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रिसर्च इंजन

बिहार चुनाव: क्या कांग्रेस अब भी फैक्टर, राहुल गांधी की मेहनत लाएगी रंग?

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पटना में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के दौरान संबोधन देते राहुल गांधी (क्रेडिट - @SupriyaShrinate)
पटना में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के दौरान संबोधन देते राहुल गांधी (क्रेडिट - @SupriyaShrinate)
  • तेजस्वी यादव को CM चेहरा न बनाकर कांग्रेस गठबंधन में चाहती है बराबरी।
  • राहुल के ‘वोट चोरी’ नैरेटिव ने हवा बनाई पर क्या चुनाव तक वोटर पर असर रहेगा?

पटना| हमारे संवाददाता 

6 और 11 नवंबर को होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनाव की सियासी गर्मी चरम पर है। RJD के नेतृत्व वाला महागठबंधन और नीतीश कुमार की NDA के बीच कांटे की टक्कर है। लेकिन इस बार कांग्रेस ने ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उठाकर नया रंग जोड़ा है। राहुल गांधी की ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ ने लाखों लोगों को जगाया, पर सवाल यह है कि क्या कांग्रेस बिहार में अब भी फैक्टर है या यह सिर्फ एक शोर बनकर सिमट जाएगी ? आइए जानते हैं इस विश्लेषण में..

‘वोट चोरी’ ने हवा बनाई, चुनाव तक मुद्दा रहेगा?

  • कांग्रेस का दावा: जुलाई 2025 में विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान चुनाव आयोग (ECI) ने 65 लाख वोटरों के नाम काटे। इनमें ज्यादातर गरीब, दलित और अल्पसंख्यक। राहुल गांधी ने इसे ‘वोट चोर- गद्दी छोड़’ का नारा दिया।
  • ECI का जवाब: ECI ने दावा खारिज किया, कहा—केवल 1.97 लाख संदिग्ध नाम हटाए। सुप्रीम कोर्ट ने SIR पर रोक नहीं लगाई, पर समयबद्धता पर सवाल उठाए।
  • आरोपों का असर: कांग्रेस का अभियान सोशल मीडिया पर छाया। #VoteChorGaddiChhod ट्रेंड किया। X पर यूजर्स ने ECI की पारदर्शिता पर सवाल उठाए। लेकिन BJP ने पलटवार किया—’कांग्रेस का बूथ लूट का इतिहास है।’
  • हस्तक्षेप की गुंजाइश कम : SIR बंद होने की उम्मीद कम है, क्योंकि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी और अनुच्छेद 329 के तहत सुप्रीम कोर्ट इसमें हस्तक्षेप से बचेगा। जिससे कांग्रेस का वोट-चोरी का नैरेटिव कमजोर पड़ सकता है।

बिहार कांग्रेस के चुनावी वादों का एक पोस्टर (साभार X @INCBihar)

बिहार कांग्रेस के चुनावी वादों का एक पोस्टर (साभार X @INCBihar)

कांग्रेस का आधार और रणनीति

  • सीट शेयरिंग: 2020 में 19 सीटें जीतने वाली कांग्रेस अब 56-60 सीटों पर दावेदारी कर रही है। RJD ने 56 सीटों का ऑफर दिया, पर बातचीत जारी। 30 उम्मीदवारों की सूची तैयार कर ली गई है।

 

  • मजबूत क्षेत्र: गोपालगंज (15.1% वोटर डिलीशन), पूर्णिया (12.1%वोटर डिलीशन), किशनगंज (11.8% वोटर डिलीशन), मधुबनी (10.4% वोटर डिलीशन) में कांग्रेस की पकड़। इन जिलों में प्रवासी मजदूरों और अल्पसंख्यकों का वोट बैंक है, जो वोट चोरी के आरोपों से गुस्से में हैं। दक्षिणी बिहार के भोजपुर जैसे जिलों में भी पार्टी की पैठ बढ़ रही, जहां आरा-बढ़हरा सीटों पर दावेदारी मजबूत।

 

  • कमजोर क्षेत्र: मगध और शाहाबाद डिवीजन मेें कांग्रेस का आधार कमजोर है, यहां NDA का दबदबा बना हुआ है।

 

  • CWC की रणनीति: बीते 24 सितंबर को पटना में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में ‘वोट चोरी’ को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का निर्णय हुआ। इसमें कहा गया कि वोट चोरी का मतलब, “राशन, पेंशन, रोजगार और न्याय की चोरी है।” यानी आगे के प्रचार का फोकस ये मुद्दे होंगे।

 


क्या कांग्रेस फैक्टर है?

  • कांग्रेस के कैंपेन से महागठबंधन में एका : राहुल की यात्रा ने युवाओं और अल्पसंख्यकों में जागरूकता फैलाई। X पर ‘वोटर लिस्ट स्कैम’ चर्चा में। इस मुद्दे से महागठबंधन के दलों के बीच एकता मजबूत हुई। ये एकता अगर महागठबंधन को 120 से ज्यादा सीटें जिता दे तो कांग्रेस को 20-25 सीटें मिलना संभव।
राहुल और तेजस्वी की जोड़ी ने बिहार में युवाओं को अपील किया।

राहुल और तेजस्वी की जोड़ी ने बिहार में युवाओं को अपील किया।

  • मुद्दा फीका पड़ा तो हाशिए पर जाने का डर :  वोट चोरी पर ECI की रिपोर्ट ने कांग्रेस के वोट चोरी के दावों को कमजोर किया। कांग्रेस ने वोट चोरी पर लिखित आपत्ति भी नहीं दर्ज करायी। ऐसे में अगर वोट चोरी का मुद्दा फीका पड़ गया तो पार्टी फिर हाशिए पर जा सकती है।

 

  • ‘घुसपैठ नैरेटिव’ और ₹10000 की योजना चुनौती: वोट चोरी नारे को काउंटर करने के लिए NDA ने अवैध धुसपैठ का नैरेटिव दिया। फिर  महिला स्वरोजगार के लिए NDA 10,000 रुपये की मदद योजना लायी। ये कदम कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकते हैं।
  • बड़े नेताओं का साथ छोड़ना चुनौती : बिहार कांग्रेस के बड़े नेता रहे डॉ. अशोक राम ने हाल में जदयू (JDU) का दामन थाम लिया, ये छह बार के विधायक व पूर्व प्रदेश कांग्रेस कार्यकारी थे।
    जदयू में गए डॉ.

    JDU में शामिल होने के बाद नीतीश कुमार के साथ पूर्व वरिष्ठ कांग्रेसी डॉ. अशोक राम। (फोटो – फेसबुक) 

     

    एक और वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री मुरारी प्रसाद गौतम ने भाजपा का रुख किया है। बिक्रम सीट से दो बार विधायक रहे सिद्धार्थ सौरव ने भी BJP ज्वाइन कर ली। हालांकि बिहार प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम, राहुल गांधी के करीबी कन्हैया कुमार, निर्दलीय और कांग्रेस समर्थित सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव बिहार में कांग्रेस की मजबूती हैं।

 

 


सासाराम में संबोधित करते तेजस्वी यादव (साभार - तेजस्वी एक्स हैंडल)

सासाराम में संबोधित करते तेजस्वी यादव (साभार – तेजस्वी एक्स हैंडल)

तेजस्वी को CM चेहरा न बनाना: सियासी चाल

  • RJD की मांग: तेजस्वी यादव को CM चेहरा बनाने की मांग लगातार राजद कर रही है पर कांग्रेस इसे टालती आई है।
  • कांग्रेस की रणनीति: ऐसा करके कांग्रेस इस गठबंधन में बराबरी चाहती है। CWC ने तेजस्वी को ‘अनौपचारिक’ नेता माना, पर औपचारिक ऐलान को टाल दिया था।
  • देरी से जोखिम: तेजस्वी को सीएम न बनाने का कांग्रेस का दांव RJD का वर्चस्व भी बढ़ा सकता है क्योंकि चुनाव की घोषणा हो चुकी है।
  • तेजस्वी की नौकरी घोषणा चुनौती: तेजस्वी ने अपनी ओर से जीतने के बाद ‘नई सरकार’ में कानून बनाकर ‘हर घर को एक सरकार नौकरी’ देने की घोषणा कर दी है। कांग्रेस के लिए 2020 की तरह 19 सीटों के नुकसान को दोहराने का संकट।

 

NDA पर कांग्रेस ने चार्जशीट निकाली, क्या बदलेगा प्रचार

नौ अक्तूबर को तेजस्वी यादव ने ‘हर घर को एक सरकार नौकरी’ का वादा किया था, इसी दिन कांग्रेस ने पटना में NDA को ‘डबल इंजन’ (double engine)  नहीं ‘ट्रबल इंजन’ (trouble engine) सरकार बताया और 42 पन्नों की चार्जशीट जारी की। साथ ही, नीतीश के बीस साल को ‘विनाश काल’ कहा।

पटना में कांग्रेस की प्रेसवार्ता।

पटना में कांग्रेस की प्रेसवार्ता।

इससे संकेत मिले कि अब कांग्रेस एनडीए सरकार की भ्रष्टाचारी सरकार के रूप में प्रचारित करना चाहती है, ऐसे में सवाल है कि क्या इससे वोटर प्रभावित होगा और क्या प्रचार का फोकस ‘वोट चोरी’ से आगे बढ़ेगा?

कांग्रेस के जयराम रमेश ने कहा-

“जुलाई-2025 में CAG की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के 10 विभागों में 71 हजार करोड़ रुपए का घोटाला हुआ है। यह बिहार का भविष्य नहीं हो सकता।” – बिहार कांग्रेस

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।

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बिहार में धान की अच्छी पैदावार के बाद भी खरीद के सीजन में क्यों परेशान हैं किसान 

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बिहार में धान की खरीद कम और धीमी होने से किसान अपनी फसल कम दाम पर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं।
बिहार में धान की खरीद कम और धीमी होने से किसान अपनी फसल कम दाम पर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं।
  • 28 फरवरी तक राज्य में होनी है धान की खरीद या अधिप्राप्ति।
  • केंद्र की ओर से राज्य में खरीद का कोटा घटाने से खेतों में पड़ी फसल।
नई दिल्ली|
बिहार में धान की इस साल अच्छी पैदावार हुई है, लेकिन इसके बावजूद किसान अपने धान को खेतों में छोड़ने और खुले बाजार में औने-पौने दाम पर बेचने के लिए बेबस हैं। केंद्र सरकार ने इस बार बिहार में धान की खरीद का लक्ष्य 20% घटा दिया है, जिसका असर यह है कि हर जिले में धान खरीद लक्ष्य घटा दिया गया है।
इस पर भी जिलों में धान खरीद की गति बेहद धीमी है, जिससे किसान अपनी फसल की बिक्री को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। कई जिलों में किसानों ने लक्ष्य बढ़ाने और तेजी से खरीद करने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किए हैं। फसल का पूरा दाम न मिलते दिखने से कई धान किसानों ने इसे खुले बाजार में बेचना शुरू कर दिया है ताकि यह समय से बिक जाए और वे खेत में नई फसल लगा सके। 

धान खरीद के आंकड़े

  • 36.85 लाख मीट्रिक टन धान की होनी है खरीद।
  • 45 लाख मीट्रिक टन था पिछले साल का लक्ष्य।
  •  8.52 लाख मीट्रिक टन कम धान खरीद होगी।

अब तक सिर्फ 5100 किसानों से हुई खरीद

सहकारिता विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, 11 जनवरी तक सिर्फ 5176 किसानों से धान की खरीद हुई है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि बिहार में धान खरीद के लिए कितने किसानों ने रजिस्ट्रेशन कराया है। पर पिछले साल धान खरीद का लाभ करीब पांच लाख किसानों को हुआ था। इस हिसाब से देखे तो किसान जिस धीमी खरीद की शिकायत कर रहे हैं, सरकारी आंकड़ों से उसकी तस्दीक हो रही है।

खुले बाजार में धान बेचने को मजबूर

धान की MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) ₹2,183 प्रति क्विंटल है, अगर सरकार धान खरीदती है तो किसान को इसी भाव पर फसल का दाम मिलेगा। पर चूंकि लक्ष्य घटा दिया गया है और अब तक धीमी गति से खरीद हो रही है तो परेशान किसान खुले बाजार में धान बेचने को मजबूर है, जहां धान ₹1,800-₹2,000/क्विंटल पर बिक रहा है। यानी प्रति क्विंटल ₹200-₹300 का नुकसान किसान को उठाना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में 5-10 क्विंटल उपज वाले छोटे किसानों को सबसे ज्यादा मार सहनी पड़ेगी क्योंकि वे फसल करने के लिए कर्ज पर निर्भर होते हैं। 

धान जलाकर गुस्सा दिखा रहे किसान

रोहतास जिला मुख्यालय में किसानों ने इकट्ठा होकर प्रदर्शन किया, उन्होंने मांग की कि धान खरीद का लक्ष्य बढ़ाया जाए और पैक्स के जरिए हो रही खरीद को पारदर्शी बनाया जाए। किसानों का यह तक कहना था कि जिला पंचायत अध्यक्ष यह देखकर खरीद कर रहे हैं कि किस किसान ने उन्हें चुनाव में वोट दिया।

बेगूसराय में कई जिला पंचायतों और व्यापार मंडलों ने धरना दिया, इनका कहना है कि जिला प्रशासन खरीद करने को कह रहा है पर लक्ष्य स्पष्ट नहीं किया गया है।

किसानों की मांगें

  • धान खरीद लक्ष्य बढ़ाया जाए।
  • पैक्स में भेदभाव और गड़बड़ियां बंद हों।
  • खरीद केंद्रों पर गति बढ़ाई जाए।
  • MSP पर पूरी फसल खरीदी जाए, ताकि खुले बाजार में कम दाम न बेचना पड़े।

 जिलों में धान खरीद का लक्ष्य इतना घटा

  • रोहतास: उपज 13 लाख एमटी, लक्ष्य 3.14 लाख एमटी (पिछले साल से 90 हजार एमटी कम)। 
  • भागलपुर: लक्ष्य 37,285 एमटी (पिछले साल 40,000 एमटी था)।
  • नालंदा: लक्ष्य 1.22 लाख एमटी (पिछले साल 1.92 लाख एमटी)।
  • बेगूसराय: उपज 54,548 एमटी, लक्ष्य स्पष्ट नहीं। पैक्स और व्यापार मंडल धरना दे रहे हैं।
  • बांका: उपज 5.4 लाख एमटी, लक्ष्य 1.31 लाख एमटी (पिछले साल 1.39 लाख एमटी)।

राज्य सरकार की मांग- केंद्र कोटा बढ़ाए 

खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग मंत्री लेशी सिंह ने केंद्र से कोटा बढ़ाने की मांग की है। केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्यमंत्री निमुबाई जयंतीभाई बांभणिया के पटना दौरे पर शुक्रवार को मंत्री लेशी सिंह ने इस मामले से जुड़ा ज्ञापन सौंपा। केंद्रीय मंत्री ने इस पर कहा कि केन्द्र सरकार किसानों के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राज्यों के साथ समन्वय के आधार पर निर्णय लेगी। लेशी सिंह ने कहा है कि उन्होंने खाद्य अनुदान मद में लंबित 6,370 करोड़ की राशि भी जल्द जारी करने की मांग की।

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Deputy CM Vijay Sinha : बिहार में भूमि सुधार के जरिए खूब चर्चा पा रहे डिप्टी सीएम, जानिए क्या है अंदर की कहानी

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प्रेसवार्ता को संबोधित करते उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा

नई दिल्ली |

बिहार में नई NDA सरकार बनने के बाद जमीनी विवाद के मामलों और इनकी सुनवाई को लेकर खूब चर्चा हो रही है। नई सरकार में यह विभाग डिप्टी सीएम और बीजेपी के सीनियर नेता विजय कुमार सिन्हा को मिला है। हाल के दिनों में उनकी ओर से कुछ जिलों में जनसुनवाई कार्यक्रम आयोजित हुए, जिसमें राजस्व अफसरों के लिए कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिसको खूब मीडिया कवरेज मिला। अपने पिछले डिप्टी सीएम कार्यकाल में सधी हुई छवि से उलट इस बार विजय सिन्हा तेज-तर्रार मंत्री के तौर पर छवि गढ़ रहे हैं, जानिए इसके राजनीतिक मायने क्या हैं?

जनसुनवाई में राजस्व अफसरों पर तीखा हमला

डिप्टी सीएम के साथ बिहार के ‘राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग’ की जिम्मेदारी मिलने के बाद विजय कुमार सिन्हा ने जनसुनवाई करना शुरू किया। हाल के दिनों में लखीसराय, रोहतास, बक्सर, गया और अन्य जिलों में डिप्टी सीएम ने जनसुनवाई के दौरान शिकायतें और अफसरों की लापरवाहियां सुनकर राजस्व अफसरों को जमकर लताड़ा।
उनके कहे कुछ वाक्य मीडिया में सुर्खी बन गए, जैसे- ‘खड़े-खड़े सस्पेंड कर दूंगा‘, ‘यही जनता के सामने जवाब दो‘, ‘स्पष्टीकरण लो और तुरंत कार्रवाई करो’, ‘ऑन द स्पॉट फैसला होगा‘। इन वीडियो क्लिप्स को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया। बिहार राजस्व सेवा संघ ने मंत्री के इन बयानों को लेकर कहा कि ऐसा करके वे विभाग की छवि को जानबूझकर सार्वजनिक उपहास का विषय बना रहे हैं। 

नाराज राजस्व संघ ने सीएम को लेटर लिखा 

बिरसा की ओर से सीएम को लिखा गया लेटर।

बिरसा की ओर से सीएम को लिखा गया लेटर।

पब्लिक मीटिंग में अपने साथ हो रहे व्यवहार के खिलाफ राजस्व अफसरों में खासा नाराजगी है। इसको लेकर बीती 24 दिसंबर को राजस्व विभाग के अफसरों के संगठन ‘बिहार राजस्व सेवा संघ’ (Bihar Revenue Service Association) ने बाकायदा सीएम नीतीश कुमार को पत्र लिखकर कहा-
“वर्तमान मंत्री पब्लिक मीटिंग में यह भूल जाते हैं कि पिछले 20 साल से अधिकांश समय NDA की सरकार रही है, वे अपने पूर्ववर्ती मंत्रियों और विभागीय प्रमुखों के योगदान को नकारते हुए ऐसा आभास कराते हैं कि जैसे विभाग में कोई काम ही नहीं हुआ। जैसे बीते सौ साल का प्रशासनिक बोझ उनके कंघों पर आ गया हो।”

लेटर में लिखा गया है कि मंत्री लोकप्रियता और तात्कालिक तालियों की अपेक्षा में राजस्व कर्मियों को जनता के सामने अपमानित कर रहे हैं। लेटर में चेतावनी दी गई है कि अगर इसमें सुधार नहीं हुआ तो संघ ऐसे आयोजनों व गतिविधियों का सामूहिक बहिष्कार करेगा। 

बिहार DGP बोले- “भूमि विवाद में हम नहीं पड़ेंगे”

भूमि विवाद के मामलों पर डिप्टी सीएम सिन्हा की ‘सक्रियता’ के बीच बिहार DGP का एक बयान जानने योग्य है। 9 जनवरी को पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विनय कुमार ने कहा कि- बिहार में 60% अपराध की वजह भूमि विवाद है जो समय पर हल न होने से अक्सर आपराधिक घटनाओं में बदल जाते हैं। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था के तहत जमीन विवादों का निपटारा किया जाएगा, हम इसमें सीधे हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
उनका कहना है कि पुलिस के पास खतियान, नक्शा या अद्यतन राजस्व रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते, जिससे उनके लिए विवाद का निष्पक्ष समाधान कर पाना मुश्किल होता है।

डिप्टी सीएम सिन्हा के तेबर को कैसे देखते विशेषज्ञ

बिहार में नीतीश जैसा नेता बनाने की चाह –

इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को जदयू से ज्यादा सीटें मिलीं, पर अब भी उनके पास नीतीश कुमार जैसी एक मास अपील वाला कोई नेता राज्य में नहीं है। ऐसे में डिप्टी सीएम सिन्हा अपनी जनसुनवाई के जरिए जमीन मालिक व गरीब किसानों को साधने की कोशिश करते नज़र आते हैं, जो भाजपा का वोटबैंक भी है।

बीजेपी है बिग ब्रदर

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में भूमि सुधार एक बड़ी समस्या है, इसे नई सरकार में तुरंत उठाकर भाजपा यह दर्शाना चाहती है कि सरकार में उनका ‘अपरहैंड’ है। कई मौकों पर जदयू कहती रही है कि NDA में वह बड़े भाई की भूमिका में है पर हालिया चुनावों में ज्यादा सीटें पाने के बाद भाजपा ने यह भूमिका अख्तियार कर ली है।


जमीन पर क्या होगा असर ?

  • पुरानी फाइलें खुलने और मौके पर मंत्री से भरोसा मिलने से आम जनता को कुछ उम्मीद तो बंधी है। हालांकि इसका असर लॉन्ग टर्म में सामने आएगा।
  • पुलिस महानिदेशक ने जिस तरह कहा है कि जमीन मामलों में पुलिस सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगी, इससे किसी आदेश को लागू करवाने में समस्या पैदा हो सकती है।

बिहार में कितनी बड़ी है भूमि विवाद समस्या ?

बिहार में भूमि विवाद के कितने मामले लंबित हैं, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। पर विशेष मानते हैं कि यह संख्या लाखों में है। इसमें वे केस शामिल हैं जो अदालत में लटके हुए हैं, इसके अलावा जमीन विवाद के चलते हत्या व अन्य अपराध के केस और हाल तक जारी भूमि सर्वे के चलते पैदा हुए नए भूमि विवादों ने इनकी संख्या काफी बढ़ा दी है।

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चुनावी डायरी

बिहार में किसके वोट कहां शिफ्ट हुए? महिला, मुस्लिम, SC–EBC के वोटिंग पैटर्न ने कैसे बदल दिया नतीजा?

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नीतीश कुमार 9 बार सीएम बन चुके हैं और इस बार भी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और अप्रत्याशित जीत मिली।
नीतीश कुमार 9 बार सीएम बन चुके हैं और इस बार भी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और अप्रत्याशित जीत मिली।
  • महागठबंधन का वोट शेयर प्रभावित नहीं हुआ पर अति पिछड़ा, महिला व युवा वोटर उन पर विश्वास नहीं दिखा सके।

नई दिल्ली| महक अरोड़ा

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने साफ कर दिया है कि इस बार की लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं थी—बल्कि वोटिंग पैटर्न, नए सामाजिक समीकरण, और वोट के सूक्ष्म बदलावों की थी।

कई इलाकों में वोट शेयर में बड़ा बदलाव नहीं दिखा, लेकिन सीटें बहुत ज्यादा पलट गईं। यही वजह रही कि महागठबंधन (MGB) का वोट शेयर सिर्फ 1.5% गिरा, लेकिन उसकी सीटें 110 से घटकर 35 पर आ गईं।

दूसरी ओर, NDA की रणनीति ने महिलाओं, SC-EBC और Seemanchal के वोट पैटर्न में बड़ा सेंध लगाई, जो इस प्रचंड बहुमत (massive mandate) की असली वजह माना जा रहा है।

 

महिला वोटर बनीं Kingmaker, NDA का वोट शेयर बढ़ाया

बिहार में इस बार महिलाओं ने 8.8% ज्यादा रिकॉर्ड मतदान किया:

  • महिला वोटिंग: 71.78%
  • पुरुष वोटिंग: 62.98%

(स्रोत- चुनाव आयोग)

महिला वोटर वर्ग के बढ़े हुए मतदान का सीधा फायदा NDA विशेषकर जदयू को हुआ, जिसने पिछली बार 43 सीटें जीती और इस बार 85 सीटों से दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी।


 

वोट शेयर का गणित — MGB का वोट कम नहीं हुआ, पर सीटें ढह गईं

  • NDA Vote share: 46.5%
    MGB Vote share: 37.6%

2020 की तुलना में: 9.26% ज्यादा वोट NDA को पड़ा

  •  NDA के वोट share में बड़ी बढ़त – 37.26%
  •  MGB का वोट share सिर्फ 1.5% गिरा – 38.75%
  •  पर महागठबंधन की सीटें 110 → 35 हो गईं

(स्रोत- चुनाव आयोग)

यानी इस चुनाव में महागठबंधन का वोट प्रतिशत लगभग बराबर रहा पर वे वोट शेयर को सीटों में नहीं बदल सके।

यह चुनाव vote consolidation + social engineering + seat-level micro strategy का चुनाव था।


 

SC वोटर ने NDA का रुख किया — 40 SC/ST सीटों में 34 NDA के खाते में

बिहार की 40 आरक्षित सीटों (38 SC + 2 ST) में NDA ने लगभग क्लीन स्वीप किया:

  •  NDA: 34 सीट
  •  MGB: 4 सीट (2020 में NDA = 21 सीट)

(स्रोत- द इंडियन एक्सप्रेस)

सबसे मजबूत प्रदर्शन JDU ने किया—16 में से 13 SC सीटें जीतीं। BJP ने 12 में से सभी 12 सीटें जीत लीं।

वहीं महागठबंधन के लिए यह सबसे खराब प्रदर्शन रहा — RJD 20 SC सीटों पर लड़कर भी सिर्फ 4 ला सकी।

RJD का वोट शेयर SC सीटों में सबसे ज्यादा (21.75%) रहा, लेकिन सीटें नहीं मिल सकीं।

वोट share और seat conversion में यह सबसे बड़ा असंतुलन रहा।


 

मुस्लिम वोट MGB और AIMIM के चलते बंटा, NDA को फायदा हुआ

सीमांचल – NDA ने 24 में से 14 सीटें जीत लीं

सीमांचल (Purnia, Araria, Katihar, Kishanganj) की 24 सीटों पर इस बार सबसे दिलचस्प तस्वीर दिखी।

मुस्लिम वोट महागठबंधन और AIMIM में बंट गए, और इसका सीधा फायदा NDA को मिला।

  • NDA: 14 सीट
  • JDU: 5
  • AIMIM: 5
  • INC: 4
  • RJD: सिर्फ 1
  • LJP(RV): 1

 

सबसे कम मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचेंगे – सूबे में 17.7% मुस्लिम आबादी के बावजूद इस बार सिर्फ 10 मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचे — 1990 के बाद सबसे कम।

  • यह NDA की सामाजिक इंजीनियरिंग, EBC–Hindu consolidation और मुस्लिम वोटों के बंटवारे का संयुक्त परिणाम है।
  • EBC–अति पिछड़ा वोट NDA के साथ गया — MGB की सबसे बड़ी हार की वजह
  • अतिपिछड़ा वर्ग (EBC) बिहार में सबसे बड़ा वोट बैंक है। इस बार ये पूरा वोट NDA के पक्ष में चला गया।
  • JDU की परंपरागत पकड़ + BJP का Welfare Model मिलकर EBC वर्ग में मजबूत प्रभाव डाल गए।
  • यही वोट EBC बेल्ट (मिथिला, मगध, कोसी) में NDA को करारी बढ़त देने का कारण बना।

 


 

रिकॉर्ड संख्या में निर्दलीय लड़े पर नहीं जीत सके

Independent उम्मीदवारों की रिकॉर्ड संख्या — 925 में से 915 की जमानत जब्त

इस चुनाव में:

  •  कुल उम्मीदवार: 2616
  •  Independent: 925
  •  जमानत ज़ब्त: 915 (98.9%)

ECI ने ज़ब्त हुई जमानतों से 2.12 करोड़ रुपये कमाए

 

क्यों इतने Independent मैदान में उतरे?
1. पार्टियों ने पुराने नेताओं के टिकट काटे
2. कई स्थानीय नेताओं ने बगावत कर दी
3. कई सीटों पर बिखराव की वजह बने

VIP, CPI, AIMIM, RJD, INC – हर पार्टी के बड़ी संख्या में उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई।

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