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लेह में फिर से पाबंदियां: हिंसा के तीन सप्ताह बाद तनाव क्यों बरकरार?

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नई दिल्ली |

 लद्दाख के लेह में 24 सितंबर की हिंसक झड़पों के ठीक तीन सप्ताह बाद एक बार फिर शांति भंग होने की आशंका से पाबंदियां लगा दी गईं। 15 अक्तूबर को प्रशासन ने प्रतिबंध हटाए और 2 दिन बाद 17 अक्तूबर को दोबारा लागू करने की नौबत आ गई।

दरअसल लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA) ने पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग और संविधान की छठी अनुसूची की मांगों को लेकर 17 अक्तूबर को शांतिपूर्ण प्रदर्शन बुलाया था। सुबह 10 बजे से दो घंटे का शांति मार्च होना था और शाम को ‘ब्लैकआउट’ के आह्नान को देखते हुए प्रशासन ने इंटरनेट बंदी लागू कर दी। हालांकि स्थानीय मीडिया के मुताबिक, कारगिल में मार्च शांतिपूर्वक निकाला गया।

इस घटना ने पूरे क्षेत्र में तनाव को फिर से हवा दी है, बीते महीने हुई हिंसा में चार मौतें और 90 से अधिक लोग घायल हुए थे और प्रदर्शनकारियों की मांगें अब भी बरकरार हैं।

 

 24 सितंबर की हिंसा के बाद के घटनाक्रम 

  • पूर्ण राज्य की मांग को लेकर चल रहा शांतिपूर्ण अनशन 24 सितंबर को हिंसा में बदल गया था, इसके बाद कर्फ्यू लगा दिया गया।
  • उसके बाद कोई हिंसा नहीं हुई और हालात काबू में आने पर 15 अक्टूबर को प्रतिबंध हटाए गए।
  • 17 अक्तूबर को मौन मार्च की कॉल के बाद प्रशासन ने दोबारा इंटरनेट बंदी लागू कर दी और शांति-भंग की धारा लागू कर दी।
  • प्रदर्शनकारियों की मांग को मानते हुए केंद्र ने शुक्रवार को रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज के नेतृत्व में न्यायिक जांच की घोषणा।
  • केंद्र सरकार ने 22 अक्तूबर को लेह और कारगिल के दोनों प्रमुख दलों को फिर से वार्ता शुरू करने के लिए आमंत्रित किया है।

पाक-चीन के बीच बसे लद्दाख में अशांत के मायने

लद्दाख एक कम आबादी वाला ऊंचाई पर बसा रेगिस्तान है, जो पाकिस्तान और चीन के बीच बसा है इसलिए यह भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसकी आबादी मात्र 2.75 लाख है। 
इस क्षेत्र में दो जिले हैं- बौद्ध बहुल आबादी वाला – लेह और मुस्लिम-बहुल आबादी वाला करगिल। 
पूर्ण राज्य की मांग पर दोनों जिले सहमत
लेह और कारगिल दोनों जिलों के बीच पारंपरिक तौर पर विभाजन देखा जाता रहा है, जैसे 2019 में लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिलने पर लेह ने स्वागत किया था जबकि कारगिल में विरोध। पर हाल के दिनों में पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर दोनों इलाकों में सहमती है।
मांगों को समझें : जनप्रतिनिधित्व न होने से नाराजगी

5 अगस्त 2019 को लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। तब लेह के लोग खुश थे कि वे जम्मू-कश्मीर के प्रशासनिक प्रभुत्व से मुक्त हो गए। हालांकि नए केंद्र शासित प्रदेश के ढांचे में उन्हें जम्मू-कश्मीर की तरह विधानसभा नहीं मिली, जिससे कुछ दिन बाद ही लोग असंतुष्ट हो गए क्योंकि अभी पूरा प्रशासन उपराज्यपाल (LG) और नौकरशाहों के हाथ में है। ऐसे में स्थानीय लोगों को नीति बनाने में बजट आवंटन से जुड़े सीमित अधिकार मिले हैं।  लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदें लेह और करगिल के हैं, जिन्हें क्षेत्र के केवल 10% बजट का प्रबंधन मिलता है, जिनके पास सीमित शक्तियां हैं, जिसने असंतोष को और बढ़ावा दिया है।

 

सरकारी नौकरी का संकट
जब लद्दाख जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था, तब जम्मू-कश्मीर लोक सेवा आयोग के तहत लद्दाख के लोगों को नौकरियों के अवसर थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि यूटी बनने के बाद कोई अलग पीएससी स्थापित नहीं हुई, जिससे कोई राजपत्रित नियुक्तियां नहीं हुईं।
केंद्र शासित प्रदेश के गठन के बाद वादा किया गया था कि 6 से 7 हजार नौकरियां मिलेंगी पर केवल 1,000-1,200 वैकेंसी ही भरी गई हैं। इसके अलावा लद्दाख विश्वविद्यालय में भी कॉन्ट्रैक्ट पर भर्तियां हुई हैं जबकि वहां रोजगार का संभावित है। ऐसी स्थितियों ने लोगों को एकजुट किया है। 
5 राउंड वार्ता में कोई हल न निकलने से असंतोष फैला
चार मुख्य मांगों में पूर्ण राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल होना (जो आदिवासी क्षेत्रों को स्वायत्तता देती है), अलग लोकसभा सीटें और स्थानीय नौकरियों में आरक्षण हैं। इनको लेकर केंद्र सरकार के साथ अब तक पांच राउंड की वार्ता हो चुकी है। सोनम वांगचुक का कहना था कि “सरकार हर बार एक नई तारीख दे देती है पर वार्ता से हल नहीं निकलता।”

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।

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CM नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा : जीत के महज दो माह में बिहार दौरे पर निकले, जानिए क्या है असली मकसद, कितना होगा सफल?

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समृद्धि यात्रा के पहले दिन जीविका समूह से मिलते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ( साभार - facebook/Nitishkumar)
समृद्धि यात्रा के पहले दिन जीविका समूह से मिलते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ( साभार - facebook/Nitishkumar)

पटना | हमारे संवाददाता

बिहार में दसवीं बार सीएम पद की शपथ लेने के दो महीने से कम समय बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यव्यापी यात्रा शुरू कर दी है, जिसे समृद्धि यात्रा नाम दिया गया है। यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जबकि विपक्षी नेता तेजस्वी यादव राजनीतिक रूप से सक्रिय नजर नहीं आ रहे और वे खुद कह चुके हैं कि वे नई सरकार के सौ दिन पूरे होने तक कुछ नहीं बोलेंगे। वहीं, NDA के सहयोगी दल BJP के दो बड़े नेता व डिप्टी सीएम की राज्य में अति सक्रियता देखने को मिल रही है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इस यात्रा का उद्देश्य जमीनी स्तर पर योजनाओं की समीक्षा करना बताया गया है। पर हाल में घटी बड़ी आपराधिक घटनाओं को लेकर सीएम की चुप्पी और उनके अनिश्चित स्वास्थ्य के चलते मीडिया से बनाई गई दूरी के चलते सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस यात्रा से सीएम बिहार की जनता की नब्ज टटोल पाएंगे? हालांकि यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बतौर सीएम यह नीतीश कुमार की 16वीं राज्यव्यापी यात्रा है। यह भी गौरतलब है कि बेतिया से शुरू हुई उनकी समृद्धि यात्रा से ठीक पहले विरोध प्रदर्शन में शामिल कुछ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। यह दर्शाता है कि राज्य की मिशीनरी उनकी छवि को लेकर कितनी सजग है।

16 जनवरी के शुरू हुई यात्रा में अब तक क्या-क्या हुआ?

16 जनवरी को पश्चिमी चंपारण के बेतिया से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा की शुरुआत हुई। जिसमें मुख्यमंत्री ने 153 करोड़ रुपये की लागत से 125 नई योजनाओं का शुभारंभ किया। इन योजनाओं में महिला सशक्तिकरण, युवा विकास, कौशल प्रशिक्षण और जन-जन को समृद्ध बनाने से जुड़ी परियोजनाएं शामिल हैं।

ऐलान – सरकारी डॉक्टर नहीं कर पाएंगे निजी प्रैक्टिस:  वहीं, मुख्यमंत्री ने पहले दिन बड़ा ऐलान किया कि बिहार के सरकारी डॉक्टर्स अब प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं कर पाएंगे। सरकार इसके लिए नई नीति लाने जा रही है।

किसानों पर भी खास फोकस :  इस यात्रा में किसानों पर भी खास फोकस है। किसानों को मजबूत बनाने के लिए विशेष कृषि मेले और कृषि यंत्रीकरण की प्रदर्शनी लगाई जा रही है। मुख्यमंत्री चंपारण में बन रहे कुमारबाग औद्योगिक क्षेत्र का भी भ्रमण किया। इससे क्षेत्र में रोजगार और निवेश की संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद है।

यात्रा से ठीक पहले माले नेता को उठाया

पश्चिम चंपारण में भाकपा (माले) के युवा नेता और रिवोल्यूशनरी यूथ एसोसिएशन के राज्य नेता फरहान राजा की गिरफ्तारी ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। यह गिरफ्तारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की 16 जनवरी को शुरू हुई समृद्धि यात्रा से ठीक पहले हुई।

भाकपा (माले) राज्य कमिटी के सचिव कुणाल ने कहा कि फरहान राजा को बेतिया क्षेत्र में गरीब जनता के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने और सरकारी अस्पतालों की खराब स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाने के कारण गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जनता के बुनियादी सवालों से बचने और आवाज़ उठाने वालों को दबाने के लिए दमनकारी कदम उठा रही है।


यात्रा के पहले चरण में 9 जिलों का दौरा

  • सीएम की पश्चिम चंपारण जिले में 16 जनवरी से समृद्धि यात्रा पूर्वी चंपारण से शुरू हुई।
  • 17 जनवरी को पूर्वी चंपारण में विश्व के सबसे बड़े शिवलिंग की स्थापना कार्यक्रम में भी शामिल हुए।
  • 19 जनवरी को सीतामढ़ी और शिवहर का दौरा होगा।
  • 20 जनवरी को गोपालगंज, 21 जनवरी को सीवान जाएंगे।
  • 22 जनवरी को सारण, 23 जनवरी को मुजफ्फरपुर और 24 जनवरी को वैशाली में रहेंगे।

 

20 साल में 14 यात्राएं, राज्य की नब्ज लेना मकसद

नीतीश कुमार ने सीएम रहते हुए अब तक बिहार की 14 यात्राएं की हैं, उनकी अपनी गलती के मुताबिक, समृद्धि यात्रा उनकी 15वीं राज्यव्यापी यात्रा है। एक यात्रा वे विपक्ष में रहते हुए कर चुके हैं। आमतौर पर विपक्षी राजनीति का हथियार माने जाने वाली यात्रा को सीएम नीतीश कुमार ने अपने शासन की खासियत बनाया है। इन यात्राओं के जरिए मुख्यमंत्री सीधे जनता से संवाद करते हैं और जमीनी हकीकत समझते हैं।

  • पहली यात्रा – 2005 में न्याय यात्रा से इसकी शुरुआत की थी, यह बतौर मुख्यमंत्री उनका पहला साल था।
  • तीन यात्राएं – लंबे अंतराल के बाद नीतीश कुमार ने तीन यात्राएं- विकास यात्रा, धन्यवाद यात्रा और प्रवास यात्रा कीं। ये लोकसभा चुनाव का वर्ष था।
  • पांचवीं यात्रा – 2010 में विश्वास यात्रा के बाद एनडीए सरकार को पूर्ण बहुमत मिला।
  • छठी यात्रा – 2011 में जनता के प्रति आभार जताने के लिए सेवा यात्रा शुरू हुई।
  • सातवीं यात्रा – साल 2012 में अधिकार यात्रा निकाली।
  • आठवीं यात्रा – साल 2013 में दोबारा सेवा यात्रा नाम से देशव्यापी यात्रा शुरू की।
  • नौवीं यात्रा – 2014 में संकल्प यात्रा के जरिए जनता तक संवाद बढ़ाया।
  • दसवीं यात्रा – 2015 में संपर्क यात्रा का आयोजन हुआ।
  • ग्यारहवीं यात्रा- 2019 की जल-जीवन-हरियाली यात्रा ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरुकता लाई गई।
  • बारहवीं यात्रा- 2020 में समाज सुधार अभियान यात्रा शुरू हुई।
  • तेरहबीं- 2023 में समाधान यात्रा निकाली गई।
  • चौहदवी यात्रा – 2024 दिसंबर से लेकर 2025 तक मुख्यमंत्री ने प्रगति यात्रा निकाली।

इन यात्राओं में सरकार की योजनाओं की समीक्षा हुई और जनता की शिकायतों का समाधान निकाला गया।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ : यात्राओं से बिहार की तस्वीर नहीं बदल रही

वरिष्ठ पत्रकार सुमन भारद्वाज के अनुसार-

  • मुख्यमंत्री की यात्राओं का मुख्य उद्देश्य योजनाओं के क्रियान्वयन की सच्चाई जानना है। यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री गांव और शहरों में जाकर लोगों से सीधा संवाद करते हैं। जिससे मुख्यमंत्री से योजना व क्षेत्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लेने में आसानी होती है। लेकिन इन यात्राओं से बिहार की तस्वीर नहीं बदल रही है।
  • गृह विभाग ने बीजेपी को सौंप कर राज्य की कानून व्यवस्था से अपना पल्ला झाड़ लिया है, नहीं तो बिहार कई जिलों में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ गंभीर घटनाएं हुईं, सासाराम, खगड़िया और पटना में दिल्ली की निर्भया कांड जैसी घटनाएं हुई लेकिन इन सब मुद्दों पर मुख्यमंत्री का कोई बयान नहीं आया। इसलिए इन यात्राओं से बिहार की तस्वीर बदलेगी कहना मुश्किल है।

जीत के तुरंत बाद यात्रा के राजनीतिक मायने

वोटर को धन्यवाद – राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बार की बिहार यात्रा के जरिए नीतीश कुमार खुद को मिले अभूतपूर्व समर्थन के लिए महिला वोटर का धन्यवाद ज्ञापित करना चाहते हैं।

सक्रियता का संदेश – साथ ही वे वोटरों को यह संदेश देना चाहते हैं कि वे फिट हैं और पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे। यह बीजेपी के डिप्टी सीएम के लिए भी एक संदेश होगा।

राजद को झटका-  चुनाव में करारी हार के बाद राज्य के मुख्य विपक्षी दल राजद के जनता के बीच पहुंचने से पहले ही नीतीश कुमार ने यात्रा के जरिए जनता तक संवाद स्थापित करना शुरू कर दिया, इस तरह उन्होंने विपक्ष की रणनीति को भी झटका दिया है।


समृद्धि यात्रा की राह में चुनौती

  • सीएम के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने स्वास्थ्य को लेकर पॉजिटिव संदेश देना होगा, हाल की दो यात्राओं में उन्होंने जनता से कोई संवाद नहीं किया है। सभा में लिखा हुआ भाषण पढ़ने, विकास योजनाओं का शिलान्यास करने और अफसरों संग योजनाओं की समीक्षा से जुड़ी जानकारियां ही सामने आई हैं।
  • सीएम नीतीश कुमार के साथ पूरे समय डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा नजर आते हैं, मीडिया से उनको दूर रखा जाता है। क्या वे यह संदेश दे पाएंगे कि वे अपना काम स्वतंत्र रूप से कर पा रहे हैं?
  • हाल में मोतिहारी में शिलान्यास के बाद नीतीश कुमार बोर्ड गिनने लगे थे, जो वहां मौजूद लोगों को अखरा। पहले भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनके असहज करने वाले व्यवहार से जुड़ी घटनाएं सामने आई हैं।
  • राजद ने नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा के नाम को लेकर ही सवाल उठाया और पूछा कि जिस राज्य में 34% जनता गरीबी रेखा के नीचे रह रही है, वहां सीएम नीतीश कुमार कौन सी समृद्धि देखने जाना चाहते हैं?

 

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बिहार में धान की अच्छी पैदावार के बाद भी खरीद के सीजन में क्यों परेशान हैं किसान 

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बिहार में धान की खरीद कम और धीमी होने से किसान अपनी फसल कम दाम पर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं।
बिहार में धान की खरीद कम और धीमी होने से किसान अपनी फसल कम दाम पर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं।
  • 28 फरवरी तक राज्य में होनी है धान की खरीद या अधिप्राप्ति।
  • केंद्र की ओर से राज्य में खरीद का कोटा घटाने से खेतों में पड़ी फसल।
नई दिल्ली|
बिहार में धान की इस साल अच्छी पैदावार हुई है, लेकिन इसके बावजूद किसान अपने धान को खेतों में छोड़ने और खुले बाजार में औने-पौने दाम पर बेचने के लिए बेबस हैं। केंद्र सरकार ने इस बार बिहार में धान की खरीद का लक्ष्य 20% घटा दिया है, जिसका असर यह है कि हर जिले में धान खरीद लक्ष्य घटा दिया गया है।
इस पर भी जिलों में धान खरीद की गति बेहद धीमी है, जिससे किसान अपनी फसल की बिक्री को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। कई जिलों में किसानों ने लक्ष्य बढ़ाने और तेजी से खरीद करने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किए हैं। फसल का पूरा दाम न मिलते दिखने से कई धान किसानों ने इसे खुले बाजार में बेचना शुरू कर दिया है ताकि यह समय से बिक जाए और वे खेत में नई फसल लगा सके। 

धान खरीद के आंकड़े

  • 36.85 लाख मीट्रिक टन धान की होनी है खरीद।
  • 45 लाख मीट्रिक टन था पिछले साल का लक्ष्य।
  •  8.52 लाख मीट्रिक टन कम धान खरीद होगी।

अब तक सिर्फ 5100 किसानों से हुई खरीद

सहकारिता विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, 11 जनवरी तक सिर्फ 5176 किसानों से धान की खरीद हुई है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि बिहार में धान खरीद के लिए कितने किसानों ने रजिस्ट्रेशन कराया है। पर पिछले साल धान खरीद का लाभ करीब पांच लाख किसानों को हुआ था। इस हिसाब से देखे तो किसान जिस धीमी खरीद की शिकायत कर रहे हैं, सरकारी आंकड़ों से उसकी तस्दीक हो रही है।

खुले बाजार में धान बेचने को मजबूर

धान की MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) ₹2,183 प्रति क्विंटल है, अगर सरकार धान खरीदती है तो किसान को इसी भाव पर फसल का दाम मिलेगा। पर चूंकि लक्ष्य घटा दिया गया है और अब तक धीमी गति से खरीद हो रही है तो परेशान किसान खुले बाजार में धान बेचने को मजबूर है, जहां धान ₹1,800-₹2,000/क्विंटल पर बिक रहा है। यानी प्रति क्विंटल ₹200-₹300 का नुकसान किसान को उठाना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में 5-10 क्विंटल उपज वाले छोटे किसानों को सबसे ज्यादा मार सहनी पड़ेगी क्योंकि वे फसल करने के लिए कर्ज पर निर्भर होते हैं। 

धान जलाकर गुस्सा दिखा रहे किसान

रोहतास जिला मुख्यालय में किसानों ने इकट्ठा होकर प्रदर्शन किया, उन्होंने मांग की कि धान खरीद का लक्ष्य बढ़ाया जाए और पैक्स के जरिए हो रही खरीद को पारदर्शी बनाया जाए। किसानों का यह तक कहना था कि जिला पंचायत अध्यक्ष यह देखकर खरीद कर रहे हैं कि किस किसान ने उन्हें चुनाव में वोट दिया।

बेगूसराय में कई जिला पंचायतों और व्यापार मंडलों ने धरना दिया, इनका कहना है कि जिला प्रशासन खरीद करने को कह रहा है पर लक्ष्य स्पष्ट नहीं किया गया है।

किसानों की मांगें

  • धान खरीद लक्ष्य बढ़ाया जाए।
  • पैक्स में भेदभाव और गड़बड़ियां बंद हों।
  • खरीद केंद्रों पर गति बढ़ाई जाए।
  • MSP पर पूरी फसल खरीदी जाए, ताकि खुले बाजार में कम दाम न बेचना पड़े।

 जिलों में धान खरीद का लक्ष्य इतना घटा

  • रोहतास: उपज 13 लाख एमटी, लक्ष्य 3.14 लाख एमटी (पिछले साल से 90 हजार एमटी कम)। 
  • भागलपुर: लक्ष्य 37,285 एमटी (पिछले साल 40,000 एमटी था)।
  • नालंदा: लक्ष्य 1.22 लाख एमटी (पिछले साल 1.92 लाख एमटी)।
  • बेगूसराय: उपज 54,548 एमटी, लक्ष्य स्पष्ट नहीं। पैक्स और व्यापार मंडल धरना दे रहे हैं।
  • बांका: उपज 5.4 लाख एमटी, लक्ष्य 1.31 लाख एमटी (पिछले साल 1.39 लाख एमटी)।

राज्य सरकार की मांग- केंद्र कोटा बढ़ाए 

खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग मंत्री लेशी सिंह ने केंद्र से कोटा बढ़ाने की मांग की है। केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्यमंत्री निमुबाई जयंतीभाई बांभणिया के पटना दौरे पर शुक्रवार को मंत्री लेशी सिंह ने इस मामले से जुड़ा ज्ञापन सौंपा। केंद्रीय मंत्री ने इस पर कहा कि केन्द्र सरकार किसानों के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राज्यों के साथ समन्वय के आधार पर निर्णय लेगी। लेशी सिंह ने कहा है कि उन्होंने खाद्य अनुदान मद में लंबित 6,370 करोड़ की राशि भी जल्द जारी करने की मांग की।

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Deputy CM Vijay Sinha : बिहार में भूमि सुधार के जरिए खूब चर्चा पा रहे डिप्टी सीएम, जानिए क्या है अंदर की कहानी

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प्रेसवार्ता को संबोधित करते उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा

नई दिल्ली |

बिहार में नई NDA सरकार बनने के बाद जमीनी विवाद के मामलों और इनकी सुनवाई को लेकर खूब चर्चा हो रही है। नई सरकार में यह विभाग डिप्टी सीएम और बीजेपी के सीनियर नेता विजय कुमार सिन्हा को मिला है। हाल के दिनों में उनकी ओर से कुछ जिलों में जनसुनवाई कार्यक्रम आयोजित हुए, जिसमें राजस्व अफसरों के लिए कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिसको खूब मीडिया कवरेज मिला। अपने पिछले डिप्टी सीएम कार्यकाल में सधी हुई छवि से उलट इस बार विजय सिन्हा तेज-तर्रार मंत्री के तौर पर छवि गढ़ रहे हैं, जानिए इसके राजनीतिक मायने क्या हैं?

जनसुनवाई में राजस्व अफसरों पर तीखा हमला

डिप्टी सीएम के साथ बिहार के ‘राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग’ की जिम्मेदारी मिलने के बाद विजय कुमार सिन्हा ने जनसुनवाई करना शुरू किया। हाल के दिनों में लखीसराय, रोहतास, बक्सर, गया और अन्य जिलों में डिप्टी सीएम ने जनसुनवाई के दौरान शिकायतें और अफसरों की लापरवाहियां सुनकर राजस्व अफसरों को जमकर लताड़ा।
उनके कहे कुछ वाक्य मीडिया में सुर्खी बन गए, जैसे- ‘खड़े-खड़े सस्पेंड कर दूंगा‘, ‘यही जनता के सामने जवाब दो‘, ‘स्पष्टीकरण लो और तुरंत कार्रवाई करो’, ‘ऑन द स्पॉट फैसला होगा‘। इन वीडियो क्लिप्स को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया। बिहार राजस्व सेवा संघ ने मंत्री के इन बयानों को लेकर कहा कि ऐसा करके वे विभाग की छवि को जानबूझकर सार्वजनिक उपहास का विषय बना रहे हैं। 

नाराज राजस्व संघ ने सीएम को लेटर लिखा 

बिरसा की ओर से सीएम को लिखा गया लेटर।

बिरसा की ओर से सीएम को लिखा गया लेटर।

पब्लिक मीटिंग में अपने साथ हो रहे व्यवहार के खिलाफ राजस्व अफसरों में खासा नाराजगी है। इसको लेकर बीती 24 दिसंबर को राजस्व विभाग के अफसरों के संगठन ‘बिहार राजस्व सेवा संघ’ (Bihar Revenue Service Association) ने बाकायदा सीएम नीतीश कुमार को पत्र लिखकर कहा-
“वर्तमान मंत्री पब्लिक मीटिंग में यह भूल जाते हैं कि पिछले 20 साल से अधिकांश समय NDA की सरकार रही है, वे अपने पूर्ववर्ती मंत्रियों और विभागीय प्रमुखों के योगदान को नकारते हुए ऐसा आभास कराते हैं कि जैसे विभाग में कोई काम ही नहीं हुआ। जैसे बीते सौ साल का प्रशासनिक बोझ उनके कंघों पर आ गया हो।”

लेटर में लिखा गया है कि मंत्री लोकप्रियता और तात्कालिक तालियों की अपेक्षा में राजस्व कर्मियों को जनता के सामने अपमानित कर रहे हैं। लेटर में चेतावनी दी गई है कि अगर इसमें सुधार नहीं हुआ तो संघ ऐसे आयोजनों व गतिविधियों का सामूहिक बहिष्कार करेगा। 

बिहार DGP बोले- “भूमि विवाद में हम नहीं पड़ेंगे”

भूमि विवाद के मामलों पर डिप्टी सीएम सिन्हा की ‘सक्रियता’ के बीच बिहार DGP का एक बयान जानने योग्य है। 9 जनवरी को पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विनय कुमार ने कहा कि- बिहार में 60% अपराध की वजह भूमि विवाद है जो समय पर हल न होने से अक्सर आपराधिक घटनाओं में बदल जाते हैं। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था के तहत जमीन विवादों का निपटारा किया जाएगा, हम इसमें सीधे हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
उनका कहना है कि पुलिस के पास खतियान, नक्शा या अद्यतन राजस्व रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते, जिससे उनके लिए विवाद का निष्पक्ष समाधान कर पाना मुश्किल होता है।

डिप्टी सीएम सिन्हा के तेबर को कैसे देखते विशेषज्ञ

बिहार में नीतीश जैसा नेता बनाने की चाह –

इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को जदयू से ज्यादा सीटें मिलीं, पर अब भी उनके पास नीतीश कुमार जैसी एक मास अपील वाला कोई नेता राज्य में नहीं है। ऐसे में डिप्टी सीएम सिन्हा अपनी जनसुनवाई के जरिए जमीन मालिक व गरीब किसानों को साधने की कोशिश करते नज़र आते हैं, जो भाजपा का वोटबैंक भी है।

बीजेपी है बिग ब्रदर

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में भूमि सुधार एक बड़ी समस्या है, इसे नई सरकार में तुरंत उठाकर भाजपा यह दर्शाना चाहती है कि सरकार में उनका ‘अपरहैंड’ है। कई मौकों पर जदयू कहती रही है कि NDA में वह बड़े भाई की भूमिका में है पर हालिया चुनावों में ज्यादा सीटें पाने के बाद भाजपा ने यह भूमिका अख्तियार कर ली है।


जमीन पर क्या होगा असर ?

  • पुरानी फाइलें खुलने और मौके पर मंत्री से भरोसा मिलने से आम जनता को कुछ उम्मीद तो बंधी है। हालांकि इसका असर लॉन्ग टर्म में सामने आएगा।
  • पुलिस महानिदेशक ने जिस तरह कहा है कि जमीन मामलों में पुलिस सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगी, इससे किसी आदेश को लागू करवाने में समस्या पैदा हो सकती है।

बिहार में कितनी बड़ी है भूमि विवाद समस्या ?

बिहार में भूमि विवाद के कितने मामले लंबित हैं, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। पर विशेष मानते हैं कि यह संख्या लाखों में है। इसमें वे केस शामिल हैं जो अदालत में लटके हुए हैं, इसके अलावा जमीन विवाद के चलते हत्या व अन्य अपराध के केस और हाल तक जारी भूमि सर्वे के चलते पैदा हुए नए भूमि विवादों ने इनकी संख्या काफी बढ़ा दी है।

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