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बिहार

मज़दूर दिवस: जहानाबाद में पेट की भूख के आगे ‘हक़’ बेमानी, छुट्टी के दिन भी पसीना बहाने को मजबूर श्रमिक

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जहानाबाद | शिवा केशरी

दुनिया भर में 1 मई को मज़दूरों के अधिकारों और उनके संघर्षों का जश्न मनाया जा रहा है। लेकिन बिहार के जहानाबाद में रेल रैक से सीमेंट उतार रहे श्रमिकों के लिए यह दिन किसी भी अन्य सामान्य कार्यदिवस जैसा ही है।

 शुक्रवार, एक मई की सुबह करीब 10 बजे जब शहर मई दिवस के कार्यक्रमों की तैयारी कर रहा था, तब माल गोदाम पर दर्जनों मज़दूर भारी सीमेंट की बोरियां ढोते नज़र आए।

इन श्रमिकों के लिए ‘मज़दूर दिवस’ का अर्थ अधिकारों का उत्सव नहीं, बल्कि दो वक्त की रोटी का जुगाड़ है।

‘नो वर्क, नो पे’ की मजबूरी

आज के दौर में किसी भी सामाजिक वर्ग के व्यक्ति के लिए नौकरी या मज़दूरी करना एक अनिवार्य मजबूरी बन गया है। विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र में लागू ‘नो वर्क, नो पे’ (काम नहीं तो पैसा नहीं) का सिस्टम।

यह व्यवस्था इन श्रमिकों को एक दिन की भी छुट्टी लेने की अनुमति नहीं देती। दैनिक मज़दूरी पर निर्भर इन परिवारों के लिए एक दिन का आराम, शाम के चूल्हे को ठंडा कर सकता है।

सीमेंट अनलोड कर रहे एक मजदूर ने कहा कि अगर छुट्टी कर लेंगे तो घर में आज चूल्हा कैसे जलेगा।

क्यों मनाया जाता है मई दिवस?

1 मई 1886 को अमेरिका के शिकागो में हज़ारों मज़दूरों ने काम के आठ घंटे तय करने की मांग को लेकर हड़ताल की थी। इस दौरान हिंसा हुई।

इन मज़दूरों के बलिदान की याद में 1889 में ‘अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन’ ने 1 मई को मज़दूर दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। भारत में इसकी शुरुआत 1 मई 1923 को चेन्नई यानी तब के मद्रास से हुई थी।