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रिपोर्टर की डायरी

बिहार की अनोखी होली: कहीं घमौर होली तो कहीं बरिऔरा होली के रंग

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(नोट – इस खबर को वीडियो में देखने के लिए इस लिंक पर जाएं।) 

पटना | बिहार के अलग-अलग इलाकों में होली अलग-अलग रूपों में मनाई जा रही है। होली के त्योहार की शुरुआत इस बार 2 मार्च की रात होलिका दहन से हो चुकी है। तीन मार्च को गांव-देहात में धुरखेली जैसी परंपरा के तहत धूल-कीचड़ से होली खेली जा रही है। 4 मार्च को रंगों की होली खेली जाएगी।  बता दें कि होली के आगमन के पहले बसंत पंचमी के दिन से बिहार में फगुआ गायन की समृद्ध परंपरा रही है।

बिहार के गांवों में होलिका दहन के लिए घर-घर से चंदा के रूप में गोइठा मांगने की प्राचीन परंपरा है जो आज भी गांवों में सामाजिक सहयोग के रूप में प्रचलित है । इस परंपरा के तहत युवा व बच्चों की टोली गांव में बोरियां लेकर घूमती और हर घर जाकर चंदा के रूप में गोइठा मांगती हैं। दरभंगा के ग्रामीण इलाकों में डंफा बजाकर  पारंपरिक होली गीत गाने की परंपरा है। भागलपुर में भस्म से होली खेलने की परंपरा है। सहरसा के पश्चिम कहरा प्रखंड के बनगांव की घमौर होली मनाई जाती है। इस होली में लोग एक-दूसरे के कंधे पर सवार होकर जोर आजमाइश करते नजर आते हैं। पटना से सटे दानापुर और आसपास के इलाकों में बसिऔरा होली मनाई जाती है, खास बात यह है कि यह रंग की होली के अगले दिन मनाई जाती है।

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।

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