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आज के अखबार

कब्जे से जुड़ी ट्रंप की धमकियों के बीच क्या सोच रहे ग्रीनलैंड के लोग?

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ग्रीनलैंड के लोग अमेरिका में शामिल होने के खिलाफ हैं।
  • न्यूयॉर्क टाइम्स ने ग्रीनलैंड के लोगों से बातचीत के आधार पर प्रकाशित की रिपोर्ट।

नई दिल्ली|

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को खरीदने या अमेरिका में उसे शामिल करने की बात बार-बार दोहराई जा रही है, इसको लेकर ग्रीनलैंड के लोग बेहद परेशान हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में ग्रीनलैंड की राजधानी नूउक और अन्य शहरों में लोगों से बातचीत के आधार पर बताया गया है कि वे हैरान-परेशान और गुस्से और डर के मिश्रित भावों से जूझ रहे हैं।

अख़बार की यह रिपोर्ट ग्रीनलैंड और डेनमार्क के विदेशमंत्रियों के अमेरिकी विदेशमंत्री के साथ हुई मुलाक़ात के दिन प्रकाशित हुई है। ट्रंप की घोषणा से ग्रीनलैंड के 57,000 लोग डरे हुए हैं कि कहीं उनकी किस्मत बाहर के लोग तय न करने लगें। बता दें कि ग्रीनलैंड, डेनमार्क देश का एक स्वायत्त क्षेत्र है, लेकिन अपनी संस्कृति और पहचान को लेकर बहुत संवेदनशील है।

न्यूयॉर्क टाइम्स, 15 जनवरी

न्यूयॉर्क टाइम्स, 15 जनवरी

ट्रंप क्यों चाहते हैं ग्रीनलैंड

ट्रंप का कहना है कि डेनमार्क, ग्रीनलैंड की सुरक्षा नहीं कर सकता। उनका कहना है कि आगे चलकर रूस या चीन इसे कब्जा सकते हैं और वे नहीं चाहते कि अमेरिका के पड़ोसी रूस-चीन हों, यह उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में भी ग्रीनलैंड को खरीदने की बात कह चुके हैं तब इसे ग्रीनलैंड ने ‘मूर्खतापूर्ण’ बताया था। वेनेजुएला में नियंत्रण करने के बाद ट्रंप ने दोबारा ग्रीनलैंड पर दावा दोहराया है, इस पर ग्रीनलैंड की संसद में विदेश नीति समिति की प्रमुख विवियन मोत्ज़फेल्ट ने कहा है कि हम अपनी आत्मा नहीं बेचेंगे, हम मूर्ख नहीं हैं।

ग्रीनलैंड किस तरह डेनमार्क का उपनिवेश बना?

ग्रीनलैंड पर डेनमार्क का दावा 18वीं सदी से है। यहां 1721 में डेनिश मिशनरी ने पहली कॉलोनी बसाई। साल 1953 में ग्रीनलैंड को डेनमार्क का अभिन्न अंग घोषित किया गया। फिर साल 1979 में होम रूल दिया गया और 2009 में ग्रीनलैंड को स्व-शासन (Self-Rule) मिला। लेकिन ग्रीनलैंड की विदेश नीति, रक्षा और मुद्रा अभी भी डेनमार्क के नियंत्रण में हैं।

ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व क्या ? 

ग्रीनलैंड का सबसे नजदीकी बिंदु अमेरिका के अलास्का से लगभग 3,200 किलोमीटर दूर है। ग्रीनलैंड की राजधानी नूउक (दक्षिणी हिस्सा) से अमेरिका की मुख्य भूमि (न्यूयॉर्क) की दूसरी करीब 4,000 से 4,500 किलोमीटर दूर है। यह दूरी उत्तर ध्रुव के करीब होने के कारण रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी और व्यापारिक रास्ता यहां से होकर गुजरता है।

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।

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भारत-EU संयुक्त बयान में ऐसा क्या, जिसे यूक्रेन पर भारत के बदले रुख की तरह देखा जा रहा?

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भारत-यूरोपीय संघ के संयुक्त बयान ने रूस पर भारत के चले आ रहे चार साल के स्टैंड को बदल दिया है।
भारत-यूरोपीय संघ के संयुक्त बयान ने रूस पर भारत के चले आ रहे चार साल के स्टैंड को बदल दिया है।
  • भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में रूस-यूक्रेन युद्ध पर संयुक्त बयान जारी हुआ जो नई दिल्ली के पुराने रूख से अलग।

नई दिल्ली|

भारत और यूरोपीय संघ के बीच 27 जनवरी को हुई शिखर वार्ता के दौरान FTA समझौते पर वार्ता पूरी होने के साथ एक और अहम घटना हुई। भारत-यूरोपीय संघ ने रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें इस युद्ध को लेकर भारत का बयान अपने पूर्व के बयानों से अलग है। संयुक्त बयान में भारत-यूरोपीय संघ ने कहा है कि “वे ऐसे प्रयासों का समर्थन करेंगे जो स्वतंत्रतासंप्रभु, क्षेत्रीय अखंडता पर आधारित हो।”

द इंडियन एक्सप्रेस ने इस बयान को लेकर लिखा है कि भारत का यह बयान यूक्रेन पर उसके पुराने रूख से बिल्कुल अलग है क्योंकि चार साल से जारी युद्ध को लेकर कभी भारत ने यूक्रेन पर रूसी आक्रामकता का खंडन नहीं किया था। भारत का यह रूख ही पिछले चार साल से यूरोपीय संघ और भारत के बीच बड़ा रोड़ा बना हुआ था। अखबार ने लिखा है कि भारत की नई पोजिशन रूस हित के विपरीत है क्योंकि 2022 में रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण करके उसकी स्वतंत्रता, संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता को प्रभावित किया है। 

EU ने भारत से रूस पर दवाब डालने को कहा

द हिन्दू ने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काज़ा कल्लास के हवाले से लिखा है कि शिखर सम्मेलन के दौरान यूरोपीय संघ ने भारत से कहा कि वह रूस पर यूक्रेन युद्ध को लेकर दवाब बनाए। कल्लास ने शिखर सम्मेलन के तुरंत बाद हुए थिंक टैंक इवेंट में कहा कि रूस ने यूक्रेन के साथ संघर्ष विराम पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया है और आम नागरिकों पर बमबारी कर रहा है। इस मामले में हमने अपने भारतीय सहयोगी से कहा है कि वे रूस पर शांति के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए दवाब बनाएं।

बोर्ड ऑफ पीस पर क्या रूख ?

ट्रंप के बनाए Board of Peace को लेकर भी संयुक्त बयान में जिक्र है, अखबार के मुताबिक दोनों ने इसके गज़ा में शांति व पुर्ननिर्माण के उद्देश्य से समर्थन जताया है, हालांकि दोनों ही इसके उद्देश्य को गज़ा तक ही सीमित रखने का संकेत दे रहे हैं। दोनों ने ही अब तक ट्रंप के बनाए इस बोर्ड को ज्वाइन नहीं किया है।

ईरान पर क्या रुख ?

ईरान में हुए प्रदर्शन को लेकर संयुक्त बयान में कहा गया है कि वे चाहते हैं कि इस स्थिति को डिप्लोमेसी व वार्ता के जरिए सुलझाया जाए। अखबार का कहना है कि इस तरह भारत व ईयू ब्लॉक संदेश दे रहा है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका व यूरोपीय संघ की आक्रामकता के वे पक्षधर नहीं हैं।

 

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भारत के ये राज्य 10 साल बाद हो जाएंगे बूढ़े, Aging आबादी पर सरकारी रुख से क्यों चिंतित The Hindu?

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भारत में बूढ़ी होती आबादी बढ़ने से सामाजिक सुरक्षा का सवाल और गंभीर हो जाएगा। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
भारत में बूढ़ी होती आबादी बढ़ने से सामाजिक सुरक्षा का सवाल और गंभीर हो जाएगा। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
  • RBI के मुताबिक, भारत के राज्यों में असमान रूप से सांख्यिकी बदलेगी।
नई दिल्ली |
भारत में अगले दस साल में जनसांख्यिकी (Demography) में असमान बदलाव दिखने वाले हैं। आरबीआई की नई रिपोर्ट से पता लगा है कि 2036 तक केरल (22%) और तमिलनाडु (20%) बूढ़ी होती आबादी वाले यानी Aging States बन जाएंगे। कर्नाटक और महाराष्ट्र में संतुलित वृद्धि होगी लेकिन एजिंग का दबाव बढ़ेगा। 
दूसरी ओर, हिन्दी भाषी राज्य यूपी, बिहार और झारखंड में युवा आबादी (Working Age Population) 2031 तक बढ़ती रहेगी। यानी जो देश अब तक अपनी युवा आबादी के ऊपर गर्व करता आया है, उसके लिए अगले दशक में चिंता की स्थिति बन सकती है। इस अनुमान के आधार पर आरबीआई की सलाह है कि एजिंग राज्यों को पेंशन पर होने वाले खर्च को वैलेंस करने के लिए अभी अपनी सब्सिडी योजनाओं को संतुलित कर लेना चाहिए। दूसरी ओर, जिन राज्यों में अभी युवा आबादी बढ़ती रहेगी, वहां शिक्षा और मानव पूंजी पर निवेश किया जाना चाहिए। 

क्या है द हिन्दू की चिंता

इस रिपोर्ट को लेकर द हिन्दू ने 27 जनवरी को संपादकीय लिखा है कि आरबीआई की इस राजकोषीय सलाह को लागू करना दक्षिणी राज्यों के लिए चुनौतीपूर्ण है। अखबार का कहना है कि जनसंख्या वृद्धि को काबू करने से इन राज्यों को केंद्रीय टैक्स का कम हिस्सा मिल रहा है, दूसरी ओर आगामी परिसीमन में आशंका जतायी जा रही है कि जनसंख्या के आधार पर ही उनका संसदीय प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
द हिन्दू, 27 जनवरी

द हिन्दू, 27 जनवरी

साथ ही अखबार ने आरबीआई की रिपोर्ट को लेकर कहा है कि इसमें बुजुर्ग महिलाओं की चिंता शामिल नहीं की गई है। अखबार का कहना है कि कि रिसर्च के मुताबिक वे ज्यादा लंबा जीती हैं और उनके पास कोई पारिवारिक संपत्ति नहीं होती, साथ ही एकल परिवार के चलन के चलते सरकार को ऐसी नीति बनानी होगी कि बुजुर्ग होती आबादी सम्मानपूर्वक अपना जीवन जी सके।
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असम SR : जहां नागरिकता का प्रमाण नहीं मांगा, वहां भी बड़ी तादाद में वोट काट दिए, जानिए क्या है पूरा मामला

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असम में जारी SR प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
असम में जारी SR प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
  • असम में स्पेशल रिवीजन प्रक्रिया में 4.78 लाख वोटर मृत मिले, 5.23 लाख को ट्रांसफर बताया।
  • छह विपक्षी दलों ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी से कहा- वोटरों की जानकारी चुराकर उनके नाम कटवाए।
नई दिल्ली|
यूपी समेत 12 राज्यों में हुई SIR के दौरान कई करोड़ वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए, पर माना जा रहा था कि असम में हो रही SR में वोटरों के नाम नहीं कटेंगे क्योंकि वहां वोटरों से नागरिकता का प्रमाण नहीं मांगा जा रहा है। मगर उम्मीद के उलट असम में भी दस लाख से अधिक वोटरों के नाम मतदाता की ड्राफ्ट लिस्ट में काट दिए गए हैं। इसको लेकर असम में कांग्रेस समेत छह विपक्षी दलों ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर भाजपा सरकार पर फर्जी आपत्तियों के जरिए वोटरों ने नाम कटवाने का आरोप लगाया है।

नागरिकता का प्रमाण नहीं देना था, फिर भी 10 लाख नाम कटे

गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने असम को SIR एक्सरसाइज से अलग रखा था और बीते साल 17 नवंबर को एक आदेश जारी करके असम में मतदाता सूची में SR यानी ‘स्पेशल रिवीज़न’ का काम शुरू कराया था। इस एसआर प्रक्रिया के तहत बूथ लेवल ऑफ़िसरों (बीएलओ) ने राज्य के 61 लाख परिवारों (100%) में जाकर मतदाता सूची का फिजिकल वेरिफिकेशन किया। इस प्रक्रिया में असम के लोगों को नागरिकता का प्रमाण नहीं देना था, बीएलओ के पास मौजूदा वोटरों की जानकारी से भरा हुआ फॉर्म मौजूद था, उन्हें घर-घर जाकर उसका वेरिफिकेशन करना था। गौरतलब है कि असम में पहले ही NRC के जरिए भारतीय नागरिक पता लगा लिए गए हैं।

दावा- वोटर नंबर का गलत इस्तेमाल करके नाम कटवाए

द हिन्दू के मुताबिक, 25 जनवरी को कांग्रेस, रायजोर दल, असम जतिया परिषद, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई), सीपीआई (मार्क्सवादी) और सीपीआई (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के नेताओं ने असम के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को एक ज्ञापन सौंपा। इसमें आरोप लगाया गया कि 27 दिसंबर को ड्राफ्ट रोल जारी होने के बाद कटे हुए नामों को दोबारा जुड़वाने की समयावधि 22 जनवरी तक कई फर्जी व अवैध आपत्तियां दर्ज की गईं। इन आपत्तियों में मतदाता की मौत हो जाने या उससे स्थायी तौर पर दूसरी जगह बस जाने के आधार पर नाम हटाने की मांग की गई। जबकि जिनके नाम से आपत्तियां दर्ज हुईं, उनमें से कई आपत्तिकर्ताओं ने मीडिया से कहा कि उन्हें ऐसी आपत्ति दर्ज करने की कोई जानकारी नहीं थी। उनकी ईपीआईसी संख्या और मोबाइल नंबर का दुरुपयोग करके ये आपत्तियां लगाकर नाम काटे गए।  विपक्ष ने इसे मनमाना, गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया।
द हिन्दू ने इस खबर को 26 जनवरी के एडिशन में पहली खबर बनाया है।

द हिन्दू ने इस खबर को 26 जनवरी के एडिशन में पहली खबर बनाया है।

विपक्ष ने सीएम हिमंता के बयान का बनाया आधार

ज्ञापन में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के एक बयान का हवाला दिया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार “कानून के दायरे में रहकर कुछ तो करेगी” ताकि ‘मियां’ समुदाय पर दबाव बनाया जा सके और उन्हें नोटिस जारी कर परेशान किया जा सके। विपक्ष ने इसे एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने की मंशा बताते हुए चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाया।

असम मतदाता ड्राफ्ट लिस्ट – एक नजर में

  • 2.51 करोड़ मतदाता है।
  • 61 लाख से अधिक घरों की 100% जांच की गई।
  • 4.78 लाख मतदाताओं को मृत घोषित किया गया।
  • 5.23 लाख को स्थानांतरित पाया गया।
  • 53,619 दोहरी प्रविष्टियों को हटाया गया।
  • 10 फरवरी, 2026 को अंतिम मतदाता सूची जारी होगी।

क्या है मांग ?

विपक्ष ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी से मांग की है कि ड्राफ्ट सूची पर दायर की गईं अवैध आपत्तियों को खारिज किया जाए। साथ ही, फर्जी आपत्ति दर्ज करने वालो के खिलाफ कार्रवाई हो। बेदखली पीड़ित मतदाताओं को फॉर्म 8 दाखिल करने की अनुमति दी जाए।
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