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दुनिया गोल

अमेरिकी खुफिया विभाग का दावा- ‘पाक समेत 5 देशों के मिसाइल कार्यक्रम से अमेरिकी को खतरा’

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नई दिल्ली | अमेरिकी ख़ुफ़िया विभाग की प्रमुख तुलसी गबार्ड ने रूस, चीन, नॉर्थ कोरिया, ईरान और पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रम को ‘अमेरिका के लिए ख़तरा’ बताया है।

अहम बात यह है कि इस सूची में अमेरिकी के चिर प्रतिद्वंदियों के साथ पाकिस्तान को भी शामिल किया गया है जबकि हाल के दिनों में ट्रंप प्रशासन की पाक से नजदीकी देखी गई है।

पाकिस्तान की ‘मिसाइल क्षमता से ख़तरे’ से जुड़ी जानकारी अमेरिकी खुफिया विभाग ने संसदीय कमेटी को दी है। अमेरिकी दावे को पाक ने ख़ारिज़ कर दिया और भारत के मिसाइल कार्यक्रम को लेकर आरोप लगाया है।

हालांकि अमेरिकी खुफिया विभाग ने मिसाइल कार्यक्रम से खतरे वाले देशों में भारत को शामिल नहीं किया है।

पाक के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा, “हमारी रणनीतिक क्षमता पूरी तरह रक्षात्मक है, जिसका मक़सद राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा करना और दक्षिण एशिया में शांति व स्थिरता बनाए रखना है।”

साथ ही बयान में कहा गया है कि

“पाकिस्तान का मिसाइल कार्यक्रम अंतरमहाद्वीपीय दूरी से काफ़ी कम है। यह भारत के ख़िलाफ़ ‘विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध’ की नीति पर आधारित है। इसके उलट, भारत की 12,000 किलोमीटर से ज़्यादा दूरी वाली मिसाइल क्षमता का विकास क्षेत्रीय सुरक्षा से आगे जाता है। जो पड़ोस और बाहरी देशों के लिए चिंता का कारण है।”

अब देखना होगा कि भारत इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है, विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को पाक के मिसाइल कार्यक्रम की क्षमता को लेकर अब ज्यादा सतर्क हो जाना चाहिए।

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।

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ऊर्जा संकट गहराया : इजरायल ने ईरान की गैस फील्ड पर हमला किया, बदले में कतर LNG साइट पर ईरानी हमला

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तेल फील्ड में आग लगने से वैश्विक संकट गहरा गया है। (सांकेतिक तस्वीर)

नई दिल्ली | अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध तीसरे सप्ताह में और भयावह हो गया है। इजरायल ने 18 मार्च को ईरान की गैस फील्ड पर हमला किया जो दुनिया की सबसे बड़ी नेचुरल गैस फ़ील्ड में से एक है। ट्रंप ने कहा है कि इजरायल ने ऐसा गुस्से में आकर किया और अब आगे वह हमले नहीं करेगा।

ईरान ने इस हमले के जवाब में कतर, यूएई और सऊदी अरब की गैस फैसिलिटी को निशाना बनाया है।

कतर की मुख्य एलएनजी प्रोसेसिंग साइट को निशाना बनाया गया जिसने पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट बढ़ा दिया है। कतर का कहना है कि उसके ऊर्जा नेटवर्क के इस अहम हिस्से को भारी नुकसान हुआ है। गौरतलब है कि कतर, भारत व चीन समेत विश्व की 20% नेचुरल गैस की जरूरत को पूरा करता है।

ईरान ने कतर के अलावा सऊदी व यूएई के गैस क्षेत्रों पर भी हमले किये हैं, जिसकी दोनों देशों ने पुष्टि की है। सऊदी अरब ने कहा है कि एक गैस फैसिलिटी पर ड्रोन हमले की कोशिश को उसने नाकाम कर दिया। यूएई ने भी बयान जारी करके कहा है कि उसकी दो गैस फील्ड पर ईरान ने ‘आतंकी हमला’ किया जिसने उसे नाकाम कर दिया है।

इन हमलों को लेकर ईरान ने पहले ही चेतावनी जारी की थी।

इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम एशिया में तनाव को अलग स्तर पर पहुंचा दिया है और वैश्विक ईंधन के दाम बढ़ गए हैं।

यूरोप में तो ईंधन के दामों में 30% की वृद्धि हुई है क्योंकि वह यूक्रेन युद्ध के चलते रूस से ईंधन न खरीदकर कतर पर नेचुरल गैस के लिए निर्भर है।

ईरान के रास लाफ़ान पर हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा

“इज़राइल ने मध्य पूर्व में हुई घटनाओं से क्रोधित होकर ईरान की एक गैस फील्ड पर हमला किया था। अब इसराइल ईरान के साउथ पार्स गैस फ़ील्ड पर हमले नहीं करेगा। लेकिन अगर ईरान ने दोबारा लाफ़ान पर हमला किया तो अमेरिका उसके ऊर्जा ढांचे को बर्बाद कर देगा।”

डोनाल्ड ट्रंप की इस धमकी और ईरान के बदले की कार्रवाई से चलते पश्चिम एशिया का संकट और गहरा गया है।

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पिछले साल ईरान की परमाणु क्षमता नष्ट हो गई थी, उसे दोबारा बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है – अमेरिकी खुफिया निदेशक

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तुलसी गबार्ड भारतीय मूल की हैं।
तुलसी गबार्ड भारतीय मूल की हैं।
नई दिल्ली | पिछले साल इजरायल और ईरान के बीच हुए 12 दिन के युद्ध में ईरान की परमाणु संवर्धन क्षमता नष्ट हो गई थी।  और ईरान अपनी परमाणु क्षमता को दोबारा बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है। यह जानकारी ट्रंप प्रशासन में राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड ने अमेरिका की एक संसदीय कमेटी को दी है।
अपने लिखित बयान में तुलसी गबार्ड ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर जो दावा किया है, वह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के उस दावे के एकदम उलट है, जिसमें वे कहते रहे हैं कि ईरान न्यूक्लियर हथियार बनाने के करीब था इसलिए उन्होंने इजरायल के साथ मिलकर उस पर हमला किया है। 
अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक के इस बयान के बाद घरेलू व अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सवाल मुखर हो गया है कि ट्रंप ने बिना ठोस आधार के ईरान पर आखिर हमला क्यों किया?  
अमेरिकी संसद की ‘सीनेट खुफिया समिति’ को अपने लिखित बयान में तुलसी गबार्ड ने कहा-
“जून 2025 में ईरान के परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमले के बाद ईरान का परमाणु संवर्धन कार्यक्रम पूरी तरह से नष्ट हो गया है। उसके बाद से ईरान ने संवर्धन क्षमता को फिर से बनाने के कोई प्रयास नहीं किए गए हैं।”
यह भी गौरतलब है कि राष्ट्रीय खुफिया निदेशक ने लिखित बयान को मौैखिक रूप से पढ़ते हुए इस हिस्से को छोड़ दिया और विपक्षी सांसदों के पूछे जाने पर बोलीं कि उनके पास बयान पढ़ने का पर्याप्त समय नहीं था। 
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ईरान को झटका : हवाई हमले में राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख की मौत

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नई दिल्ली | इजरायल के भीषण हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख अली लारिजानी की मौत हो गई है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेेंसी रॉयटर्स ने ईरानी मीडिया के हवाले से ऐसा बताया है। एक दिन पहले 14 मार्च को  इजरायल ने ईरानी सुरक्षा प्रमुख की मौत का दावा किया था।

हालिया मौत ने ईरान के नेतृत्व को और कमजोर कर दिया है, फिर भी वह युद्ध में 18 दिनों से अमेरिका-इजरायल को टक्कर दे रहा है। 28 फरवरी को ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को मार दिया गया था। ईरान पर हुए हमलों में अब तक ईरानी रक्षा मंत्री, सुप्रीम लीडर के सलाहकार, हिज़्बुल्लाह संसदीय गुट के प्रमुख, अर्धसैनिक बल के मेजर जनरल और खुफिया विभाग के डिप्टी की मौत हो चुकी है। 

ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि सुरक्षा परिषद प्रमुख अली लारिजानी के साथ उनके बेटे की भी मौत हो गई है। इसके अलावा ईरान के कुलीन अर्धसैनिक बल, बसीज (Basij) के कमांडर मेजर जनरल गुलाम रजा सुलेमानी की भी मौत की खबर है।

पिछले साल बने थे सुरक्षा परिषद के प्रमुख

अली लारिजानी ईरान के सबसे प्रभावशाली धार्मिक और राजनीतिक परिवार का हिस्सा थे। उन्होंने सैन्य और खुफिया तंत्र में मजबूत पकड़ बनाई हुई थी। पिछले साल अगस्त में ही ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का सचिव नियुक्त किया गया था। इसके अलावा उन्हें राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन का कड़ा विरोधी माना जाता है, जिससे ईरान की राजनीति में उनका अलग ही महत्व है।

राष्ट्रपति चुनाव भी लड़ा था

अली लारिजानी 2004 में पहली बार ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की टीम में शामिल हुए। उस वक्त वो उनके सलाहकार के रूप में काम कर रहे थे। उसके बाद साल 2005 में उन्होंने राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा, लेकिन वो सफल नहीं हो पाए और साल 2008 से 2020 तक वो संसद के अध्यक्ष पद पर रहे थे।

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