चुनावी डायरी
आज बिहार का फैसला: इन हाई-प्रोफ़ाइल सीटों पर टिकी पूरे राज्य की सियासत
पटना |
बिहार के लिए आज का दिन ऐतिहासिक है… कुछ घंटों में यह साफ़ हो जाएगा कि 2025 में सत्ता किसके हाथ में जाएगी। लेकिन नतीजों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है— कौन-सी सीटें तय करेंगी बिहार की राजनीति का भविष्य?
आज जिन 17 हॉट सीटों पर पूरे राज्य की नज़र है, वे सिर्फ़ सीटें नहीं—
1. नेताओं की साख
2. परिवारों की विरासत
3. संगठन की ताकत
4. और जातीय-सामाजिक समीकरणों की असली परीक्षा हैं।
महुआ से लेकर मोकामा, तारापुर से राघोपुर, कुम्हरार से छपरा तक, इन सीटों पर जीत या हार सिर्फ़ एक नतीजा नहीं बल्कि आने वाले पाँच वर्षों की राजनीति का संकेत होगी।
और अब—चूँकि नतीजे आज आने वाले हैं, हर पार्टी, हर उम्मीदवार और हर समर्थक की नज़र इन्हीं हॉट सीटों पर टिकी है। कौन जीतेगा? किसकी साख बचेगी? और कहाँ पलट जाएगा पूरा गेम? ये सब कुछ इन सीटों पर निर्भर करता है।
:: बिहार की 17 हॉट सीटें — हर सीट की अहमियत थोड़ा विस्तार में
1. महुआ (वैशाली) — लालू परिवार की साख दांव पर
यह सीट सिर्फ़ चुनावी मैदान नहीं, बल्कि लालू यादव परिवार के प्रभाव की असली परीक्षा है। जितना राजनीतिक शोर महुआ से उठता है, उतना ही इसका असर पूरे राज्य पर दिखता है – यहाँ की हार-जीत को महागठबंधन बनाम NDA की लड़ाई का प्रतीक माना जाता है।
2. चनपटिया (पश्चिम चंपारण) — सीमाई इलाका, संवेदनशील मुद्दों की सीट
नेपाल सीमा से सटे होने के कारण यहाँ सुरक्षा, प्रवासन और सीमाई राजनीति प्रमुख मुद्दे हैं। यही वजह है कि चनपटिया का मूड अक्सर पूरे ज़िले के नतीजों की दिशा तय करता है।
3. लखीसराय — डिप्टी सीएम विजय सिन्हा की चौथी अग्निपरीक्षा
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और बीजेपी के बड़े चेहरे विजय सिन्हा के लिए यह सीट प्रतिष्ठा से भी ऊपर है। यहाँ की जीत उन्हें राज्य की राजनीति में और मज़बूत बनाती है—और हार सवाल खड़े कर देती है।
4. सीवान — बाहुबल बनाम बदलाव की जंग
सीवान हमेशा से हाई-प्रोफ़ाइल चुनावों का केंद्र रहा है। यहाँ की लड़ाई जातीय समीकरण + बाहुबल + संगठन की ताकत का अनोखा मिश्रण है। राज्य की राजनीति का नैरेटिव बदलने की क्षमता रखती है यह सीट।
5. जमुई — युवाओं और जातीय संतुलन का बैरोमीटर
युवा मतदाता, कोर वोट बैंक और जातीय गणित—तीनों का सबसे दिलचस्प मुकाबला यहाँ होता है। यह सीट तय करती है कि युवा नेताओं का प्रभाव कितना आगे बढ़ रहा है।
6. धमदाहा (पूर्णिया) — सीमांचल की सियासत का तापमान यहीं मापा जाता है
पूर्णिया और कटिहार क्षेत्र की राजनीति अक्सर धमदाहा के नतीजों का अनुसरण करती है। यह सीट बताती है कि पूर्वी बिहार किसके साथ खड़ा है।
7. तारापुर (मुंगेर) — उपमुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा दांव पर
यह सीट सीधे-सीधे नीतीश कुमार और उनकी टीम की पकड़ दर्शाती है। तारापुर में जीत का मतलब सरकार की स्थिति मज़बूत, और हार का मतलब सत्ता की पकड़ ढीली।
8. दरभंगा — मिथिला का राजनीतिक केंद्र
यह सीट सांस्कृतिक पहचान, ब्राह्मण राजनीति और शहरी मतदाताओं के मिश्रण के कारण बेहद महत्वपूर्ण है। दरभंगा का मूड मिथिला की बाकी सीटों पर गहरा असर डालता है।
9. मोकामा — बाहुबली बनाम संगठन की हाई-वोल्टेज जंग
बिहार की सबसे चर्चित सीटों में से एक। यहाँ जीत अक्सर सियासी ताकत, पकड़ और क्षेत्रीय प्रभाव को मापने का पैमाना बन जाती है।
10. कुम्हरार (पटना) — BJP का किला या टूटेगा किला?
लगातार बीजेपी का गढ़ रही यह सीट इस बार नए माहौल में चुनौती का सामना कर रही है। यहाँ का परिणाम पटना शहर की राजनीतिक दिशा बताएगा।
11. दानापुर — राजधानी का सबसे ‘पॉलिटिकली चार्ज्ड’ इलाका
दानापुर में मुकाबला हमेशा हाई-प्रोफ़ाइल रहता है। जिसके पास दानापुर, उसके पास राजधानी की राजनीति में आवाज़ मज़बूत मानी जाती है।
12. छपरा — ग्लैमर बनाम संगठन की फ़ाइट
फिल्मी या हाई-प्रोफ़ाइल चेहरों के उतरने से यह सीट अक्सर सुर्खियों में रहती है।यहाँ का चुनाव बता देता है कि जनता का झुकाव भावनाओं की ओर है या संगठन की ओर।
13. लालगंज (वैशाली) — युवा जोश बनाम अनुभवी चेहरों की टक्कर
यहाँ हर चुनाव पीढ़ियों की लड़ाई जैसा होता है। मतदाता कभी युवा चेहरे को मौका देता है, तो कभी अनुभवी को तरजीह।
14, रघुनाथपुर (सिवान) — बाहुबल + सामाजिक समीकरण का घमासान
यह सीट ऐतिहासिक रूप से हमेशा कड़ा मुकाबला देती है। यहाँ की हार-जीत जिला राजनीति की दिशा बदल देती है।
15. नबीनगर (औरंगाबाद) — राजनीति की विरासत बनाम नई क्रांति
नबीनगर में पारंपरिक राजनीतिक परिवारों का प्रभाव हमेशा रहा है। इस बार युवा चेहरों की चुनौती इसे और दिलचस्प बनाती है।
16. अलीनगर (दरभंगा) — संस्कृति, जाति और नेतृत्व का त्रिकोणीय प्रभाव
यह सीट मिथिला की सांस्कृतिक-सामाजिक राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र है। अलीनगर के नतीजे दरभंगा और आसपास की कई सीटों का संकेत बनते हैं।
17. राघोपुर — लालू परिवार का अभेद्य किला
यह सीट सिर्फ़ चुनावी नहीं—भावनात्मक है। लालू प्रसाद यादव का गढ़, जिसकी हर लड़ाई राज्य भर की सुर्खियों में रहती है। यहाँ की जीत-हार का मतलब पूरे परिवार की साख से जुड़ा होता है।
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बिहार : दही-चूड़ा के बहाने फिर बेटे तेज प्रताप से फिर जुड़ रही लालू परिवार के रिश्तों की डोर
नई दिल्ली|
लालू यादव और उनके परिवार की बड़े बेटे तेज प्रताप के साथ टूट गए रिश्तों की डोर दोबारा जुड़ती नजर आई है। मकर संक्रांति के मौके पर तेज प्रताप ने चूड़ा भोज का आयोजन करके परिवार को निमंत्रण भेजा, जिसमें लालू यादव ने शामिल होकर पारिवारिक जुड़ाव का संकेत दिया है।
हालांकि तेजस्वी यादव न्यौते के बाद भी कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। इस बारे में पूछे जाने पर तेज प्रताप ने कोई नाराजगी नहीं दिेखाई, बल्कि यह कहकर बात टाल दी कि ‘तेजस्वी छोटे भाई हैं, देरी से सोकर उठते हैं।’ इस पूरे घटनाक्रम से साफ संकेत मिला है कि बिहार विधानसभा चुनाव में राजद की करारी हार के बाद आखिर यह बर्फ पिघल रही है।
गौरतलब है कि लालू यादव ने बड़े बेटे की गैर जिम्मेदाराना गतिविधियों का हवाला देते हुए उन्हें पार्टी और परिवार से अलग कर दिया था।
तेज प्रताप बोले- पिता का आशीर्वाद मिला
दही-चूड़ा कार्यक्रम के दौरान आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद और बड़े बेटे तेज प्रताप यादव एक ही सोफे पर बैठे नजर आए। लालू प्रसाद के भोज में आने के बाद तेज प्रताप यादव ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “मुझे पिता का आशीर्वाद मिला है।” साथ ही बोले कि “बिहार के गवर्नर भी आएं थे, उन्होंने भी आशीर्वाद दिया है. बड़े-बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते हुए कुछ नया काम करना है।”
एक दिन पहले घर जाकर न्यौता दिया था
13 जनवरी को तेज प्रताप ने अपने एक्स हैंडिल से भाई तेजस्वी यादव और मां राबड़ी देवी को दही-चूड़ा के आयोजन का निमंत्रण देते हुए तस्वीरें साझा की थीं, जिसने लोगों को चौंका दिया। तेजप्रताप अपने भाई तेजस्वी के घर पहुंचे थे, वहां अपनी भतीजी के साथ भी उन्होंने एक फोटो खिंचवाया।
डिप्टी सीएम विजय सिन्हा भी शामिल हुए
तेज प्रताप के इस कार्यक्रम में बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद शामिल हुए। साथ ही, विपक्षी दल भाजपा के प्रमुख नेता व डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने भी शिरकत की। गौरतलब है कि एक दिन पहले डिप्टी सीएम सिन्हा के आवास पर दही-चूड़ा का आयोजन था, जिसमें तेजप्रताप शामिल हुए थे।
लालू के साले बोले- परिवार एक है, कोई दूरी नहीं
लालू यादव के अलावा तेज प्रताप यादव के दही-चूड़ा भोज में उनके बड़े मामा प्रभुनाथ यादव भी पहुंचे। उन्होंने कहा, “राज्यपाल और लालू जी ने आशीर्वाद दिए हैं, आज से दिन शुभ होने वाला है, परिवार एक है, कोई दूरी नहीं है।” वह बोले कि हमने अपने भगिना को आशीर्वाद दिया है। साथ ही उन्होंने यह भी बड़ी बात कही कि तेज प्रताप यादव बहुत आगे जाने वाले हैं। दोनों भाई एक साथ हैं। सारे मामा का आशीर्वाद है।
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बिहार : बेटे की हार से बौखलाए RJD सांसद ने गाली दी; जनता ने विकास पर सवाल किया तो बोले- यहां यादवों के वोट नहीं मिले
- जहानाबाद के सांसद सुरेंद्र यादव ने अभद्र भाषा में जनता को डपटा, वीडियो वायरल।
- गया जी जिले की जनता ने सांसद से पूछा था विकास कार्य कराने से जुड़ा सवाल।
- सांसद के बेटे ने विधायकी लड़ी पर हार हुई, सांसद बोले- यादवों के कम वोट मिले।
जहानाबाद | शिवा केसरी
NDA सरकार के नेताओं और मंत्रियों की कार्यशैली को आड़ेहाथों लेने वाले राजद प्रमुख तेजस्वी यादव की पार्टी के सांसद ने सरेआम जनता को गाली दी। जहानाबाद लोकसभा सीट से जीते सांसद सुरेंद्र यादव 12 जनवरी को गयाजी जिले में पहुंचे तो विकास कार्यों से जुड़े एक सवाल के जवाब में उन्होंने अपशब्द बोले। साथ ही कहा कि इस इलाके के यादवों के उन्हें सिर्फ 15 हजार वोट ही मिले। गौरतलब है कि मंत्री जी खुद भी यादव समाज से आते हैं।
जहां से 8 बार विधायक बने, उस सीट से बेटा हार गया
दरअसल, हाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में सांसद सुरेंद्र यादव के बेटे को बेलागंज विधानसभा की जनता ने हरा दिया जो गयाजी जिले में आता है। जबकि बेलागंज विधानसभा सीट से खुद सुरेंद्र यादव आठ बार विधायक रह चुके हैं। 2024 में जहानाबाद सीट से सांसदी जीत जाने के बाद उनकी इस सीट से राजद ने उनके बेटे विश्वनाथ यादव को टिकट दिया था, पर वे जदयू के प्रत्याशी से हार गए। माना जा रहा है कि सांसद जी का इस इलाके की जनता पर निकला ‘गुस्सा’ दरअसल बेटे की चुनावी हार से जुड़ी बौखलाहट है, जिसका वीडियो वायरल हो गया है।
सांसद ने मर्यादा तोड़ी, बोले- कम वोट में काम क्या कराएंगे?
जहानाबाद के सांसद डॉ. सुरेंद्र प्रसाद यादव, पूर्व मंत्री रहे हैं और राजद के कद्दावर नेता माने जाते हैं। गयाजी जिले के खिजरसराय प्रखंड में वे जनता से ही भिड़ गए और गाली दी। दरअसल यहां के सरैया में एक क्रिकेट टूर्नामेंट में वे बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे थे, आयोजन से लौटते हुए स्थानीय लोगों ने उनसे क्षेत्र में विकास से जुड़ा काम कराने पर सवाल पूछ दिया। जिसपर जवाब देने के दौरान सांसद सुरेंद्र यादव ने भाषा की सारी मर्यादाएं तोड़ दीं। वो गाली देते हुए यह कहते नज़र आए कि “यहां से यादव का 15 हजार वोट आरजेडी को मिला है। ऐसे में हम काम क्या करेंगे।” वायरल वीडियो में वे अपशब्द बोलते हुए कुछ लोगों पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने वोट किसी और को दिलवाया है।
अपने सांसद के व्यवहार पर RJD चुप, जदयू ने सवाल पूछा
अब तक इस मामले पर सांसद की ओर से न तो कोई सफाई पेश की गई है और न ही RJD की ओर से अपने सांसद के व्यवहार पर कोई बयान जारी हुआ है। सांसद के वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए जदयू MLC और प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि “क्या राजद ने इस तरह के बिगड़ैल सांसद को खुलेआम गाली देने की छूट दे दी है? अगर नहीं, तो लालू यादव अपने सांसद पर कार्रवाई करें।”
पहले भी व्यवहार को लेकर चर्चा में रहे सांसद
बीबीसी के मुताबिक, साल 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी में महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश किया जा रहा था, तब इस बिल का विरोध कर रहे राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और समाजवादी पार्टी के सांसद हंगामा कर रहे थे। इतने में बिहार के जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र के सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवाणी से बिल की कॉपी छीनकर फाड़ दी। सुरेंद्र प्रसाद यादव इस कारण लंबे समय तक सुर्ख़ियों में रहे।
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जिला परिषद चुनाव : गोपालगंज में 24 साल राजद ने जीता अध्यक्ष पद, विधानसभा चुनाव में सभी सीटें जीतने वाली NDA अपना गढ़ नहीं बचा सकी
- गोपालगंज की सभी छह विधानसभा सीटों पर NDA के विधायक जीते हैं।
- इसके बाद भी जिला परिषद अध्यक्ष पद के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी की हार हुई।
गोपालगंज | आलोक कुमार
बिहार के गोपालगंज में जिला परिषद अध्यक्ष (Zila Parishad Chairman) पद पर 24 साल के बाद राजद का कब्जा हुआ है। यह सीट 2001 से लगातार NDA के घटक दलों के समर्थित नेता ही जीतते आ रहे थे।
एक महीने पहले यह सीट तब खाली हुई जब भाजपा नेता व जिला परिषद अध्यक्ष सुभाष सिंह ने विधायकी का चुनाव (Assembly Election) जीतकर इस पद से इस्तीफा दे दिया था। निर्वाचन आयोग के आदेश पर डीएम ने सोमवार को रिक्त पद पर चुनाव करवाया, जिसमें राजद नेता अमित राय (Amit Rai) की जीत हुई है। विधानसभा चुनाव में गोपालगंज की सभी छह विधानसभा सीटों पर NDA की जीत के बाद भी वह जिला परिषद अध्यक्ष पद नहीं बचा सकी, इस जीत से राजद को ऊर्जा मिलेगी।
भाजपा प्रत्याशी को 7 वोटों से हराया
राजद समर्थित प्रत्याशी अमित राय को कुल 19 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी दीपिका सिंह को 12 वोट मिले। इस तरह अमित राय ने उन्हें सात वोटों के अंतर से हरा दिया। बता दें कि भाजपा प्रत्याशी दीपिका सिेंह के पति विकास सिंह भाजपा के सक्रिय नेता हैं।
तीन बार जिप उपाध्यक्ष रह चुके हैं अमित राय
जिला समाहरणालय (Collectorate) में जिला परिषद अध्यक्ष पद पर हुए चुनाव को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता अमित राय ने जीत लिया। वे राजद की पूर्व विधायक किरण राय के बेटे हैं और लगातार तीन बार से जिला परिषद उपाध्यक्ष (Zila Parishad Vice Chairman) का पद जीत चुके हैं।
जीत के बाद कहा- पार्टी लाइन से उठकर वोटिंग हुई
नवनिर्वाचित जिला परिषद अध्यक्ष अमित राय ने कहा कि जिला परिषद सदस्यों ने जाति और पार्टी लाइन से ऊपर उठकर मतदान किया है, इसके लिए वे सभी सदस्यों के आभारी हैं।
उन्होंने कहा कि हार-जीत को विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि सभी जिला परिषद सदस्य एक टीम का हिस्सा हैं। यह जीत सभी सदस्यों की जीत है और वे सभी को बधाई देते हैं।
2001 से NDA का प्रत्याशी बनता रहा जिप अध्यक्ष
जिला परिषद अध्यक्ष पद पर 2001 से एनडीए का कब्जा रहा। 2001 में राजद के गढ़ में वर्तमान कुचायकोट विधायक अमरेंद्र कुमार पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय अध्यक्ष बने। 2005 में अमरेंद्र पांडेय कटेया से विधायक बने, तब 2006 में उनकी भाभी उर्मिला पांडेय अध्यक्ष चुनी गई। 2011 में चंदा देवी, 2016 में विधायक अमरेंद्र पांडेय के भतीजे मुकेश पांडेय अध्यक्ष बने।
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