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रिपोर्टर की डायरी

रोहतास(बिहार) : गैस एजेंसी के आगे रातभर लाइन में खाली सिलेंडर लिए लगे रहे लोग, आधे से ज्यादा निराश लौटे

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खाली सिलेंडर लेकर लोग रात में ही लाइन में लग गए और अगली दोपहर को सिलेंडर बंटने शुरू हुए।

सासाराम | अविनाश कुमार श्रीवास्तव

बिहार में सरकार लगातार कह रही है कि एलपीजी सिलेंडर की कोई कमी नहीं है लेकिन जमीन पर हालात गंभीर हैं। रोहतास जिले के शहरी इलाके में एचपी की इकलौती गैस एजेंसी पर दो हजार लोग खाली सिलेंडर लिए रातभर लंबी लाइनों में खड़े रहे।

हंगामे की संभावना देखते हुए अगले दिन सुबह एडीएम मौके पर पहुंचीं और लोगों से कहा कि वे आगे से लाइन में न लगें, सिलेंडर सीधे उनके घर में डिलीवर होगा। 18 मार्च को कई घंटों के इंतजार के बाद लाइन में लगे मात्र 504 लोगों को ही सिलेंडर मिल पाया।

बाकी करीब 1500 लोगों को उदास होकर लौटना पड़ा, करीब 500 किलोमीटर लंबी लाइन में खड़े लोग लगातार बता रहे थे कि गैस खत्म हो जाने से वे परेशान हैं। कइयों ने बताया कि उनके घर में दो टाइम का खाना नहीं बन पा रहा है। सासाराम की एचपी गैस एजेंसी से 23 हजार उपभोक्ता जुड़े हैं।

नगर थाना क्षेत्र के अटखम्भावा मोहल्ले में स्थित शारदा देवी एचपी डिस्ट्रीब्यूटर के कार्यालय के सामने लोगों की कतारें 17 मार्च की शात सात बजे से लगना शुरू हुईं। लोगों का कहना था कि बीते 14 मार्च को जब सिलेंडरों का ट्रक आया था तो उसके वितरण में काफी धांधली हुई इसलिए हर कोई सबसे पहले पहुंचकर सिलेंडर लेने की कोशिश में लाइन में जाकर लगा। सिलेंडर लेने की लाइन में लगे लोगों में से ज्यादातर ने इसकी बुकिंग 9 से 11 मार्च के बीच की थी और उन्हें नियमानुसार तीन दिन के भीतर सिलेंडर नहीं मिला था।

 

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भागलपुर : अदाणी पावर प्रोजेक्ट में जमीन चली गई, बेघर होने की कगार पर खड़े आदिवासी

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पीरपैंती प्रखंड के आदिवासी समुदाय के लोग बेघर होने की कगार पर हैं।
  • भागलपुर में अदाणी पावर प्लांट परियोजना का जमीनी हाल।
  • बेघर होने की कगार पर पहुंचे पहाड़िया जनजाति के आदिवासी।
  • जमीन खाली करने का नोटिस पर पुनर्वास का इंतजाम नहीं।

भागलपुर | अतीश दीपंकर

बिहार में अदाणी पावर प्लांट परियोजना में जमीन जाने के बाद पहाड़िया जनजाति के आदिवासी समुदाय के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है।

भागलपुर जिले के पीरपैंती प्रखंड में 2400 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट बनाने के लिए करीब 1050 एकड़ जमीन पिछले साल राज्य सरकार ने अदाणी समूह को लीज़ पर दी है।

यह जमीन मात्र 1 रूपये सालाना की लीज़ पर दी गई है।

इस प्रखंड के हरिनकोल पहाड़िया टोला और संथाली टोला की जमीन भी इस परियोजना में अधिग्रहित है। इन दोनों टोलों के ग्रामीणों का आरोप है कि उनके रहने की वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना ही उन्हें जमीन खाली करने के लिए नोटिस दिया जा रहा है, जिससे वे बेघर होने के कगार पर पहुंच गए हैं।

बता दें कि पहाड़िया जनजाति बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करने वाला एक प्राचीन, आदिम जनजाति (PVTG) समूह है। ये जनजाति आदिम तरीके से खेती, वनोपज संग्रह और प्रकृति पूजा पर निर्भर है।

इस परियोजना में जमीन जाने से सबसे अधिक पहाड़िया टोलों के लोग पीड़ित हैं। लेकिन अब तक पुनर्वास, रहने की व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं को लेकर कोई ठोस पहल नहीं की गई है।

ग्रामीणों का सवाल है कि घर और जमीन जाने के बाद वे कैसे रहेंगे, क्या खाएंगे, उनके पास पीने के साफ पानी तक का इंतजाम नहीं है और वे अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे?

ग्रामीणों का कहना है कि अगर उनकी समस्याओं का तुरंत समाधान नहीं हुआ तो वे अदानी पावर प्लांट के मुख्य द्वार पर अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू करेंगे। साथ ही, उनका कहना है कि जब तक पुनर्वास की व्यवस्था नहीं होती तब तक वे अपनी अधिग्रहित जमीन खाली नहीं करेंगे।

ग्रामीण रामदेव पहाड़िया, संतोषी हेमरबन, डब्लू मुर्मू और बज्जी मुर्मू  ने बताया कि उन्हें बार-बार घर खाली करने को कहा जा रहा है।

वे इस परियोजना से जुड़ी जनसुनवाई में जाकर कई बार अपनी बात रख चुके हैं कि हम बेघर हो जाएंगे, हमारे रहने का इंतजाम किया जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि अफसर उन्हें हर बार आश्वासन देते हैं कि घर बनाने के लिए जमीन दी जाएगी। साथ ही ग्रामीणों ने कब्रिस्तान के लिए भी जगह मांगी है, जिस पर आश्वासन मिला है। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि अब तक कोई उनके घरों की गिनती तक करने नहीं आया है, वे कैसे मान लें कि वादा पूरा होगा?

फिलहाल ग्रामीणों ने साफ कहा है कि जब तक पुनर्वास, घर बनाने के लिए जमीन, पीने का पानी और बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था नहीं की जाती, तब तक वे अपनी जमीन खाली नहीं करेंगे और जरूरत पड़ने पर अदानी पावर प्लांट के मुख्य द्वार पर अनिश्चितकालीन हड़ताल करेंगे।

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रोहतास (बिहार): DFO बोले- नीलगायों से फसल बचाने के लिए शूटर मिलेंगे; पर 3 साल पुराना नियम सिर्फ कागजी

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  • रोहतास जिले में नीलगायों के चलते फसल बर्बाब हो रही।
  • किसानों को अब तक नहीं मिला सुरक्षा के कानून का लाभ।
  • डीएफओ बोले- परमीशन के बाद ‘शूट’ की जा सकती हैं।

सासाराम | अविनाश श्रीवास्तव

बिहार के रोहतास जिले में नीलगायों से फसल नुकसान की समस्या से किसान कई साल से परेशान हैं पर आज तक इसका कोई ठोस समाधान नहीं हुआ है।
अब फिर जिला वन पदाधिकारी ने दोहराया है कि नीलगायों को किसानों के आवेदन पर मारा जा सकता है ताकि फसलों पर उनका खतरा कम हो जाए। 
लेकिन रोहतास जिले में आज तक किसी किसान ने नीलगाय को मारने के लिए जिला प्रशासन के पास आवेदन नहीं दिया है। इससे साफ होता है कि नियम सिर्फ कागजों में दर्ज हैं, जमीन पर उनका लाभ लेने के लिए किसानों को जागरुक नहीं किया गया है।
नतीजतन किसानों की अपनी फसल बचाने के लिए दिनरात खेतों की रखवाली करनी पड़ती है। फिर भी झुंड में आने वाली नीलगाय उनकी फसलों को नुकसान पहुंचा रही हैं।
नीलगाय की समस्या को देखते हुए साल 2015 में केंद्र सरकार ने बिहार के लिए इसे वर्मिन की श्रेणी में डाल दिया था। इसका मतलब था कि नीलगाय अब संरक्षित जानवर नहीं रहे, अगर ये फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं तो किसान इन्हें बिना वन्य जीव कानून के उल्लंघन के इन्हें मार सकते हैं। यह फैसला किसानों की फसल सुरक्षा के लिए लिया गया था। पर जमीन पर यह लागू नहीं हुआ है। 

 

जिला वन पदाधिकारी स्टालिन फीडल कुमार ने बताया कि सरकार ने 2022 में ही वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम के तहत नुकसान पहुंचाने वाली नीलगायों की हत्या के लिए पंचायत मुखिया को अधिकृत कर दिया है।

यानी पीड़ित किसान नीलगाय को मारने के लिए अपने पंचायत मुखिया को लिखित आवेदन देंगे। मुखिया स्थल का निरीक्षण कर नीलगायों की हत्या का आदेश जारी करेंगे।

इसमें नियम है कि नीलगाय को मारने का काम केवल वन विभाग की ओर से लिस्टेड शूटर ही करेंगे। शूटरों को यह सुनिश्चित करना होगा कि अन्य जानवरों या लोगों को कोई नुकसान न पहुंचे।

DFO ने कहा- बिना अनुमति या गाइडलाइन के नीलगाय मारने पर वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई होगी।

वन पदाधिकारी का यह भी कहना है कि जंगली जानवरों से फसल क्षति के लिए मुआवजे का प्रावधान है। किसान नजदीकी रेंज ऑफिस में सूचना देंगे। वन विभाग की टीम राजस्व अधिकारी के साथ मिलकर नुकसान का आकलन करेगी और रिपोर्ट के आधार पर मुआवजा दिया जाएगा। 

पर असल हालात यह हैं कि किसानों को नीलगाय के फसल खराब करने को लेकर कोई मुआवजा नहीं मिलता है।
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बांका में पुलिस लाइन का खाना बना जहर! 100 से अधिक जवान अचानक पड़े बीमार

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बांका | दीपक कुमार

बिहार के बांका जिला से शुक्रवार को एक बेहद चौंकाने वाली और हृदयविदारक घटना सामने आई है, जहाँ पुलिस लाइन में परोसा गया खाना जवानों के लिए मानो जहर साबित हो गया।

जानकारी के अनुसार, पुलिस लाइन मेस में दोपहर के भोजन के रूप में जवानों को फ्राइड राइस और चना छोला परोसा गया था। ड्यूटी से लौटे जवानों ने जैसे ही यह खाना खाया, कुछ ही देर बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ने लगी।

देखते ही देखते 100 से अधिक पुलिस जवानों को पेट दर्द, उल्टी, जी मिचलाने और दस्त जैसी गंभीर शिकायतें होने लगीं। हालात इतने बिगड़ गए कि पूरे पुलिस लाइन परिसर में अफरा-तफरी मच गई और एम्बुलेंस के सायरन लगातार गूंजने लगे।

बीमार पड़े सभी जवानों को तुरंत इलाज के लिए बांका सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में मरीजों के पहुंचने से अस्पताल में भी हड़कंप मच गया और बेड कम पड़ गए। इसके बाद आनन-फानन में अतिरिक्त बेड और डॉक्टरों की व्यवस्था की गई।

अस्पताल प्रशासन के मुताबिक, फिलहाल सभी जवानों को प्राथमिक उपचार दिया जा रहा है, उन्हें सलाइन चढ़ाया जा रहा है और डॉक्टरों की विशेष टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही है।

इस घटना के बाद पुलिस लाइन मेस में परोसे जाने वाले भोजन की स्वच्छता और गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जवानों के बीच भी इस लापरवाही को लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने जांच के आदेश दे दिए हैं। परोसे गए भोजन के सैंपल को जांच के लिए लैब भेजा जा रहा है, ताकि यह पता चल सके कि आखिर जवानों की तबीयत बिगड़ने की असली वजह क्या थी।

अधिकारियों ने साफ कहा है कि यदि इस मामले में किसी भी तरह की लापरवाही सामने आती है, तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
अब बड़ा सवाल यही है कि देश की सुरक्षा में दिन-रात तैनात रहने वाले जवानों के स्वास्थ्य के साथ इतनी बड़ी लापरवाही आखिर कैसे हो गई?

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