आज के अखबार
पलायन कर रहे प्रवासियों को राहत : छोटे गैस सिलेंडरों की बिक्री में तेजी लायी सरकार
नई दिल्ली| दूसरे शहरों या राज्यों में पढ़ाई या नौकरी के चलते रह रहे लोगों को रसोई गैस की सबसे ज्यादा कमी का सामना करना पड़ रहा है। इसके चलते दिल्ली जैसे मेट्रो शहरों से यूपी-बिहार के प्रवासियों के घर लौटने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।
इस समस्या का हल निकालते हुए केंद्र सरकार ने निवास स्थान की शर्त को हटाते हुए पांच किलो के छोटे रसोई गैस सिलेंडर बेचने की गति बढ़ा दी है। ये सिलेंडर किसी भी गैस एजेंसी पर पहचान पत्र दिखाकर लिए जा सकते हैं।
6 लाख से ज्यादा छोटे सिलेंडर बिके
दैनिक जागरण ने इस खबर को पहले पन्ने पर लिया है। खबर में बताया है कि केंद्र सरकार ने 23 मार्च से बीती चार अप्रैल तक पांच किलो वाले एलपीजी गैस 6.6 लाख से ज्यादा सिलेंडर बेचे हैं।
हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक, दिल्ली सरकार ने भी कहा है कि प्रवासियों को राहत दिलाने के लिए सभी शहरों की गैस एजेंसियों पर ऐसे छोटे रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। जिन्हें मान्य प्रमाणपत्र दिखाकर खरीदा जा सकता है।
उपभोक्ता को देना होगा शपथ पत्र
ऑल इंडिया एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन के अध्यक्ष चंद्र प्रकाश के हवाले से एएनआई ने बताया है कि 5 किलो वाले सिलेंडर का वितरण करते समय उपभोक्ता से एक शपथ पत्र भी लिया जाएगा कि वे सिर्फ भोजन बनाने में ही सिलेंडर का उपयोग करेंगे।
दिल्ली छोड़कर यूपी-बिहार जा रहे प्रवासी
उधर, द हिन्दू ने छह अप्रैल के संस्करण में अखबार ने रिपोर्ट किया है कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सैंकड़ों की संख्या में प्रवासी मज़दूर अपने घरों को लौट रहे हैं।
ज़्यादातर लोगों का कहना है कि उन्हें समय पर रसोई गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा या ब्लैक मार्केट में गैस के दाम इतने महंगे हो चुके हैं कि वे उसका खर्चा नहीं उठा सकते।
साथ ही, एक अधिकारी के हवाले से बताया है कि यहां से हर दिन कम से कम पाँच लाख ट्रेन लेकर रवाना होते हैं। इसमें ज़्यादातर यूपी, बिहार को जाने वाले हैं, इसके अलावा हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा व दक्षिणी राज्यों को जाते हैं।
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मीडिया रिपोर्ट : अमेरिका-ईरान के बीच समझौता कराने में मध्यस्थता की कोशिश कर रहा पाकिस्तान
- पाक की ओर से इस्लामाबाद को मध्यस्थता की जगह के तौर पर प्रस्तावित किया गया है।
नई दिल्ली | अमेरिका व ईरान के बीच समझौता कराने के लिए पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। ब्रिटेन के दैनिक समाचार पत्र ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ ने सोमवार को अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है।
साथ ही, पाकिस्तान के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ‘डॉन’ ने भी सोमवार को एक अधिकारी के हवाले से पुष्टि की है कि पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के साथ मिलकर अमेरिका और ईरान के बीच खाई को पाटने के लिए “सक्रिय बैक-चैनल डिप्लोमेसी” (परोक्ष कूटनीति) में लगा हुआ है।
साथ ही कहा गया है कि इस तिकड़ी (पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र) के प्रयासों से ही 23 मार्च को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के परमाणु ठिकाने पर हमला करने की अपनी रणनीति को पांच दिनों के लिए टाल दिया।
ट्रंप और असीम मुनीर के बीच वार्ता
दोनों रिपोर्ट में बताया गया है कि इसी सिलसिले में पाकिस्तान के थल सेना अध्यक्ष फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने रविवार (22 मार्च) को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत की थी।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने वार्ता के लिए एक संभावित स्थल के रूप में इस्लामाबाद को प्रस्तावित किया है। यह भी माना जा रहा है कि इस वार्ता के लिए ट्रंप प्रशासन और ईरान के वरिष्ठ अधिकारी पाकिस्तान आ सकते हैं।
पाक पीएम ने ईरानी राष्ट्रपति को फोन मिलाया
दूसरी ओर, पाक के प्रधानमंत्री मुहम्मद शहबाज शरीफ ने सोमवार (23 मार्च) को ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ बातचीत की है। इन सभी घटनाक्रमों को युद्ध में पाक की मध्यस्थता के प्रस्ताव से जोड़कर देखा जा रहा है।
अब तक क्या रहा पाक का स्टैंड?
गौरतलब है कि पाकिस्तान ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की मौत पर शोक जताया था।
दूसरी ओर, पाक का सऊदी अरब से साथ द्विपक्षीय सैन्य रक्षा समझौता होने के बाद भी ईरान की ओर से किए गए हमलों की प्रतिक्रिया में सऊदी को सैन्य मदद नहीं भेजी। हालांकि खाड़ी देशों पर हुए हमलों की भी निंदा की।
दूसरी ओर, पाक सैन्य प्रमुख के अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ जारी नजदीकी संबंध सार्वजनिक हैं। इसके बावजूद, संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के राजदूत ने अमेरिकी हमले की निंदा की थी।
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अमेरिकी मीडिया का दावा- ‘ईरान को खुफिया मदद दे रहा रूस’
- दावा है कि रूसी खुफिया मदद से ईरान अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना पा रहा है।
नई दिल्ली| अमेरिकी मीडिया ने 7 मार्च को दावा किया है कि रूस ईरान को ऐसी खुफिया जानकारी उपलब्ध करवा रहा है, जिसके जरिए वह पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य ठिकानों, अमेरिकी लड़ाकू विमानों व अन्य अमेरिकी संपत्तियों पर हमला कर पा रहा है। रूसी मीडिया ने लिखा है कि अमेरिकी मीडिया के इस दावे पर रूस सरकार ने सीधे कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
लेकिन रूसी राष्ट्रपति पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने 5 मार्च को बयान दिया था कि ईरान ने उससे कोई सैन्य मदद नहीं मांगी है।
दावा- ‘हमले से ईरानी क्षमता घटी इसलिए मदद मांगी’
अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट व अमेरिकी समाचार एजेंसी एसोसिएट प्रेस (AP) ने अपनी रिपोर्ट में ऐसा दावा किया है। दोनों मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले हफ्ते अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हुए हमलों के बाद ईरानी सेना की अमेरिकी ठिकानों का पता लगाने की क्षमता कमजोर हो गई है। इसके बाद ईरान इसका पता लगाने के लिए रूस की मदद ले रहा है।
‘रूस की खुफिया जानकारी से हमले कर पा रहा’
वॉशिंगटन पोस्ट ने तीन अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा है कि रूस ईरान को ऐसी टारगेटिंग इंटेलिजेंस दे रहा है, जिससे वह अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना सके।
एसोसिएट प्रेस की रिपोर्ट में अमेरिकी खुफिया विभाग के दो अधिकारियों के हवाले से यही दावा किया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पश्चिम एशिया क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों के अलावा, अमेरिकी हवाई जहाज व अन्य संपत्तियों पर भी ईरान इसलिए हमला कर पा रहा है क्योंकि उनकी लोकेशन पता करने में रूस मदद कर रहा है।
व्हाइट हाउस की प्रतिक्रिया जानिए
एपी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति आवास ने इन दावों को कमतर आंका है। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट ने शुक्रवार (6 march) को इन रिपोर्टों पर कहा, “इससे साफ तौर पर ईरान में चल रहे हमारे सैन्य अभियानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि हम उन्हें पूरी तरह तबाह कर रहे हैं।”
साथ ही, व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी लेविट ने पत्रकारों को यह बताने से इनकार कर दिया कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से कथित खुफिया जानकारी साझा करने के बारे में बात की या नहीं? उन्होंने कहा कि वे चाहती हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप खुद ही इस पर बोलें।
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