरी और ग्रामीण इलाकों में जल्द फुटपाथ बनाए जाएंगे।
- चिह्नित जगहों पर जेब्रा क्रॉसिंग मार्क की जाएगी।
- व्यस्त स्थानों पर फुट ओवर ब्रिज (एस्केलेटर सहित) और अंडरपास का निर्माण होगा।
- वाहन चालकों को पैदल यात्रियों के अधिकारों पर प्रशिक्षण दिया जाएगा।
- ग्रामीण-शहरी ब्लैक स्पॉट्स (दुर्घटना-प्रवण जगहें) चिह्नित कर फुटपाथ बनाए जाएंगे और CCTV कैमरे लगाए जाएंगे, ताकि दुर्घटनाओं का आकलन हो और कमी लाई जा सके।
बिहार में पैदल यात्रियों की मौतें आम
बिहार में पैदल यात्री की स्थिति सबसे दयनीय और असुरक्षित है। सड़क परिवहन व राज्यमार्ग मंत्रालय (MoRTH) की 2022 रिपोर्ट के अनुसार, बिाहर में हर सौ सड़क दुर्घटनाओं में मौत का प्रतिशत सबसे ज्यादा 82.4 फीसदी है। यानी रोड एक्सीडेंट के दस पीड़ित में से सिर्फ दो लोगों की जान ही बच पाती है।
पैदल यात्रियों की मौतों की बात करें तो राष्ट्रीय स्तर पर 19.5% हैं, लेकिन बिहार जैसे राज्यों में यह अनुपात ज्यादा है। 2019-2023 में भारत में 1.5 लाख पैदल यात्रियों की मौत हुई, जिसमें बिहार का बड़ा हिस्सा है।
बिहार की सड़कों पर फुटपाथ का हाल
कई सड़कों पर फुटपाथ या तो नहीं हैं या घुसपैठ से अवरुद्ध हैं। ब्लैक स्पॉट्स पर CCTV या सुरक्षित क्रॉसिंग की कमी से दुर्घटनाएं बढ़ती हैं। पटना में कुछ जगहों पर फुटपाथ (जैसे बेली रोड, JP गंगा पथ) और अंडरपास (पटना जंक्शन से मल्टी-मॉडल हब) हैं, लेकिन अन्य शहरों में सुविधाएं सीमित या निर्माणाधीन हैं।
नए कदमों से क्या लाभ हो सकता है?
- सुरक्षित क्रॉसिंग और फुटपाथ से पैदल यात्रियों की दुर्घटनाएं 20-30% तक कम हो सकती हैं (राष्ट्रीय स्तर पर समान उपायों से देखा गया)।
- ब्लैक स्पॉट्स पर CCTV से मॉनिटरिंग और तेज कार्रवाई संभव होगी।
- वाहन चालकों का प्रशिक्षण संवेदनशीलता बढ़ाएगा, जिससे ओवर-स्पीडिंग और लेन अनुशासन में सुधार आएगा।
- कुल मिलाकर, दैनिक जीवन आसान होगा, बुजुर्गों/बच्चों की सुरक्षा बढ़ेगी और राज्य की सड़क सुरक्षा रैंकिंग सुधरेगी।
निर्देश तो सराहनीय पर बजट का पता नहीं
सरकार ने परिवहन विभाग को इसको लेकर तेजी से काम करने के निर्देश हैं, लेकिन स्पष्ट राशि का उल्लेख नहीं है। हालांकि राज्य बजट में सड़क विकास और सुरक्षा के लिए आवंटन बढ़ रहा है। पिछले वर्षों में राष्ट्रीय राज्यमार्ग व शहरी सड़कों पर हजारों करोड़ रुपये का खर्च हुआ है। माना जा रहा है कि यह प्रोजेक्ट उसी से फंडेड होंगे। इसको लेकर विभाग जल्द ही कार्य योजना बनाएगा।
बता दें कि ये काम ‘सात निश्चय-3’ योजना के तहत होंगे, जिसे हाल ही में कैबिनेट ने मंजूरी दी है। योजना का फोकस ‘Ease of Living’ पर है, जिसमें सड़क सुरक्षा शामिल है।
जनहित में जारी
बिहार : भाजपा विधायक ने अपनी सरकार के शिक्षा विभाग पर लगाया भ्रष्टाचार का आरोप, बोले- ₹2425 करोड़ का घोटाला हुआ
- हिसुआ विधायक अनिल सिंह के आरोपों से सदन में हंगामा मचा।
- विधायक बोले- रखरखाव के नाम पर करोड़ो रुपये का घोटाला।
नवादा/पटना | अमन कुमार सिन्हा
बिहार के भाजपा विधायक ने विधानसभा में NDA सरकार के शिक्षा विभाग के ऊपर बड़े भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। नवादा जिले की हिसुआ विधानसभा से विधायक अनिल सिंह ने शिक्षा विभाग में 2425 करोड़ रुपये की अनियमितता का बड़ा आरोप लगाकर जांच की मांग की। गौरतलब है कि NDA सरकार में भाजपा प्रमुख सहयोगी है, ऐसे में भाजपा विधायक का सवाल उठाना मायने रखता है।
भाजपा विधायक के साथ अन्य सांसदों ने भी शिक्षा मंत्री के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। फिर आखिर में शिक्षा मंत्री सुनील कुमार को कहना पड़ा कि वे इस मामले की जांच करवाएंगे।
भाजपा विधायक अनिल सिंह ने सदन में कहा कि शिक्षा विभाग द्वारा रखरखाव और अन्य मदों पर खर्च किए गए 2425 करोड़ रुपये में गड़बड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि यह राशि निविदा के माध्यम से खर्च की गई है। उन्होंने शिक्षा मंत्री को चुनौती देते हुए इस मामले की पूरी तरह जांच कराने की मांग की।
विधायक ने आरोप लगाया कि शिक्षा विभाग के डीओ, डीपीओ स्थापना और संबंधित इंजीनियरों द्वारा राशि का दुरुपयोग किया गया है। अनिल सिंह ने विधानसभा में इस मामले की विस्तृत जांच के लिए एक कमेटी गठित करने की मांग की।
उन्होंने कहा कि भवन निर्माण के लिए शिक्षा विभाग को मिले 2425 करोड़ रुपये में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हुआ है। इस मुद्दे पर सदन में खूब बहस हुई, जिसके बाद सभी विधायकों ने एक स्वर में शिक्षा विभाग के खिलाफ आवाज उठाई।
आखिर में शिक्षा मंत्री सुनील कुमार ने बताया कि जिलाधिकारी (DM) को जांच के आदेश दिए गए हैं और जांच से संबंधित सभी जानकारी विधायकों को भी उपलब्ध कराई जाएगी।
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