रिसर्च इंजन
दुनिया के कई देशों में मानहानि अपराध नहीं, क्या भारत में भी बदलाव होगा?
- सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद देश में मानहानि को अपराध मानने पर बहस शुरू
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मानहानि (defamation) को अपराध की श्रेणी से हटाने की जरूरत पर सख्त टिप्पणी की है, जिससे इस कानून पर बहस तेज हो गई है। भारत में वर्तमान में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 356 के तहत मानहानि को अपराध माना जाता है, जिसके लिए अधिकतम दो साल की सजा या जुर्माना हो सकता है। लेकिन क्या भारत को उन देशों की तरह इसे सिविल मामला बनाना चाहिए जहां मानहानि अपराध नहीं है? आइए, इसकी पड़ताल करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट (साभार इंटरनेट)
”मुझे लगता है कि अब इसे अपराध की श्रेणी से हटाने का समय आ गया है, इस मामले को कितने दिनों तक खींचा जा सकता है? – जस्टिस एमएम सुंदरेश, सुप्रीम कोर्ट में मौखिक टिप्पणी
नौ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने इसे वैध ठहराया था
“अपराधिक मानहानि कानून संवैधानिक है। व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हिस्सा है।” – सुप्रीम कोर्ट, 2016 का फैसला
- यूनाइटेड किंगडम: 2009 में मानहानि को अपराध से हटाकर सिविल मामला बनाया गया। अब यह हर्जाना (damages) के जरिए निपटाया जाता है।
- कनाडा: 2019 में आपराधिक मानहानि को समाप्त कर दिया गया, हालांकि सिविल मानहानि बनी रही।
- अमेरिका: संविधान के प्रथम संशोधन के तहत मानहानि को अपराध नहीं माना जाता; यह सिविल केस के रूप में हल होता है, और साबित करना मुश्किल है।
- ऑस्ट्रेलिया: 1990 के दशक से मानहानि को आपराधिक श्रेणी से हटाया गया, अब यह सिविल नुकसान के आधार पर।
- न्यूजीलैंड: 1993 में आपराधिक मानहानि समाप्त, सिविल मुआवजा प्रणाली लागू।
एशिया के अन्य प्रमुख देश जैसे जापान, दक्षिण कोरिया, और ताइवान में भी मानहानि मुख्य रूप से सिविल मामला है, हालांकि कुछ मामलों में आपराधिक प्रावधान बने हुए हैं।
- श्रीलंका: 2002 में आपराधिक मानहानि को समाप्त कर सिविल बनाया गया। अब केवल सिविल कोर्ट में हर्जाना का प्रावधान।
- मालदीव: 2018 में आपराधिक मानहानि को हटा दिया, सिविल मुआवजा प्रणाली लागू।
- मंगोलिया: 2019 में आपराधिक मानहानि को डिक्रिमिनलाइज किया, सिविल कानून के तहत निपटारा।
श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों ने अंतरराष्ट्रीय दबाव (जैसे UN और OAS) के बाद बदलाव किया, जहां आपराधिक मानहानि को “अनुपातहीन प्रतिबंध” माना जाता है।

भारत में दवाब डालने व आपसी रंजिश में इस कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा (सांकेतिक तस्वीर)
2019 के लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि वह सत्ता में आती है तो आपराधिक मानहानि (sections 499 और 500 IPC) को हटाएगी और मानहानि (defamation) को सिर्फ सिविल अपराध बनाएगी। मानहानि पर अब तक BJP की कोई स्पष्ट नीति सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है पर बीजेपी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने नया “Bharatiya Nyaya Sanhita” लागू करके इसमें कुछ सुधार किए।
“मानहानि का आपराधिक कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाता है और राजनीतिक बदले का हथियार बन गया है। इसे डी-क्रिमिनलाइज करके सिविल मामला बनाना चाहिए, ताकि लोकतंत्र मजबूत हो।” – राहुल गांधी, LOP, (2023 में सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका में यह टिप्पणी शामिल की)
भारत में मानहानि के बड़े विवादित मामले ज़्यादातर राजनीतिक नेताओं और पत्रकारों/मीडिया संस्थानों के बीच रहे हैं, जहाँ आलोचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम व्यक्ति/संस्था की प्रतिष्ठा का टकराव सामने आया।

लोकसभा में विपक्षी दलों के नेता राहुल गांधी
रिसर्च इंजन
कैसे समृद्ध बनेगा बिहार? हर 100 में से 72 रुपये के लिए हम केंद्र के भरोसे, CAG Report में खुलासा
- बिहार में साल 2022-23 के लेखे-जोखे से जुड़ी कैग रिपोर्ट विधानसभा में पेश हुई।
- नीतीश सरकार ने ₹70,877 करोड़ के खर्च का कोई हिसाब नहीं सौंपा।
1- 72.12% बजट के लिए केंद्र पर निर्भर
2. भारी-भरकम खर्च का हिसाब नहीं
3. राजस्व वसूली में सुस्ती से कमाई घटी
4. आधी सरकारी कंपनियां ‘सफेद हाथी’
5. बिहार पर GSDP के 39% हिस्से का कर्ज
कैग रिपोर्ट से पता लगा है कि साल 2022-23 में बिहार की कुल देनदारियां (कर्ज) ₹2.88 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान था। यह बिहार की कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का लगभग 38.66% था।
धीमी गति से सुधार : मात्र ₹5 रुपये की निर्भरता घटी
कैसे बदलेगी तस्वीर?
- बुनियादी ढांचे पर जोर : सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने से उद्योग को बढ़ावा मिलेगा।
- उद्योगों को बढ़ावा: जब तक राज्य में निजी निवेश नहीं आएगा, राज्य का अपना टैक्स (SGST) नहीं बढ़ेगा।
- टैक्स चोरी पर लगाम: परिवहन और खनन जैसे क्षेत्रों में लीकेज रोककर राजस्व बढ़ाया जा सकता है।
- सरकारी कंपनियों का कायाकल्प: घाटे में चल रही कंपनियों को बंद करना या उनमें सुधार करना अनिवार्य।
- नॉन-टैक्स राजस्व बढ़ाना: बालू खनन और पर्यटन की आय को व्यवस्थित व पारदर्शी बनाना होगा।
- वित्तीय पारदर्शिता : सरकारी विभाग अपने हर खर्च के हिसाब को पारदर्शी बनाएं, वरना केंद्र से मदद में देरी होगी।
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दुनिया गोल
Critical Minerals Deal: भारत-ब्राजील के बीच हुआ समझौता, कितनी घटाएगा चीन पर निर्भरता?
- ब्राजील के राष्ट्रपति ने भारत दौरे पर महत्वपूर्ण समझौता किया।
- महत्वपूर्ण खनिज और दुर्लभ मृदा को लेकर हुआ एमओयू।
- अभी इस क्षेत्र में भारत 95% खनिजों का आयात करता है।
नई दिल्ली |
रिसर्च इंजन
AI Impact Summit-2026 : 88 देश जिस घोषणा पत्र पर सहमत हुए, उसे जानिए
- एआई तकनीक को लेकर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन 16 से 21 फरवरी के बीच हुआ।
नई दिल्ली|
भारत में आयोजित हुए पहले एआई इम्पैक्ट समिट- 2026 (India AI Impact Summit 2026) का समापन शनिवार (21 feb) को हो गया। दिल्ली के भारत मंडपम में चली इस सम्मेलन में 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने घोषणा पत्र (डिक्लेरेशन) पर हस्ताक्षर किए हैं।
इस बात की जानकारी केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक्स पर दी।
मानव केंद्रित AI का दिया संदेश
इस घोषणा पत्र की प्रस्तावना (Preamble) में स्पष्ट किया गया है कि एआई के वादे को तभी साकार किया जा सकता है जब उसके लाभ मानवतावादी हों। इसी घोषणापत्र को लेकर IT मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक्स पर लिखा – “पूरी दुनिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ह्यूमन सेंट्रिक एआई सोच को समर्थन दिया है। यह डिक्लेरेशन ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के सिद्धांत से प्रेरित है, ताकि एआई संसाधन पूरी दुनिया के लोगों के लिए उपलब्ध हो सकें।”
इन घोषणाओं पर बनी सहमति
- एआई संसाधनों का लोकतंत्रीकरण किया जाए, जिसमें मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सस्ती कनेक्टिविटी हो।
- “वसुधैव कुटुम्बकम” से प्रेरित होकर सभी देशों तक एआई संसाधनों की पहुंच बढ़ानी चाहिए।
- डेमोक्रेटिक डिफ्यूजन ऑफ एआई चार्टर को एक स्वैच्छिक फ्रेमवर्क के रूप में नोट किया गया, जो फाउंडेशनल एआई संसाधनों तक पहुंच बढ़ाएगा।
- आर्थिक विकास और सामाजिक भलाई के लिए एआई की व्यापक स्वीकृति हो।
- सुरक्षित और मजबूत एआई विश्वास बनाने और सामाजिक–आर्थिक लाभों को अधिकतम करने के लिए बुनियादी है।
- एआई सिस्टम में सुरक्षा महत्वपूर्ण है, उद्योग–प्रेरित स्वैच्छिक उपायों, तकनीकी समाधानों और नीतिगत फ्रेमवर्क को अपनाने पर जोर।
गौरतलब है कि यह घोषणापत्र बाध्यकारी नहीं है, यह देशों व संगठनों के लिए स्वैच्छिक है।
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