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बिहार: नक्सली कजरा में कैसे तैयार हुआ देश का सबसे बड़ा बैटरी सोलर प्लांट?

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लखीसराय के कजरा में स्थित बैटरी-इंटीग्रेटेड सोलर पावर प्लांट ।
  • लखीसराय के नक्सली क्षेत्र कजरा में 1500 करोड़ की लागत से विकसित हुआ सोलर प्लांट
  • पहले फेज का काम डेडलाइन से पहले पूरा, नवंबर में CM नीतीश कुमार उद्घाटन कर सकते हैं
  • यह पावर प्लांट पहले चरण में लखीसराय और मुंगेर के पावर ग्रिड को जोड़कर रात में बिजली देगा 

रिपोर्ट – गोपाल प्रसाद आर्य (लखीसराय), संपादन – शिवांगी

लखीसराय जिले से 25 किमी दूर नक्सल प्रभावित कजरा के टाली कोड़ासी गांव में देश का सबसे बड़ा बैटरी-इंटीग्रेटेड सोलर पावर प्लांट (battery-integrated solar power plant) बनकर तैयार हो गया है। 1231 एकड़ भूमि पर फैली इस परियोजना में 1500 करोड़ रुपये की लागत लगी और चार साल में पहले चरण का निर्माण पूरा हो गया है। यह प्लांट हर घंटे 254 मेगा हार्ट्ज बैटरी एनर्जी स्टोर करने के सिस्टम पर आधारित है जो दिन में सौर ऊर्जा को स्टोर करके रात में बिजली देगा, इस तरह क्षेत्र को 24 घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित होने की योजना है।

पहले चरण में इसका लाभ लखीसराय के साथ मुंगेर जिले को मिलने जा रहा है। उम्मीद की जा रही है कि विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले सीएम नीतीश कुमार इसके पहले चरण का उद्घाटन कर देंगे जो NDA सरकार की प्रमुख उपलब्धि बन सकती है। इस बेहद अहम परियोजना को लखीसराय जिले के नक्सली क्षेत्र कजरा में बनाया गया है, आइए जानते हैं कि आखिर किस तरह देश का सबसे बड़ा बैटरी चलित सोलर पावर प्लांट यहां बनकर तैयार हुआ? 

लखीसराय के कजरा में स्थित बैटरी-इंटीग्रेटेड सोलर पावर प्लांट ।

लखीसराय के कजरा में स्थित बैटरी-इंटीग्रेटेड सोलर पावर प्लांट ।

प्लांट में 4 लाख से ज्यादा सोलर पैनल लगे 

इस प्लांट में 4 लाख 32 हजार सोलर पैनल लगाए गए हैं, और 254 MW-hour बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) है। इसे बिहार स्टेट पावर जेनरेशन कंपनी लिमिटेड (BSPGCL) और लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने मिलकर विकसित किया है। इस परियोजना की घोषणा 2021 में हुई थी। L&T के साथ सरकार का करार पिछले साल जून में हुआ और पहला फेज इस महीने पूरा हो गया है। इसमें राज्य सरकार ने 70% फंड का योगदान किया (₹1050 करोड़) जबकि शेष फंड केंद्र की ‘PM सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ के तहत किया गया। 

चुनावी साल में डेडलाइन से पहले काम पूरा

इस प्लांट के पहले फेज की 185 MW क्षमता का काम इस साल दिसंबर तक पूरा होने की डेडलाइन थी पर काम को सितंबर में ही पूरा कर लिया गया है। जानकार इसे राज्य सरकार की चुनावी वर्ष में तेजी के रूप में देख रहे हैं। पहले चरण में लखीसराय और मुंगेर अंतर्गत हवेली खड़गपुर पावर ग्रिड को लाभ मिलना है। उम्मीद है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नवंबर में इसका उद्घाटन करेंगे। चुनाव आयोग द्वारा सितंबर-अक्टूबर में शेड्यूल जारी होने की उम्मीद है, और वोटिंग अक्टूबर-नवंबर में होगी। ऐसे में नीतीश जल्द उद्घाटन कर ऊर्जा आत्मनिर्भरता और ग्रामीण विकास का संदेश दे सकते हैं।

सोलर प्लांट का ले-आउट

सोलर प्लांट का ले-आउट

इन कारणों से नक्सली कजरा को प्लांट के लिए चुना  

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लाल गलियारे (Red Corridor) में कजरा भी शामिल है ,  यहां पर सोलर प्लांट बनना नक्सलवाद को कम करने और आर्थिक उन्नति लाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। नक्सल प्रभावित कजरा में पहले NTPC थर्मल प्लांट के लिए 1231 एकड़ भूमि अधिग्रहीत (2014-15 MoU) की गई थी, फिर इसे सोलर प्लांट में बदलने की घोषणा 2024 में हुई।

कजरा सौर परियोजना जहां शुरू हुई, वह रेड कॉरिडोर एरिया है।

कजरा सौर परियोजना जहां शुरू हुई, वह रेड कॉरिडोर एरिया है।

कजरा की भूमि पर सूर्य प्रकाश की प्रचुरता थी और केंद्र सरकार ऐसे नक्सल प्रभावी क्षेत्रों में विकास नीति पर काम कर रही थी इसलिए इस इलाके में देश का सबसे बड़ा सोलर प्लांट बनाने की रणनीति बनी। सरकार की योजना थी कि इस तरह के विकास से नक्सली क्षेत्र को आर्थिक हब बनाने का अवसर मिलेगा और लोग हिंसा के रास्ते को छोड़कर मुख्य धारा में शामिल होंगे। 

सुरक्षा, भूमि अधिग्रहण व कनेक्टिविटी बना बड़ी चुनौती

नक्सल प्रभावित क्षेत्र में परियोजना निर्माण में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसमें सबसे ज्यादा चुनौती भूमि अधिग्रहण को लेकर आई, लोग विस्थापन की शर्तों पर मंजूर नहीं थे। साथ ही, स्थानीय लोग मुआवजे की राशि को लेकर सहमत नहीं थे। सुरक्षा जोखिम भी अहम चुनौती थी, नक्सली हमलों की आशंका से मजदूरों की कमी और निर्माण सामग्री की डिलीवरी में देरी का सामना करना पड़ा। कनेक्टिविटी की कमी के चलते नक्सल प्रभावित क्षेत्र में सड़कों और लॉजिस्टिक्स की कमी से उपकरण लाने में दिक्कत हुई। सुरक्षा के लिए CRPF की तैनाती की गई, जिससे प्लांट निर्माण की लागत बढ़ गई। इसके अलावा, मौसमी बाधाएं भी आईं। पिछले साल जुलाई-सितंबर 2024 में भारी बारिश से निर्माण कार्य 3-4 महीने बाधित रहा जिससे सोलर पैनल इंस्टॉलेशन में देरी हुई। 

स्थानीय लोगों को रोजगार मिला 

अभी प्लांट पर करीब एक हजार इंजीनियर, टेक्नीशियन और मजदूर कार्यरत हैं, जो स्थानीय रोजगार को बढ़ावा दे रहा है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि लंबी अवधि में उन्हें इससे क्या रोजगार मिलेगा… यह साफ नहीं है। हालांकि यहां कई स्थानीय लोगोें ने सरकार पर आरोप लगाए कि विस्थापन के बाद उनकी आजीविका छिन गई।

पहला फेज : दो जिलों को मिलेगी सोलर लाइट 

जिला
लाभ
विवरण
लखीसराय
185 MW बिजली
हिसोना पावर ग्रिड को प्राथमिक आपूर्ति, ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों में 24 घंटे बिजली।
मुंगेर
185 MW बिजली
हवेली खड़गपुर पावर ग्रिड को सप्लाई, रात्रिकालीन खपत पूरी करने में मदद।

दूसरा फेज : झारखंड, प. बंगाल और ओडिशा में भी सप्लाई संभव 

इस परियोजना के दूसरे फेज में प्लांट की क्षमता 251 मेगावॉट जोड़कर कुल 436 MW की हो जाएगी। इसका काम इस साल दिसंबर से शुरू हो सकता है। यह बिजली मुख्य रूप से बिहार के ग्रिड को मिलेगी, लेकिन राष्ट्रीय ग्रिड के माध्यम से झारखंड, पश्चिम बंगाल, और ओडिशा जैसे पड़ोसी राज्यों को भी आपूर्ति संभव है। बिहार सरकार का लक्ष्य 2030 तक 5000 MW सौर ऊर्जा उत्पादन है, जिसमें कजरा के अलावा पिरपैंती (भागलपुर, 250 MW), जमुई (100 MW), और बांका (150 MW) में प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। यह बिहार की 6500 MW की मौजूदा मांग का 20% पूरा करेगा।

इस प्लांट में 4 लाख से ज्यादा सोलर पैनल लगाए गए हैं। (तस्वीर - गोपाल प्रसाद आर्य)

इस प्लांट में 4 लाख से ज्यादा सोलर पैनल लगाए गए हैं। 

सौर ऊर्जा से बिजली बनेगी, कार्बन उत्सर्जन घटेगा

कोयला आधारित थर्मल प्लांट की जगह सोलर पावर प्लांट बनने से सालाना 2.5 से 3 लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) का कम उत्सर्जन होगा जिससे पर्यावरण को सीधा लाभ मिलेगा। प्लांट की टोटल क्षमता 436 मेगावॉट बिजली बनाने की है, इसके हिसाब से 3.5 से 4 लाख टन CO2 बचत  संभव है। यह भारत के 2030 नेट-जीरो लक्ष्य में योगदान देगा।

लोड शेडिंग की समस्या हल होगी 

सोलर प्लांट से रात के समय बिजली मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली लोड शेडिंग की समस्या हल हो जाएगी और लोगों को ज्यादा समय तक बिजली मिल सकेगी। पहले चरण में पावर सप्लाई पाने वाले जिले लखीसराय में बिजली की दैनिक मांग 25 मेगा वॉट है और रात में बिजली की मांग 8-10 MW है। इसी तरह मुंगेर में 90 MW (रात में 25-35 MW) बिजली की दैनिक मांग है। बिहार की कुल रात्रिकालीन मांग 2000-2500 MW है, जिसमें यह प्लांट 10-15%  योगदान देगा।

लोगों की जुबानी 

“सोलर प्लांट से प्रदूषण टला, लेकिन मुआवजे में देरी और कम राशि से परेशानी है। बिजली मिलने से खुशी है, पर रोजगार का भरोसा चाहिए।” – डॉ. आर. लाल गुप्ता, कजरा ग्रामीण

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“नवंबर तक 185 MW बिजली उत्पादन शुरू हो जाएगा। इस प्लांट का उद्घाटन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के द्वारा होना है, जिसका इंतजार है। सबसे पहले मुंगेर के हवेली खड़कपुर बिजली पावर और लखीसराय के महिसोना पावर ग्रिड को बिजली दी जाएगी। – गौरव कुमार, कनिष्ठ अभियंता, BSPGCL 

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“हमने डेडलाइन से पहले 50% क्षमता का सोलर पावर प्लांट तैयार कर लिया है। आने वाले समय में बिहार के साथ भारत के दूसरे हिस्सों को भी सप्लाई दी जा सकती है।” – अनिर वर्ण, प्रोजेक्ट मैनेजर, L&T

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।

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बिहार में धान की अच्छी पैदावार के बाद भी खरीद के सीजन में क्यों परेशान हैं किसान 

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बिहार में धान की खरीद कम और धीमी होने से किसान अपनी फसल कम दाम पर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं।
बिहार में धान की खरीद कम और धीमी होने से किसान अपनी फसल कम दाम पर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं।
  • 28 फरवरी तक राज्य में होनी है धान की खरीद या अधिप्राप्ति।
  • केंद्र की ओर से राज्य में खरीद का कोटा घटाने से खेतों में पड़ी फसल।
नई दिल्ली|
बिहार में धान की इस साल अच्छी पैदावार हुई है, लेकिन इसके बावजूद किसान अपने धान को खेतों में छोड़ने और खुले बाजार में औने-पौने दाम पर बेचने के लिए बेबस हैं। केंद्र सरकार ने इस बार बिहार में धान की खरीद का लक्ष्य 20% घटा दिया है, जिसका असर यह है कि हर जिले में धान खरीद लक्ष्य घटा दिया गया है।
इस पर भी जिलों में धान खरीद की गति बेहद धीमी है, जिससे किसान अपनी फसल की बिक्री को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। कई जिलों में किसानों ने लक्ष्य बढ़ाने और तेजी से खरीद करने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किए हैं। फसल का पूरा दाम न मिलते दिखने से कई धान किसानों ने इसे खुले बाजार में बेचना शुरू कर दिया है ताकि यह समय से बिक जाए और वे खेत में नई फसल लगा सके। 

धान खरीद के आंकड़े

  • 36.85 लाख मीट्रिक टन धान की होनी है खरीद।
  • 45 लाख मीट्रिक टन था पिछले साल का लक्ष्य।
  •  8.52 लाख मीट्रिक टन कम धान खरीद होगी।

अब तक सिर्फ 5100 किसानों से हुई खरीद

सहकारिता विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, 11 जनवरी तक सिर्फ 5176 किसानों से धान की खरीद हुई है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि बिहार में धान खरीद के लिए कितने किसानों ने रजिस्ट्रेशन कराया है। पर पिछले साल धान खरीद का लाभ करीब पांच लाख किसानों को हुआ था। इस हिसाब से देखे तो किसान जिस धीमी खरीद की शिकायत कर रहे हैं, सरकारी आंकड़ों से उसकी तस्दीक हो रही है।

खुले बाजार में धान बेचने को मजबूर

धान की MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) ₹2,183 प्रति क्विंटल है, अगर सरकार धान खरीदती है तो किसान को इसी भाव पर फसल का दाम मिलेगा। पर चूंकि लक्ष्य घटा दिया गया है और अब तक धीमी गति से खरीद हो रही है तो परेशान किसान खुले बाजार में धान बेचने को मजबूर है, जहां धान ₹1,800-₹2,000/क्विंटल पर बिक रहा है। यानी प्रति क्विंटल ₹200-₹300 का नुकसान किसान को उठाना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में 5-10 क्विंटल उपज वाले छोटे किसानों को सबसे ज्यादा मार सहनी पड़ेगी क्योंकि वे फसल करने के लिए कर्ज पर निर्भर होते हैं। 

धान जलाकर गुस्सा दिखा रहे किसान

रोहतास जिला मुख्यालय में किसानों ने इकट्ठा होकर प्रदर्शन किया, उन्होंने मांग की कि धान खरीद का लक्ष्य बढ़ाया जाए और पैक्स के जरिए हो रही खरीद को पारदर्शी बनाया जाए। किसानों का यह तक कहना था कि जिला पंचायत अध्यक्ष यह देखकर खरीद कर रहे हैं कि किस किसान ने उन्हें चुनाव में वोट दिया।

बेगूसराय में कई जिला पंचायतों और व्यापार मंडलों ने धरना दिया, इनका कहना है कि जिला प्रशासन खरीद करने को कह रहा है पर लक्ष्य स्पष्ट नहीं किया गया है।

किसानों की मांगें

  • धान खरीद लक्ष्य बढ़ाया जाए।
  • पैक्स में भेदभाव और गड़बड़ियां बंद हों।
  • खरीद केंद्रों पर गति बढ़ाई जाए।
  • MSP पर पूरी फसल खरीदी जाए, ताकि खुले बाजार में कम दाम न बेचना पड़े।

 जिलों में धान खरीद का लक्ष्य इतना घटा

  • रोहतास: उपज 13 लाख एमटी, लक्ष्य 3.14 लाख एमटी (पिछले साल से 90 हजार एमटी कम)। 
  • भागलपुर: लक्ष्य 37,285 एमटी (पिछले साल 40,000 एमटी था)।
  • नालंदा: लक्ष्य 1.22 लाख एमटी (पिछले साल 1.92 लाख एमटी)।
  • बेगूसराय: उपज 54,548 एमटी, लक्ष्य स्पष्ट नहीं। पैक्स और व्यापार मंडल धरना दे रहे हैं।
  • बांका: उपज 5.4 लाख एमटी, लक्ष्य 1.31 लाख एमटी (पिछले साल 1.39 लाख एमटी)।

राज्य सरकार की मांग- केंद्र कोटा बढ़ाए 

खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग मंत्री लेशी सिंह ने केंद्र से कोटा बढ़ाने की मांग की है। केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्यमंत्री निमुबाई जयंतीभाई बांभणिया के पटना दौरे पर शुक्रवार को मंत्री लेशी सिंह ने इस मामले से जुड़ा ज्ञापन सौंपा। केंद्रीय मंत्री ने इस पर कहा कि केन्द्र सरकार किसानों के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राज्यों के साथ समन्वय के आधार पर निर्णय लेगी। लेशी सिंह ने कहा है कि उन्होंने खाद्य अनुदान मद में लंबित 6,370 करोड़ की राशि भी जल्द जारी करने की मांग की।

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Deputy CM Vijay Sinha : बिहार में भूमि सुधार के जरिए खूब चर्चा पा रहे डिप्टी सीएम, जानिए क्या है अंदर की कहानी

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प्रेसवार्ता को संबोधित करते उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा

नई दिल्ली |

बिहार में नई NDA सरकार बनने के बाद जमीनी विवाद के मामलों और इनकी सुनवाई को लेकर खूब चर्चा हो रही है। नई सरकार में यह विभाग डिप्टी सीएम और बीजेपी के सीनियर नेता विजय कुमार सिन्हा को मिला है। हाल के दिनों में उनकी ओर से कुछ जिलों में जनसुनवाई कार्यक्रम आयोजित हुए, जिसमें राजस्व अफसरों के लिए कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिसको खूब मीडिया कवरेज मिला। अपने पिछले डिप्टी सीएम कार्यकाल में सधी हुई छवि से उलट इस बार विजय सिन्हा तेज-तर्रार मंत्री के तौर पर छवि गढ़ रहे हैं, जानिए इसके राजनीतिक मायने क्या हैं?

जनसुनवाई में राजस्व अफसरों पर तीखा हमला

डिप्टी सीएम के साथ बिहार के ‘राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग’ की जिम्मेदारी मिलने के बाद विजय कुमार सिन्हा ने जनसुनवाई करना शुरू किया। हाल के दिनों में लखीसराय, रोहतास, बक्सर, गया और अन्य जिलों में डिप्टी सीएम ने जनसुनवाई के दौरान शिकायतें और अफसरों की लापरवाहियां सुनकर राजस्व अफसरों को जमकर लताड़ा।
उनके कहे कुछ वाक्य मीडिया में सुर्खी बन गए, जैसे- ‘खड़े-खड़े सस्पेंड कर दूंगा‘, ‘यही जनता के सामने जवाब दो‘, ‘स्पष्टीकरण लो और तुरंत कार्रवाई करो’, ‘ऑन द स्पॉट फैसला होगा‘। इन वीडियो क्लिप्स को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया। बिहार राजस्व सेवा संघ ने मंत्री के इन बयानों को लेकर कहा कि ऐसा करके वे विभाग की छवि को जानबूझकर सार्वजनिक उपहास का विषय बना रहे हैं। 

नाराज राजस्व संघ ने सीएम को लेटर लिखा 

बिरसा की ओर से सीएम को लिखा गया लेटर।

बिरसा की ओर से सीएम को लिखा गया लेटर।

पब्लिक मीटिंग में अपने साथ हो रहे व्यवहार के खिलाफ राजस्व अफसरों में खासा नाराजगी है। इसको लेकर बीती 24 दिसंबर को राजस्व विभाग के अफसरों के संगठन ‘बिहार राजस्व सेवा संघ’ (Bihar Revenue Service Association) ने बाकायदा सीएम नीतीश कुमार को पत्र लिखकर कहा-
“वर्तमान मंत्री पब्लिक मीटिंग में यह भूल जाते हैं कि पिछले 20 साल से अधिकांश समय NDA की सरकार रही है, वे अपने पूर्ववर्ती मंत्रियों और विभागीय प्रमुखों के योगदान को नकारते हुए ऐसा आभास कराते हैं कि जैसे विभाग में कोई काम ही नहीं हुआ। जैसे बीते सौ साल का प्रशासनिक बोझ उनके कंघों पर आ गया हो।”

लेटर में लिखा गया है कि मंत्री लोकप्रियता और तात्कालिक तालियों की अपेक्षा में राजस्व कर्मियों को जनता के सामने अपमानित कर रहे हैं। लेटर में चेतावनी दी गई है कि अगर इसमें सुधार नहीं हुआ तो संघ ऐसे आयोजनों व गतिविधियों का सामूहिक बहिष्कार करेगा। 

बिहार DGP बोले- “भूमि विवाद में हम नहीं पड़ेंगे”

भूमि विवाद के मामलों पर डिप्टी सीएम सिन्हा की ‘सक्रियता’ के बीच बिहार DGP का एक बयान जानने योग्य है। 9 जनवरी को पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विनय कुमार ने कहा कि- बिहार में 60% अपराध की वजह भूमि विवाद है जो समय पर हल न होने से अक्सर आपराधिक घटनाओं में बदल जाते हैं। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था के तहत जमीन विवादों का निपटारा किया जाएगा, हम इसमें सीधे हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
उनका कहना है कि पुलिस के पास खतियान, नक्शा या अद्यतन राजस्व रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते, जिससे उनके लिए विवाद का निष्पक्ष समाधान कर पाना मुश्किल होता है।

डिप्टी सीएम सिन्हा के तेबर को कैसे देखते विशेषज्ञ

बिहार में नीतीश जैसा नेता बनाने की चाह –

इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को जदयू से ज्यादा सीटें मिलीं, पर अब भी उनके पास नीतीश कुमार जैसी एक मास अपील वाला कोई नेता राज्य में नहीं है। ऐसे में डिप्टी सीएम सिन्हा अपनी जनसुनवाई के जरिए जमीन मालिक व गरीब किसानों को साधने की कोशिश करते नज़र आते हैं, जो भाजपा का वोटबैंक भी है।

बीजेपी है बिग ब्रदर

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में भूमि सुधार एक बड़ी समस्या है, इसे नई सरकार में तुरंत उठाकर भाजपा यह दर्शाना चाहती है कि सरकार में उनका ‘अपरहैंड’ है। कई मौकों पर जदयू कहती रही है कि NDA में वह बड़े भाई की भूमिका में है पर हालिया चुनावों में ज्यादा सीटें पाने के बाद भाजपा ने यह भूमिका अख्तियार कर ली है।


जमीन पर क्या होगा असर ?

  • पुरानी फाइलें खुलने और मौके पर मंत्री से भरोसा मिलने से आम जनता को कुछ उम्मीद तो बंधी है। हालांकि इसका असर लॉन्ग टर्म में सामने आएगा।
  • पुलिस महानिदेशक ने जिस तरह कहा है कि जमीन मामलों में पुलिस सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगी, इससे किसी आदेश को लागू करवाने में समस्या पैदा हो सकती है।

बिहार में कितनी बड़ी है भूमि विवाद समस्या ?

बिहार में भूमि विवाद के कितने मामले लंबित हैं, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। पर विशेष मानते हैं कि यह संख्या लाखों में है। इसमें वे केस शामिल हैं जो अदालत में लटके हुए हैं, इसके अलावा जमीन विवाद के चलते हत्या व अन्य अपराध के केस और हाल तक जारी भूमि सर्वे के चलते पैदा हुए नए भूमि विवादों ने इनकी संख्या काफी बढ़ा दी है।

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चुनावी डायरी

बिहार में किसके वोट कहां शिफ्ट हुए? महिला, मुस्लिम, SC–EBC के वोटिंग पैटर्न ने कैसे बदल दिया नतीजा?

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नीतीश कुमार 9 बार सीएम बन चुके हैं और इस बार भी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और अप्रत्याशित जीत मिली।
नीतीश कुमार 9 बार सीएम बन चुके हैं और इस बार भी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और अप्रत्याशित जीत मिली।
  • महागठबंधन का वोट शेयर प्रभावित नहीं हुआ पर अति पिछड़ा, महिला व युवा वोटर उन पर विश्वास नहीं दिखा सके।

नई दिल्ली| महक अरोड़ा

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने साफ कर दिया है कि इस बार की लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं थी—बल्कि वोटिंग पैटर्न, नए सामाजिक समीकरण, और वोट के सूक्ष्म बदलावों की थी।

कई इलाकों में वोट शेयर में बड़ा बदलाव नहीं दिखा, लेकिन सीटें बहुत ज्यादा पलट गईं। यही वजह रही कि महागठबंधन (MGB) का वोट शेयर सिर्फ 1.5% गिरा, लेकिन उसकी सीटें 110 से घटकर 35 पर आ गईं।

दूसरी ओर, NDA की रणनीति ने महिलाओं, SC-EBC और Seemanchal के वोट पैटर्न में बड़ा सेंध लगाई, जो इस प्रचंड बहुमत (massive mandate) की असली वजह माना जा रहा है।

 

महिला वोटर बनीं Kingmaker, NDA का वोट शेयर बढ़ाया

बिहार में इस बार महिलाओं ने 8.8% ज्यादा रिकॉर्ड मतदान किया:

  • महिला वोटिंग: 71.78%
  • पुरुष वोटिंग: 62.98%

(स्रोत- चुनाव आयोग)

महिला वोटर वर्ग के बढ़े हुए मतदान का सीधा फायदा NDA विशेषकर जदयू को हुआ, जिसने पिछली बार 43 सीटें जीती और इस बार 85 सीटों से दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी।


 

वोट शेयर का गणित — MGB का वोट कम नहीं हुआ, पर सीटें ढह गईं

  • NDA Vote share: 46.5%
    MGB Vote share: 37.6%

2020 की तुलना में: 9.26% ज्यादा वोट NDA को पड़ा

  •  NDA के वोट share में बड़ी बढ़त – 37.26%
  •  MGB का वोट share सिर्फ 1.5% गिरा – 38.75%
  •  पर महागठबंधन की सीटें 110 → 35 हो गईं

(स्रोत- चुनाव आयोग)

यानी इस चुनाव में महागठबंधन का वोट प्रतिशत लगभग बराबर रहा पर वे वोट शेयर को सीटों में नहीं बदल सके।

यह चुनाव vote consolidation + social engineering + seat-level micro strategy का चुनाव था।


 

SC वोटर ने NDA का रुख किया — 40 SC/ST सीटों में 34 NDA के खाते में

बिहार की 40 आरक्षित सीटों (38 SC + 2 ST) में NDA ने लगभग क्लीन स्वीप किया:

  •  NDA: 34 सीट
  •  MGB: 4 सीट (2020 में NDA = 21 सीट)

(स्रोत- द इंडियन एक्सप्रेस)

सबसे मजबूत प्रदर्शन JDU ने किया—16 में से 13 SC सीटें जीतीं। BJP ने 12 में से सभी 12 सीटें जीत लीं।

वहीं महागठबंधन के लिए यह सबसे खराब प्रदर्शन रहा — RJD 20 SC सीटों पर लड़कर भी सिर्फ 4 ला सकी।

RJD का वोट शेयर SC सीटों में सबसे ज्यादा (21.75%) रहा, लेकिन सीटें नहीं मिल सकीं।

वोट share और seat conversion में यह सबसे बड़ा असंतुलन रहा।


 

मुस्लिम वोट MGB और AIMIM के चलते बंटा, NDA को फायदा हुआ

सीमांचल – NDA ने 24 में से 14 सीटें जीत लीं

सीमांचल (Purnia, Araria, Katihar, Kishanganj) की 24 सीटों पर इस बार सबसे दिलचस्प तस्वीर दिखी।

मुस्लिम वोट महागठबंधन और AIMIM में बंट गए, और इसका सीधा फायदा NDA को मिला।

  • NDA: 14 सीट
  • JDU: 5
  • AIMIM: 5
  • INC: 4
  • RJD: सिर्फ 1
  • LJP(RV): 1

 

सबसे कम मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचेंगे – सूबे में 17.7% मुस्लिम आबादी के बावजूद इस बार सिर्फ 10 मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचे — 1990 के बाद सबसे कम।

  • यह NDA की सामाजिक इंजीनियरिंग, EBC–Hindu consolidation और मुस्लिम वोटों के बंटवारे का संयुक्त परिणाम है।
  • EBC–अति पिछड़ा वोट NDA के साथ गया — MGB की सबसे बड़ी हार की वजह
  • अतिपिछड़ा वर्ग (EBC) बिहार में सबसे बड़ा वोट बैंक है। इस बार ये पूरा वोट NDA के पक्ष में चला गया।
  • JDU की परंपरागत पकड़ + BJP का Welfare Model मिलकर EBC वर्ग में मजबूत प्रभाव डाल गए।
  • यही वोट EBC बेल्ट (मिथिला, मगध, कोसी) में NDA को करारी बढ़त देने का कारण बना।

 


 

रिकॉर्ड संख्या में निर्दलीय लड़े पर नहीं जीत सके

Independent उम्मीदवारों की रिकॉर्ड संख्या — 925 में से 915 की जमानत जब्त

इस चुनाव में:

  •  कुल उम्मीदवार: 2616
  •  Independent: 925
  •  जमानत ज़ब्त: 915 (98.9%)

ECI ने ज़ब्त हुई जमानतों से 2.12 करोड़ रुपये कमाए

 

क्यों इतने Independent मैदान में उतरे?
1. पार्टियों ने पुराने नेताओं के टिकट काटे
2. कई स्थानीय नेताओं ने बगावत कर दी
3. कई सीटों पर बिखराव की वजह बने

VIP, CPI, AIMIM, RJD, INC – हर पार्टी के बड़ी संख्या में उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई।

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