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पारिवारिक कलह: 10 साल में 5 पार्टियों की हार, लालू की RJD पर भी क्या खतरा?

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उद्धव ठाकरे (फोटो क्रेडिट - इंटरनेट)
  • लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप के नई पार्टी बना लेने के बाद अब बेटी रोहिणी आचार्य के बगावती तेवर
  • रोहिणी ने भाई तेजस्वी के करीबी के खिलाफ ट्वीट किया, फिर पिता और भाई को एक्स पर अनफॉलो किया
नई दिल्ली |
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से ठीक पहले राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के परिवार में फूट की खबरें सुर्खियों में हैं। लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को मई 2025 में पार्टी और परिवार से निष्कासित करने के बाद अब बेटी रोहिणी आचार्य ने भी ‘बगावती’ तेवर दिखाए हैं। हाल में रोहिणी ने फेसबुक पर तेजस्वी यादव के करीबी संजय यादव की आलोचना की, फिर परिवार के सदस्यों को एक्स पर अनफॉलो कर दिया, जिससे परिवार में दरार की अटकलें तेज हो गईं।  आइए जानते हैं कि ये तकरार कितनी गंभीर है और इससे राजद को आगामी विधानसभा चुनाव में क्या चुनौती आ सकती है। गौरतलब है कि बीते दस वर्षों में पांच बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों को इसका चुनावी नुकसान उठाना पड़ा है।
बड़ी बेटी मीसा भारती चुप, पर रोहिणी-तेजप्रताप खुलकर बोल रहे
लालू यादव व राबड़ी देवी की सात बेटियों व दो बेटे के परिवार तनाव के संकेत हैं। हालिया विवाद पर बड़े बेटे तेजप्रताप व दूसरे नंबर की बेटी रोहिणी आचार्य ही खुलकर बोल रही हैं। राजनीति में लंबे समय से सक्रिय, लालू की बड़ी बेटी व  पाटलिपुत्र सीट से सांसद मीसा भारती अभी तक चुप हैं। छोटी बहन रोहिणी ने बुधवार तो एक और पोस्ट करके बिना नाम लिए उन लोगों की आलोचना की है, जो उनके मुताबिक यह दोषारोपण कर रहे हैं कि उन्होंने अपने या किसी और के लिए कभी कोई ‘मांग’ रखी थी। साथ ही कहा है कि ऐसे लोगों को शह देने वाले लोगों की सोच गंदी है। जानकार कहते हैं कि ऐसा लिखकर रोहिणी पार्टी या परिवार के किसी व्यक्ति की ओर ही इशारा कर रही हैं।
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Timeline- लालू परिवार में बगावत की कहानी  
तेज प्रताप से रोहिणी तक लालू परिवार की राजनीतिक महत्वाकांक्षा हमेशा से चर्चा में रही है, लेकिन 2025 में यह कलह चुनावी संकट बन गई। इसकी टाइमलाइन देखिए..
25 मई : लालू ने बेटे तेजप्रताप को पार्टी से निकाला 

मई में लालू यादव ने अपने बड़े बेटे तेज प्रताप को “गैर-जिम्मेदार व्यवहार” के चलते 6 साल के लिए RJD और परिवार से निकाल दिया, जिसकी घोषणा उन्होंने एक्स पर ट्वीट करके दी थी। दरअसल 2018 में तेजप्रताप की शादी ऐश्वर्या ( बिहार के पूर्व मंत्री चंद्रिका राय की पोती)  से हुई थी पर रिश्ता नहीं चला और तलाक का केस अब भी कोर्ट में चल रहा है।

लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव।

लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव।

इस बीच तेजप्रताप ने अनुष्का यादव के साथ अपनी एक फोटो ट्वीट करके दावा किया कि वे उनके साथ 12 साल से Live-In रिश्ते में हैं, बाद में इसे डिलीट कर दिया। इसी फोटो के चलते हुई किरकिरी के बाद लालू ने ऐक्शन लिया।

14 सितंबर : बेटे ने नई पार्टी बनाकर गठबंधन किया

इसके बाद तेज प्रताप ने जनशक्ति जनता दल (JJD) नामक नई पार्टी बनाई और 5 छोटे दलों से गठबंधन किया। बता दें कि JJD को मूल रूप से 2020 में रजिस्टर किया गया था, इस दल को चुनाव आयोग ने ‘ब्लैकबोर्ड’ का सिंबल दिया है। बता दें कि तेजप्रताप हसनपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। इससे पहले वह बिहार के महा-गठबंधन में नीतीश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री भी रह चुके हैं।

21 सितंबर : पिता-भाई से नाराज रोहिणी ने किया अन-फॉलो  
बीते 18 सितंबर को रोहिणी आचार्य ने अपने भाई नेता तेजस्वी यादव के करीबी संजय यादव पर निशाना साधते हुए एक सोशल मीडिया पोस्ट किया। यह पोस्ट बिहार में हुई तेजस्वी यादव की ‘बिहार अधिकार यात्रा’ के दौरान की एक तस्वीर को लेकर था जो बाद में वायरल हो गई। इस तस्वीर में देखा जा सकता है कि रैली की रथनुमां बस में तेजस्वी यादव वाली सीट पर संजय सिंह बैठे हैं। तस्वीर को लेकर रोहिणी ने लिखा, “फ्रंट सीट लालू-तेजस्वी के लिए रिजर्व है, संजय यादव का कब्जा गलत है।” इसके बाद उन्होंने अपने सभी पोस्ट प्राइवेट कर लिए और 21 सितंबर को रोहिणी ने तेजस्वी और लालू को X (ट्विटर) पर अनफॉलो भी कर दिया, जो परिवारिक तनाव का संकेत माना जा रहा है। इनके छोटे भाई तेजप्रताप ने बहन के कदम का समर्थन किया है।
तेज प्रताप ने समर्थन किया, कहा “जो बहनों का अपमान करेगा, उसे सुंदरन चक्र का सामना करना पड़ेगा।” – तेज प्रताप यादव की प्रतिक्रिया।
किडनी दान करने के बाद अपने पिता के साथ रोहिणी आचार्य (फोटो क्रेडिट - रोहिणी का फेसबुक पेज)

किडनी दान करने के बाद अपने पिता के साथ रोहिणी आचार्य (फोटो क्रेडिट – रोहिणी का फेसबुक पेज)

 

 24 सितंबर : पिता को किडनी दान देने पर पोस्ट किया 
रोहिणी आचार्य अपने परिवार के साथ सिंगापुर में रहती हैं और इनकी चर्चा मीडिया में अपने पिता लालू यादव को किडनी दान देने के चलते आई थी। इसके बाद उन्होंने सारण से लोकसभा चुनाव भी लड़ा पर हार गईं। रोहिणी ने बुधवार को एक और फेसबुक पोस्ट करके इसी पर लिखा है कि ”अगर कोई साबित कर दे कि उन्होंने पिता को किडनी दान नहीं की तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगी। साथ ही लिखा कि आरोप लगाने वाले यह भी साबित करें कि कभी भी उन्होंने अपने या किसी और के लिए कोई मांग की थी।”
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तेजस्वी यादव बोले- ‘चुनाव से पहले प्रोपेगैंडा कर रही NDA’
“सब NDA का प्रोपेगैंडा है। हम एक परिवार हैं, और यह सब चुनाव से पहले फैलाया जा रहा है ताकि RJD को कमजोर दिखाया जाए। हमारी एकता अटल है, और यह प्रोपेगैंडा हमें मजबूत ही बनाएगा।” – तेजस्वी यादव, प्रेस कॉन्फ्रेस (21 सितंबर 2025)
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RJD विवाद पर क्या कहते हैं राजनीतिक जानकार –
:: महिला वोटरों में जा सकता है गलत संदेश 
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजद में लालू की बेटी बगावती तेवरों से पार्टी के महिला वोटरों के बीच छवि को नुकसान हो सकता है। बिहार में महिला वोटर 50% हैं, ऐसे में ये पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है। BJP-JDU गठबंधन इस मुद्दे को भुनाकर नैरेटिव बना सकती है कि पार्टी महिलाओं का सम्मान नहीं करती। पहले ही, सत्ताधारी दल ने विपक्ष पर महिलाओं का सम्मान न करने को लेकर प्रचार जारी रखा है, इसको लेकर बिहार बंद भी बुलाया गया था। बता दें कि मोदी ने गया में दिए वर्चुअल भाषण में कहा था कि ‘इंडिया गठबंधन के मंच से उनकी मां को गाली दी गई।’
 
:: संजय यादव के राजद में बढ़ते कद से नाराजगी  
RJD में रोहिणी आचार्य और तेज प्रताप यादव के बगावत के केंद्र में तेजस्वी यादव के सलाहकार संजय यादव रहे हैं। संजय ने 2020 विधानसभा चुनाव में RSS चीफ मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान पर तेजस्वी की रणनीति बनाई, जिससे RJD को फायदा हुआ।
तेजस्वी यादव के साथ उनके करीबी सहयोगी संजय यादव (फोटो क्रेडिट - @sanjuydv)

तेजस्वी यादव के साथ उनके करीबी सहयोगी संजय यादव (फोटो क्रेडिट – @sanjuydv)

 

संजय का प्रभाव तेजस्वी की राजनीतिक शैली को आकार देता आया है। पिछले साल पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में सांसद बनाकर भेज दिया। जानकारों के मुताबिक, लालू परिवार के सदस्यों को लगता है कि संजय का बढ़ता प्रभाव पार्टी के अन्य सदस्यों में असुरक्षा की भावना भर सकता है और परिवारिक सदस्यों को यह भी लगता है कि यह “बाहरी” हस्तक्षेप है।
:: पहले भी चुनौतियां आईं पर लालू ने RJD को मजबूत रखा
ऐतिहासिक संदर्भ से यह भी पता लगता है कि RJD अतीत में भी कलह से उबरी है, नेतृत्व एकजुटता रहने पर इस चुनौती से भी पार पा सकती है। 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उनके भाई-भतीजावाद की आलोचना हुई, फिर भी उन्होंने पार्टी को बिहार की राजनीति में एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित किया।
लालू यादव, credit - staticflickr

लालू यादव, credit – staticflickr

 

विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी रणनीति, जिसमें सामाजिक न्याय और यादव-मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट करना शामिल था, ने उन्हें संकट से उबारा। 2020 में भी तनाव के बावजूद RJD ने 75 सीटें जीतीं, जो एकता की मिसाल थी। वर्तमान में लालू की नेतृत्व क्षमता और तेजस्वी यादव की युवा अपील पार्टी को फिर से खड़ा करने की संभावना रखती है।

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पारिवारिक कलह : दो दलों में भाई-बहन झगड़े, बहन को पार्टी से निकाल दिया
1- तेलंगाना में के. कविता को निकाला, BRS की हार हुई – भरत राष्ट्र समिति (BRS) पार्टी में बेटे और बेटी के बीच के झगड़े ने 2023 में इसे सत्ता से बाहर कर दिया और कांग्रेस ने सरकार बना ली। तेलंगाना के इस प्रमुख दल को के. चंद्रशेखर राव (KCR) ने बनाया था। उनके बेटे के.टी. रामाराव (KTR) और बेटी के. कविता के बीच पार्टी में वर्चस्व का झगड़ा शुरु हो गया, हाल में के. कविता को पार्टी से बाहर कर दिया गया है। 
KCR की बेटी के. कविता (फोटो क्रेडिट - इंटरनेट)

KCR की बेटी के. कविता (फोटो क्रेडिट – इंटरनेट)

 

2023 में झगड़े के चलते चुनाव में पार्टी 88 से घटकर 39 सीटों पर सिमट गई, कांग्रेस ने 64 जीतीं। कलह ने पार्टी की एकता तोड़ी और वोट बैंक (OBC) बंट गया।
2- आंध्र प्रदेश में शर्मिला को निकाला, YSRCP दोनों चुनाव हारी :  वाईएस जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाइएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के बहन वाईएस शर्मिला से झगड़े ने चुनावी नुकसान पहुंचा। AP के इस प्रमुख दल ने 2024 के लोकसभा व विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार झेली। 
वाईएस शर्मिला (फोटो क्रे़डिट - @realyssharmila)

वाईएस शर्मिला (फोटो क्रे़डिट – @realyssharmila)

 

जगन ने शर्मिला को पार्टी से निकाल दिया, जिसके बाद शर्मिला कांग्रेस में शामिल हो गईं। YSRCP की सीटें 151 से घटकर 11 रह गईं।
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तीन दलों में चाचा-भतीजे की नहीं बनी, चुनाव में वोट कटे  

1- यूपी में सपा से शिवपाल अलग हुए, पार्टी चुनाव हारी- उत्तर प्रदेश (2016-2017) के विधानसभा चुनाव के दौरान सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव के बीच कलह ने पार्टी को दो धड़ों में बांट दिया। मुलायम के भाई शिवपाल सिंह यादव ने विद्रोह किया, जिससे 2017 विधानसभा चुनाव में SP की सीटें 224 से घटकर 47 रह गईं। BJP ने 312 सीटें जीतीं। कलह ने यादव वोट बैंक को बांटा, और SP को 25 वर्षों बाद विपक्ष में धकेल दिया।

2- महाराष्ट्र में अजीत पवार अलग हुए, NCP टूटी – राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) प्रमुख शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार के बीच कलह ने NCP को दो भागों (NCP-SP और NCP-Ajit) में बांट दिया। 2023 विधानसभा में NCP-SP को 10 सीटें मिलीं, जबकि अजित गुट ने BJP के साथ गठबंधन कर 41 जीतीं। कुल मिलाकर, कलह ने NCP को 54 से घटाकर 10-41 सीटों पर सीमित कर दिया। 
3- महाराष्ट्र में उद्धव झगड़े, फिर शिवसेना टूटी, सत्ता गईबाल ठाकरे के पोते राज ठाकरे और भतीजे उद्धव ठाकरे के बीच 2005 से कलह चल रही थी, जिसका नुकसान मूल पार्टी को अगले नौ साल तक झेलना पड़ा। राज ठाकरे ने 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) नाम से पार्टी बना ली, उद्धव ठाकरे के पास मूल पार्टी शिवसेना रही।2019 के लोकसभा चुनाव में MNS ने शिवसेना को नुकसान पहुंचाया।
उद्धव ठाकरे (फोटो क्रेडिट - इंटरनेट)

उद्धव ठाकरे (फोटो क्रेडिट – इंटरनेट)

 

पारिवारिक बेस कमजोर होने के बाद 2022 में पार्टी के सदस्य एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में विद्रोह करके इसे दो भागों में बांट दिया और पार्टी का मूल नाम व चुनाव चिन्ह भी ले लिया। इसके बाद उद्धव ठाकरे ने अपने दल का नाम ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ Shiv Sena (UBT) कर दिया। इस दल को ने पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में महाविकास अघाड़ी (MVA) गठबंधन में चुनाव लड़ा और उसकी सीटें 145 से घटकर 20 रह गईं। 
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बिहार में धान की अच्छी पैदावार के बाद भी खरीद के सीजन में क्यों परेशान हैं किसान 

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बिहार में धान की खरीद कम और धीमी होने से किसान अपनी फसल कम दाम पर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं।
बिहार में धान की खरीद कम और धीमी होने से किसान अपनी फसल कम दाम पर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं।
  • 28 फरवरी तक राज्य में होनी है धान की खरीद या अधिप्राप्ति।
  • केंद्र की ओर से राज्य में खरीद का कोटा घटाने से खेतों में पड़ी फसल।
नई दिल्ली|
बिहार में धान की इस साल अच्छी पैदावार हुई है, लेकिन इसके बावजूद किसान अपने धान को खेतों में छोड़ने और खुले बाजार में औने-पौने दाम पर बेचने के लिए बेबस हैं। केंद्र सरकार ने इस बार बिहार में धान की खरीद का लक्ष्य 20% घटा दिया है, जिसका असर यह है कि हर जिले में धान खरीद लक्ष्य घटा दिया गया है।
इस पर भी जिलों में धान खरीद की गति बेहद धीमी है, जिससे किसान अपनी फसल की बिक्री को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। कई जिलों में किसानों ने लक्ष्य बढ़ाने और तेजी से खरीद करने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किए हैं। फसल का पूरा दाम न मिलते दिखने से कई धान किसानों ने इसे खुले बाजार में बेचना शुरू कर दिया है ताकि यह समय से बिक जाए और वे खेत में नई फसल लगा सके। 

धान खरीद के आंकड़े

  • 36.85 लाख मीट्रिक टन धान की होनी है खरीद।
  • 45 लाख मीट्रिक टन था पिछले साल का लक्ष्य।
  •  8.52 लाख मीट्रिक टन कम धान खरीद होगी।

अब तक सिर्फ 5100 किसानों से हुई खरीद

सहकारिता विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, 11 जनवरी तक सिर्फ 5176 किसानों से धान की खरीद हुई है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि बिहार में धान खरीद के लिए कितने किसानों ने रजिस्ट्रेशन कराया है। पर पिछले साल धान खरीद का लाभ करीब पांच लाख किसानों को हुआ था। इस हिसाब से देखे तो किसान जिस धीमी खरीद की शिकायत कर रहे हैं, सरकारी आंकड़ों से उसकी तस्दीक हो रही है।

खुले बाजार में धान बेचने को मजबूर

धान की MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) ₹2,183 प्रति क्विंटल है, अगर सरकार धान खरीदती है तो किसान को इसी भाव पर फसल का दाम मिलेगा। पर चूंकि लक्ष्य घटा दिया गया है और अब तक धीमी गति से खरीद हो रही है तो परेशान किसान खुले बाजार में धान बेचने को मजबूर है, जहां धान ₹1,800-₹2,000/क्विंटल पर बिक रहा है। यानी प्रति क्विंटल ₹200-₹300 का नुकसान किसान को उठाना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में 5-10 क्विंटल उपज वाले छोटे किसानों को सबसे ज्यादा मार सहनी पड़ेगी क्योंकि वे फसल करने के लिए कर्ज पर निर्भर होते हैं। 

धान जलाकर गुस्सा दिखा रहे किसान

रोहतास जिला मुख्यालय में किसानों ने इकट्ठा होकर प्रदर्शन किया, उन्होंने मांग की कि धान खरीद का लक्ष्य बढ़ाया जाए और पैक्स के जरिए हो रही खरीद को पारदर्शी बनाया जाए। किसानों का यह तक कहना था कि जिला पंचायत अध्यक्ष यह देखकर खरीद कर रहे हैं कि किस किसान ने उन्हें चुनाव में वोट दिया।

बेगूसराय में कई जिला पंचायतों और व्यापार मंडलों ने धरना दिया, इनका कहना है कि जिला प्रशासन खरीद करने को कह रहा है पर लक्ष्य स्पष्ट नहीं किया गया है।

किसानों की मांगें

  • धान खरीद लक्ष्य बढ़ाया जाए।
  • पैक्स में भेदभाव और गड़बड़ियां बंद हों।
  • खरीद केंद्रों पर गति बढ़ाई जाए।
  • MSP पर पूरी फसल खरीदी जाए, ताकि खुले बाजार में कम दाम न बेचना पड़े।

 जिलों में धान खरीद का लक्ष्य इतना घटा

  • रोहतास: उपज 13 लाख एमटी, लक्ष्य 3.14 लाख एमटी (पिछले साल से 90 हजार एमटी कम)। 
  • भागलपुर: लक्ष्य 37,285 एमटी (पिछले साल 40,000 एमटी था)।
  • नालंदा: लक्ष्य 1.22 लाख एमटी (पिछले साल 1.92 लाख एमटी)।
  • बेगूसराय: उपज 54,548 एमटी, लक्ष्य स्पष्ट नहीं। पैक्स और व्यापार मंडल धरना दे रहे हैं।
  • बांका: उपज 5.4 लाख एमटी, लक्ष्य 1.31 लाख एमटी (पिछले साल 1.39 लाख एमटी)।

राज्य सरकार की मांग- केंद्र कोटा बढ़ाए 

खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग मंत्री लेशी सिंह ने केंद्र से कोटा बढ़ाने की मांग की है। केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्यमंत्री निमुबाई जयंतीभाई बांभणिया के पटना दौरे पर शुक्रवार को मंत्री लेशी सिंह ने इस मामले से जुड़ा ज्ञापन सौंपा। केंद्रीय मंत्री ने इस पर कहा कि केन्द्र सरकार किसानों के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राज्यों के साथ समन्वय के आधार पर निर्णय लेगी। लेशी सिंह ने कहा है कि उन्होंने खाद्य अनुदान मद में लंबित 6,370 करोड़ की राशि भी जल्द जारी करने की मांग की।

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रिसर्च इंजन

Deputy CM Vijay Sinha : बिहार में भूमि सुधार के जरिए खूब चर्चा पा रहे डिप्टी सीएम, जानिए क्या है अंदर की कहानी

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प्रेसवार्ता को संबोधित करते उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा

नई दिल्ली |

बिहार में नई NDA सरकार बनने के बाद जमीनी विवाद के मामलों और इनकी सुनवाई को लेकर खूब चर्चा हो रही है। नई सरकार में यह विभाग डिप्टी सीएम और बीजेपी के सीनियर नेता विजय कुमार सिन्हा को मिला है। हाल के दिनों में उनकी ओर से कुछ जिलों में जनसुनवाई कार्यक्रम आयोजित हुए, जिसमें राजस्व अफसरों के लिए कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिसको खूब मीडिया कवरेज मिला। अपने पिछले डिप्टी सीएम कार्यकाल में सधी हुई छवि से उलट इस बार विजय सिन्हा तेज-तर्रार मंत्री के तौर पर छवि गढ़ रहे हैं, जानिए इसके राजनीतिक मायने क्या हैं?

जनसुनवाई में राजस्व अफसरों पर तीखा हमला

डिप्टी सीएम के साथ बिहार के ‘राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग’ की जिम्मेदारी मिलने के बाद विजय कुमार सिन्हा ने जनसुनवाई करना शुरू किया। हाल के दिनों में लखीसराय, रोहतास, बक्सर, गया और अन्य जिलों में डिप्टी सीएम ने जनसुनवाई के दौरान शिकायतें और अफसरों की लापरवाहियां सुनकर राजस्व अफसरों को जमकर लताड़ा।
उनके कहे कुछ वाक्य मीडिया में सुर्खी बन गए, जैसे- ‘खड़े-खड़े सस्पेंड कर दूंगा‘, ‘यही जनता के सामने जवाब दो‘, ‘स्पष्टीकरण लो और तुरंत कार्रवाई करो’, ‘ऑन द स्पॉट फैसला होगा‘। इन वीडियो क्लिप्स को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया। बिहार राजस्व सेवा संघ ने मंत्री के इन बयानों को लेकर कहा कि ऐसा करके वे विभाग की छवि को जानबूझकर सार्वजनिक उपहास का विषय बना रहे हैं। 

नाराज राजस्व संघ ने सीएम को लेटर लिखा 

बिरसा की ओर से सीएम को लिखा गया लेटर।

बिरसा की ओर से सीएम को लिखा गया लेटर।

पब्लिक मीटिंग में अपने साथ हो रहे व्यवहार के खिलाफ राजस्व अफसरों में खासा नाराजगी है। इसको लेकर बीती 24 दिसंबर को राजस्व विभाग के अफसरों के संगठन ‘बिहार राजस्व सेवा संघ’ (Bihar Revenue Service Association) ने बाकायदा सीएम नीतीश कुमार को पत्र लिखकर कहा-
“वर्तमान मंत्री पब्लिक मीटिंग में यह भूल जाते हैं कि पिछले 20 साल से अधिकांश समय NDA की सरकार रही है, वे अपने पूर्ववर्ती मंत्रियों और विभागीय प्रमुखों के योगदान को नकारते हुए ऐसा आभास कराते हैं कि जैसे विभाग में कोई काम ही नहीं हुआ। जैसे बीते सौ साल का प्रशासनिक बोझ उनके कंघों पर आ गया हो।”

लेटर में लिखा गया है कि मंत्री लोकप्रियता और तात्कालिक तालियों की अपेक्षा में राजस्व कर्मियों को जनता के सामने अपमानित कर रहे हैं। लेटर में चेतावनी दी गई है कि अगर इसमें सुधार नहीं हुआ तो संघ ऐसे आयोजनों व गतिविधियों का सामूहिक बहिष्कार करेगा। 

बिहार DGP बोले- “भूमि विवाद में हम नहीं पड़ेंगे”

भूमि विवाद के मामलों पर डिप्टी सीएम सिन्हा की ‘सक्रियता’ के बीच बिहार DGP का एक बयान जानने योग्य है। 9 जनवरी को पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विनय कुमार ने कहा कि- बिहार में 60% अपराध की वजह भूमि विवाद है जो समय पर हल न होने से अक्सर आपराधिक घटनाओं में बदल जाते हैं। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था के तहत जमीन विवादों का निपटारा किया जाएगा, हम इसमें सीधे हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
उनका कहना है कि पुलिस के पास खतियान, नक्शा या अद्यतन राजस्व रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते, जिससे उनके लिए विवाद का निष्पक्ष समाधान कर पाना मुश्किल होता है।

डिप्टी सीएम सिन्हा के तेबर को कैसे देखते विशेषज्ञ

बिहार में नीतीश जैसा नेता बनाने की चाह –

इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को जदयू से ज्यादा सीटें मिलीं, पर अब भी उनके पास नीतीश कुमार जैसी एक मास अपील वाला कोई नेता राज्य में नहीं है। ऐसे में डिप्टी सीएम सिन्हा अपनी जनसुनवाई के जरिए जमीन मालिक व गरीब किसानों को साधने की कोशिश करते नज़र आते हैं, जो भाजपा का वोटबैंक भी है।

बीजेपी है बिग ब्रदर

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में भूमि सुधार एक बड़ी समस्या है, इसे नई सरकार में तुरंत उठाकर भाजपा यह दर्शाना चाहती है कि सरकार में उनका ‘अपरहैंड’ है। कई मौकों पर जदयू कहती रही है कि NDA में वह बड़े भाई की भूमिका में है पर हालिया चुनावों में ज्यादा सीटें पाने के बाद भाजपा ने यह भूमिका अख्तियार कर ली है।


जमीन पर क्या होगा असर ?

  • पुरानी फाइलें खुलने और मौके पर मंत्री से भरोसा मिलने से आम जनता को कुछ उम्मीद तो बंधी है। हालांकि इसका असर लॉन्ग टर्म में सामने आएगा।
  • पुलिस महानिदेशक ने जिस तरह कहा है कि जमीन मामलों में पुलिस सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगी, इससे किसी आदेश को लागू करवाने में समस्या पैदा हो सकती है।

बिहार में कितनी बड़ी है भूमि विवाद समस्या ?

बिहार में भूमि विवाद के कितने मामले लंबित हैं, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। पर विशेष मानते हैं कि यह संख्या लाखों में है। इसमें वे केस शामिल हैं जो अदालत में लटके हुए हैं, इसके अलावा जमीन विवाद के चलते हत्या व अन्य अपराध के केस और हाल तक जारी भूमि सर्वे के चलते पैदा हुए नए भूमि विवादों ने इनकी संख्या काफी बढ़ा दी है।

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चुनावी डायरी

बिहार में किसके वोट कहां शिफ्ट हुए? महिला, मुस्लिम, SC–EBC के वोटिंग पैटर्न ने कैसे बदल दिया नतीजा?

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नीतीश कुमार 9 बार सीएम बन चुके हैं और इस बार भी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और अप्रत्याशित जीत मिली।
नीतीश कुमार 9 बार सीएम बन चुके हैं और इस बार भी उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और अप्रत्याशित जीत मिली।
  • महागठबंधन का वोट शेयर प्रभावित नहीं हुआ पर अति पिछड़ा, महिला व युवा वोटर उन पर विश्वास नहीं दिखा सके।

नई दिल्ली| महक अरोड़ा

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने साफ कर दिया है कि इस बार की लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं थी—बल्कि वोटिंग पैटर्न, नए सामाजिक समीकरण, और वोट के सूक्ष्म बदलावों की थी।

कई इलाकों में वोट शेयर में बड़ा बदलाव नहीं दिखा, लेकिन सीटें बहुत ज्यादा पलट गईं। यही वजह रही कि महागठबंधन (MGB) का वोट शेयर सिर्फ 1.5% गिरा, लेकिन उसकी सीटें 110 से घटकर 35 पर आ गईं।

दूसरी ओर, NDA की रणनीति ने महिलाओं, SC-EBC और Seemanchal के वोट पैटर्न में बड़ा सेंध लगाई, जो इस प्रचंड बहुमत (massive mandate) की असली वजह माना जा रहा है।

 

महिला वोटर बनीं Kingmaker, NDA का वोट शेयर बढ़ाया

बिहार में इस बार महिलाओं ने 8.8% ज्यादा रिकॉर्ड मतदान किया:

  • महिला वोटिंग: 71.78%
  • पुरुष वोटिंग: 62.98%

(स्रोत- चुनाव आयोग)

महिला वोटर वर्ग के बढ़े हुए मतदान का सीधा फायदा NDA विशेषकर जदयू को हुआ, जिसने पिछली बार 43 सीटें जीती और इस बार 85 सीटों से दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी।


 

वोट शेयर का गणित — MGB का वोट कम नहीं हुआ, पर सीटें ढह गईं

  • NDA Vote share: 46.5%
    MGB Vote share: 37.6%

2020 की तुलना में: 9.26% ज्यादा वोट NDA को पड़ा

  •  NDA के वोट share में बड़ी बढ़त – 37.26%
  •  MGB का वोट share सिर्फ 1.5% गिरा – 38.75%
  •  पर महागठबंधन की सीटें 110 → 35 हो गईं

(स्रोत- चुनाव आयोग)

यानी इस चुनाव में महागठबंधन का वोट प्रतिशत लगभग बराबर रहा पर वे वोट शेयर को सीटों में नहीं बदल सके।

यह चुनाव vote consolidation + social engineering + seat-level micro strategy का चुनाव था।


 

SC वोटर ने NDA का रुख किया — 40 SC/ST सीटों में 34 NDA के खाते में

बिहार की 40 आरक्षित सीटों (38 SC + 2 ST) में NDA ने लगभग क्लीन स्वीप किया:

  •  NDA: 34 सीट
  •  MGB: 4 सीट (2020 में NDA = 21 सीट)

(स्रोत- द इंडियन एक्सप्रेस)

सबसे मजबूत प्रदर्शन JDU ने किया—16 में से 13 SC सीटें जीतीं। BJP ने 12 में से सभी 12 सीटें जीत लीं।

वहीं महागठबंधन के लिए यह सबसे खराब प्रदर्शन रहा — RJD 20 SC सीटों पर लड़कर भी सिर्फ 4 ला सकी।

RJD का वोट शेयर SC सीटों में सबसे ज्यादा (21.75%) रहा, लेकिन सीटें नहीं मिल सकीं।

वोट share और seat conversion में यह सबसे बड़ा असंतुलन रहा।


 

मुस्लिम वोट MGB और AIMIM के चलते बंटा, NDA को फायदा हुआ

सीमांचल – NDA ने 24 में से 14 सीटें जीत लीं

सीमांचल (Purnia, Araria, Katihar, Kishanganj) की 24 सीटों पर इस बार सबसे दिलचस्प तस्वीर दिखी।

मुस्लिम वोट महागठबंधन और AIMIM में बंट गए, और इसका सीधा फायदा NDA को मिला।

  • NDA: 14 सीट
  • JDU: 5
  • AIMIM: 5
  • INC: 4
  • RJD: सिर्फ 1
  • LJP(RV): 1

 

सबसे कम मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचेंगे – सूबे में 17.7% मुस्लिम आबादी के बावजूद इस बार सिर्फ 10 मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचे — 1990 के बाद सबसे कम।

  • यह NDA की सामाजिक इंजीनियरिंग, EBC–Hindu consolidation और मुस्लिम वोटों के बंटवारे का संयुक्त परिणाम है।
  • EBC–अति पिछड़ा वोट NDA के साथ गया — MGB की सबसे बड़ी हार की वजह
  • अतिपिछड़ा वर्ग (EBC) बिहार में सबसे बड़ा वोट बैंक है। इस बार ये पूरा वोट NDA के पक्ष में चला गया।
  • JDU की परंपरागत पकड़ + BJP का Welfare Model मिलकर EBC वर्ग में मजबूत प्रभाव डाल गए।
  • यही वोट EBC बेल्ट (मिथिला, मगध, कोसी) में NDA को करारी बढ़त देने का कारण बना।

 


 

रिकॉर्ड संख्या में निर्दलीय लड़े पर नहीं जीत सके

Independent उम्मीदवारों की रिकॉर्ड संख्या — 925 में से 915 की जमानत जब्त

इस चुनाव में:

  •  कुल उम्मीदवार: 2616
  •  Independent: 925
  •  जमानत ज़ब्त: 915 (98.9%)

ECI ने ज़ब्त हुई जमानतों से 2.12 करोड़ रुपये कमाए

 

क्यों इतने Independent मैदान में उतरे?
1. पार्टियों ने पुराने नेताओं के टिकट काटे
2. कई स्थानीय नेताओं ने बगावत कर दी
3. कई सीटों पर बिखराव की वजह बने

VIP, CPI, AIMIM, RJD, INC – हर पार्टी के बड़ी संख्या में उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई।

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