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ग्रीनलैंड हड़पने को बेसब्र ट्रंप ने 8 यूरोपीय देशों पर लगाया टैरिफ, इस बार मिल रहा कड़ा जवाब, EU की तैयारी जानिए

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ग्रीनलैंड में ट्रंप की धमकियों के खिलाफ हजारों लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया।
ग्रीनलैंड में ट्रंप की धमकियों के खिलाफ हजारों लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया।
  • डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाना चाहते हैं राष्ट्रपति ट्रंप।
नई दिल्ली|
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने से जु़ड़ी अपनी रणनीति को और आक्रामक बनाते हुए आठ यूरोपीय देशों पर ताजा टैरिफ लगाने की घोषणा की है। ट्रंप ने उन देशों पर एक फरवरी से 10% टैरिफ की घोषणा की है जिन्होंने हाल में ग्रीनलैंड के समर्थन में वहां कुछ सैनिक भेजकर संभावित अमेरिकी आक्रमण से निपटने की रणनीति बनाई थी। इन देशों में डेनमार्क, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, स्वीडन, नीदरलैंड्स व फिनलैंड शामिल हैं। इस घोषणा के बाद यूरोपीय संघ ने रविवार(18 जनवरी) को एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई और आगे ग्रीनलैंड में एक संयुक्त सैन्य अभ्यास करने की घोषणा करके ट्रंप को चुनौती दे दी है।

ट्रंप की धमकी- जून तक समझौता नहीं तो टैरिफ बढ़ेगा

ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर 17 जनवरी को पोस्ट में लिखा है कि ग्रीनलैंड, अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है। जो देश इसके खिलाफ हैं, वे अमेरिकी बाजार में एक फरवरी से 10% ज्यादा टैरिफ देंगे। इसमें कोई छूट नहीं मिलेगी। अगर ग्रीनलैंड पर जून तक कोई समझौता नहीं होता है तो इन देशों पर टैरिफ बढ़ाकर 25% तक कर दिया जाएगा। टैरिफ मुख्य रूप से इन देशों के अमेरिकी निर्यात (मशीनरी, फार्मा, फिशरी उत्पाद) पर लगेगा।
ट्रंप ने एक लंबा पोस्ट लिखकर आठ देशों पर आरोप लगाए और टैरिफ की घोषणा की।

ट्रंप ने एक लंबा पोस्ट लिखकर आठ देशों पर आरोप लगाए और टैरिफ की घोषणा की।

8 देशों पर लगा टैरिफ –

ये देश आर्कटिक काउंसिल के सदस्य हैं और ग्रीनलैंड की स्वायत्तता का समर्थन करते हैं।

  • डेनमार्क (ग्रीनलैंड का मालिक देश)
  • नॉर्वे
  • आइसलैंड
  • कनाडा
  • स्वीडन
  • फिनलैंड
  • जर्मनी
  • नीदरलैंड्स

EU ने बुलाई इमरजेंसी मीटिंग

यूरोपीय संघ ने इस टैरिफ को अनुचित बताते हुए एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई है। इस बैठक में यूरोपीय संघ के राजदूत भाग लेंगे।  

ग्रीनलैंड में 8 देशों का सैन्य अभ्यास, संयुक्त बयान जारी 

ग्रीनलैंड के समर्थन वाले यूरोप के आठ देशों ने एक संयुक्त सैन्य अभ्यास किया है, डेनमार्क के विदेश मंत्रालय ने एक साझा बयान जारी कर इसकी जानकारी दी है। इस अभ्यास में डेनमार्क, फ़िनलैंड, फ़्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, नॉर्वे, स्वीडन और ब्रिटेन शामिल हुए।

साझा बयान में कहा गया- , “नेटो सदस्य के रूप में हम एक साझा ट्रांसअटलांटिक हित को देखते हुए आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा को मज़बूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम डेनमार्क और ग्रीनलैंड के लोगों के साथ पूरी एकजुटता से खड़े हैं, पिछले हफ़्ते शुरू हुई प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए हम संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के उन सिद्धांतों के आधार पर बातचीत के लिए तैयार हैं, जिनका हम मज़बूती से समर्थन करते हैं।”

आठ देशों की ओर से संयुक्त बयान जारी किया गया है।

आठ देशों की ओर से संयुक्त बयान जारी किया गया है।

क्या बोले EU ट्रेड कमिश्नर

दूसरी ओर, जर्मन ब्रॉडकास्टर DW ने ट्रंप की टैरिफ घोषणा को लेकर EU ट्रेड कमिश्नर ने प्रतिक्रिया मांगी तो उन्होंने कहा कि “यूरोपीय संघ के नेताओं के बीच इस बारे में परामर्श चल रहा है, हमारे लिए क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता व अंतरराष्ट्रीय कानून बहुत महत्वपूर्ण हैं।”

US-EU व्यापार समझौता लटकेगा

यूरोपीय संघ के सांसदों के हवाले से यूरोपीय मीडिया ने लिखा है कि हालिया टैरिफ घोषणा के बाद अमेरिका व यूरोपीय संघ के बीच हुआ व्यापार समझौता संसद में पास नहीं हो सकेगा। पिछले साल दोनों के बीच व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे और अब यूरोपीय संघ की संसद में इस पर वोटिंग होनी है।

ग्रीनलैंड में ट्रंप के खिलाफ प्रदर्शन

डोनाल्ड ट्रंप की लगातार धमकियों के खिलाफ ग्रीनलैंड और डेनमार्क के लोगों ने बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरकर अमेरिका के खिलाफ प्रदर्शन किया।


 

ट्रंप की धमकी पर यूरोपीय नेताओं की कड़ी प्रतिक्रिया

ग्रीनलैंड विवाद पर ट्रंप की टैरिफ चेतावनी के कुछ घंटे बाद ही यूरोपीय नेताओं ने एकजुट होकर जवाब दिया है। 

ब्रिटेन : सहयोगियों पर ही टैरिफ गलत 

प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा-  “ग्रीनलैंड का भविष्य ग्रीनलैंडवासी और डेनमार्क तय करेंगे। नाटो सहयोगियों की सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपने सहयोगियों पर ही टैरिफ लगाना पूरी तरह गलत है। हम इस मुद्दे पर सीधे अमेरिकी प्रशासन से बात करेंगे।”

डेनमार्क : ट्रंप का बयान चौंकाने वाला

डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन ने कहा है कि “ट्रंप का यह बयान आश्चर्यजनक है, क्योंकि इस हफ्ते हमारी बैठक बहुत रचनात्मक थी।” गौरतलब है कि डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेशमंत्री हाल में अमेरिका में विदेशमंत्री मार्को रुबियो से मिले थे।

फ्रांस : टैरिफ की धमकी का असर नहीं होगा

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि “कोई धमकी या दबाव हमें प्रभावित नहीं करेगा। टैरिफ की धमकी अस्वीकार्य है।”

स्वीडन : यूरोपीय नेता धमकी में नहीं आएंगे 

प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने कहा –“यूरोपीय नेता खुद को ब्लैकमेल नहीं होने देंगे। ट्रंप की धमकी पूरे यूरोपीय संघ के लिए एक मुद्दा है।”

नीदरलैंड्स : एकजुट होकर जवाब देंगे

 विदेश मंत्री डेविड वैन वील ने कहा – “हमने नए टैरिफ की जानकारी ली है और एकजुट जवाब पर विचार कर रहे हैं।” 

फिनलैंड : सहयोगियों के बीच वार्ता हो, दवाब नहीं

राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने कहा- “सहयोगियों के बीच मुद्दे बातचीत से हल किए जाते हैं, दबाव से नहीं।”

नॉर्वे : सहयोगियों के बीच धमकी की जगह नहीं 

प्रधानमंत्री जोनास गार स्टोरे ने कहा- “सहयोगियों के बीच धमकियों के लिए कोई जगह नहीं है।”

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।

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18 साल बाद India-EU मुक्त व्यापार वार्ता पूरी, अगले साल लागू होगा समझौता

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भारत-ईयू शिखर सम्मेलन के दौरान FTA वार्ता संपन्न होने की घोषणा की गई।
भारत-यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार वार्ता पूरी, मगर हस्ताक्षर अभी नहीं। (तस्वीर - X/@vonderleyen)
  • भारत-यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते पर इस साल के अंत तक हो सकते हैं हस्ताक्षर
नई दिल्ली |
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की वार्ता 18 साल चली बातचीत के बाद पूरी हो गई, इसकी घोषणा 27 जनवरी को नई दिल्ली में हुई भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के दौरान की गई। द हिन्दू के मुताबिक, इस समझौते पर हस्ताक्षर इसी साल के अंतिम दौर में हो सकते हैं जबकि समझौता लागू अगले साल की शुरूआत में होने की संभावना है।
मुक्त व्यापार समझौता की वार्ता पूरी होने के दौरान भारत व ईयू के प्रमुख व वाणिज्य मंत्री  (credit - X/@MarosSefcovic)

मुक्त व्यापार समझौता की वार्ता पूरी होने के दौरान भारत व ईयू के प्रमुख व वाणिज्य मंत्री (credit – X/@MarosSefcovic)

FTA को बताया – मदर ऑफ ऑल डील्स

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेन ने भारत आने से पहले इस FTA को “मदर ऑफ ऑल डील्स” (Mother of all deals) कहा था। आज हुए शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि यह नई दिल्ली की अब तक की सबसे बड़ी ट्रेड डील है। यह समझौता दो अरब लोगों के लिए नया बाजार बनाएगा। पीएम मोदी के मुताबिक, इस व्यापार समझौते से दुनिया की 25% GDP और एक-तिहाई वैश्विक व्यापार को लाभ मिलेगा। कई विशेषज्ञ इसे दुनिया की सबसे बड़ी FTA डील बता रहे हैं।
भारत-यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार वार्ता पूरी, मगर हस्ताक्षर अभी नहीं। (तस्वीर - X/@vonderleyen)

भारत-यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार वार्ता पूरी, मगर हस्ताक्षर अभी नहीं। (तस्वीर – X/@vonderleyen)

2007 में शुरू हुई थी FTA वार्ता

यूरोपीय संघ के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते की वार्ता 2007 में शुरू हुई थी जो करीब दो दशक के बाद अब पूरी हो सकी है। भारत व EU के बीच द्विपक्षीय व्यापार 1.24 खरब रुपये (136 बिलियन डॉलर) का है।

भारत-EU ट्रेड – एक नजर में

  • 17% भारतीय सामान यूरोप संघ के देशों में बेचा जाता है।
  • 9% यूरोपीय संघ के देशों का सामान भारतीय बाजार में आता है।
  • 136 बिलियन डॉलर का है भारत-यूरोपीय संघ का द्विपक्षीय व्यापार।

ट्रेड डील का महत्व

  • डील से टैरिफ कम होगा, जिससे भारतीय निर्यात (टेक्सटाइल, फार्मा, आईटी, ऑटो पार्ट्स) बढ़ेगा।
  • EU के लिए भारत में निवेश और बाजार पहुंच आसान होगी।
  • दोनों पक्षों ने कहा कि यह डील वैश्विक व्यापार में स्थिरता लाएगी।
  • भारत में लग्जरी कारों की कीमत कम होगी, यूरोपीय वाइन के दाम घटेंगे।

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शेख हसीना का नई दिल्ली में पहला सार्वजनिक भाषण, बांग्लादेश ने चेताया- ‘द्विपक्षीय संबंध बिगड़ेंगे’

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पूर्व पीएम शेख हसीना
पूर्व पीएम शेख हसीना
  • 23 जनवरी को प्रेस क्लब में बांग्लादेश पीएम शेख हसीना ने एक ऑडियो भाषण दिया था।

नई दिल्ली|

हिन्दू अल्पसंख्यकों की बांग्लादेश में लगातार हो रही हत्या और भारत में टी-20 विश्वकप खेलने से बांग्लादेश के मना करने के बाद दोनों देशों के बीच संबंध सबसे निचले स्तर पर हैं। इस बीच नई दिल्ली में निर्वासित जीवन बिता रहीं बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने पहला सार्वजनिक भाषण दिया, जिस पर बांग्लादेश ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। हालांकि अभी तक इस पर भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया है।

दरअसल 23 जनवरी को दिल्ली के ‘फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया’ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शेख हसीना का एक ऑडियो भाषण चलाया गया। यह भाषण 12 फरवरी को बांग्लादेश में होने वाले आम चुनावों से पहले दिया, जिसमें उन्होंने अंतरिम सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। गौरतलब है कि 78 साल की हसीना अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व वाले विद्रोह के बाद अपना 15 साल का शासन खत्म होने पर भारत भाग गई थीं।

बांग्लादेश बोला- यह हमारे देश का अपमान

बांग्लादेश ने कहा कि हसीना को भाषण देने की इजाजत देना एक खतरनाक मिसाल कायम करेगा जो द्विपक्षीय संबंधों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकता है। मंत्रालय ने कहा,

“भारतीय राजधानी में इस कार्यक्रम को होने देना और नरसंहार करने वाली हसीना को खुलेआम नफरत भरा भाषण देने देना… बांग्लादेश के लोगों और सरकार का साफ अपमान है।”

हसीना के प्रत्यर्पण का भी मुद्दा उठाया

बांग्लादेश विदेश मंत्रालय ने भारत सरकार पर आरोप लगाया कि वह लगातार अनुरोध किए जाने के बाद भी हसीना का प्रत्यर्पण नहीं कर रहा है। बयान में कहा- “बांग्लादेश को इस बात का बहुत दुख है कि भारत ने द्विपक्षीय प्रत्यर्पण समझौते के तहत शेख हसीना को सौंपने की अपनी जिम्मेदारियों पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। बांग्लादेश सरकार के बार-बार अनुरोध के बावजूद, उसे इसके बजाय अपनी जमीन से ऐसे भड़काऊ बयान देने की इजाजत दी गई है। यह साफ तौर पर बांग्लादेश के लोकतांत्रिक बदलाव और शांति और सुरक्षा को खतरे में डालता है।”

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अमेरिका में ट्रंप की ICE के खिलाफ फिर सड़कों पर उतरे लोग, जानिए क्या है पूरा मामला

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मिनियापोलिस शहर में ICE एजेंट की हत्या के बाद सड़कों पर उतरे आम लोग।
मिनियापोलिस शहर में ICE एजेंट के गोली मारकर आम अमेरिकी को मार देने के बाद सड़कों पर उतरे लोग, यहां इस समय तापमान 10 सेल्सियस है।
  • मिनियापोलिस शहर में संघीय एजेंटों ने एक महीने में दूसरे अमेरिकी नागरिक को गोली मारकर उसकी हत्या कर दी।
नई दिल्ली |
अमेरिका में एक बार फिर आव्रजन पुलिस बल ICE (U.S. Immigration and Customs Enforcement) के खिलाफ भारी संख्या में लोग सड़क पर उतर आए हैं क्योंकि आईसीई एजेंट ने एक मेडिकल पेशेवर को गोली मारकर 24 जनवरी को उसकी हत्या कर दी। यह घटना अमेरिकी राज्य मिनेसोटा के सबसे बड़े शहर मिनियापोलिस में हुई, मरने वाले व्यक्ति का नाम एलेक्स प्रेटी है जो पेशे से नर्स हैं। इस घटना के बाद इस शहर में भारी विरोध हो रहा है जबकि यहां का तापमान 10 सेल्सियस है। 
गौरतलब है कि इसी महीने ICE ने मिनियापोलिस में ही रेनी गुड नाम की एक महिला को कार न रोकने के चलते गोली मार दी थी। उस मौत के बाद भी आम लोग सड़कों पर उतर आए थे और संघीय बल ICE की तैनाती के खिलाफ जमकर विरोध हुआ था। पर इस संघीय बल की कार्यप्रणाली में कोई अंतर नहीं आया और इसके परिणाम स्वरूप एक और अमेरिकी की मौत हो गई है। 

ICE ने आवासीय इलाके में गोलियां चलाईं, मौके पर मौत

प्रेटी के खिलाफ गोलीबारी की घटना एक आवासीय इलाके में हुई, जहां ICE एजेंट्स किसी ऑपरेशन के दौरान पहुंचे थे। समाचार एजेंसी रॉयर्ट्स ने इस घटना के एक वीडियो के हवाले से बताया है कि 37 वर्षीय एलेक्स प्रेटी के हाथ में एक फोन दिख रहा है, जिससे वह ICE की गतिविधि को फिल्मा रहा है क्योंकि ये एजेंट अन्य प्रदर्शनकारियों को जमीन पर धकेल रहे हैं, इस दौरान वह इन प्रदर्शनकारियों की मदद भी करते दिखते हैं। इसी दौरान एक संघीय एजेंट उन्हें जमीन पर गिरा लेता है, कुछ और एजेंट्स उन्हें पकड़ लेते हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, इसके कुछ ही क्षण बाद एक अधिकारी प्रेटी की पीठ की ओर निशाना साधे हुए दिखता है और तेजी से लगातार चार गोलियां चलाता है, इसके बाद कुछ और गोलियों की आवाज सुनाई देती है, और फुटेज में एक दूसरा एजेंट भी प्रेटी पर गोली चलाता हुआ लगता है।

गृह सुरक्षा मंत्रालय ने ICE का बचाव किया

गृह सुरक्षा मंत्रालय ने इस घटना को एजेंटों पर हमले के जवाब में की गई कार्रवाई बताया। गृह सुरक्षा मंत्री क्रिस्टी नोएम ने पत्रकारों से कहा कि शनिवार को मारा गया व्यक्ति इमिग्रेशन छापे के दौरान एजेंटों पर हमला कर रहा था। संघीय अधिकारियों ने उस बंदूक की तस्वीर भी साझा की, जिसके बारे में उनका कहना है कि प्रेटी उसे गोलीबारी के वक्त साथ लेकर चल रहा था।
गृह सुरक्षा विभाग के मुताबिक,
“एक बॉर्डर पैट्रोल एजेंट ने आत्मरक्षा में गोली चलाई क्योंकि एक व्यक्ति हैंडगन लेकर करीब आया और उसे निहत्था करने की कोशिशों का हिंसक तरीके से विरोध किया।”

नर्स संगठन ने घटना को जघन्य हत्या कहा

एलेक्स प्रेटी पेशे से आईसीयू नर्स थे, उनकी मौत के बाद नर्सों से जुड़ी सबसे बड़ी संस्था नेशनल नर्सेज़ यूनाइटेड ने बयान जारी करके इसे जघन्य हत्या बताया है। संगठन ने कहा है कि

“एलेक्स अपने समुदाय को बचाने की कोशिश कर रहा था, तभी उसकी हत्या कर दी गई। अब वक्त आ चुका है कि ICE को खत्म कर दिया जाए।”

साभार X

साभार X

देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू 

रॉयटर्स के मुताबिक, घटना की जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से फैलते ही सैकड़ों प्रदर्शनकारी उस इलाके में पहुंच गए। प्रदर्शनकारियों ने  हथियारबंद व नकाबपोश एजेंटों की आक्रामकता का सामना किया। केंद्रीय एजेंटों ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और फ्लैश बैंग ग्रेनेड का इस्तेमाल किया। इस घटना के विरोध में न्यूयॉर्क, वाशिंगटन डीसी और सैन फ्रांसिस्को सहित अन्य शहरों में भी प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।

गर्वनर बोले- जांच हम कराएंगे, संघीय सरकार पर भरोसा नहीं

मिनेसोटा के गवर्नर टिम वॉल्ज ने एक बार फिर से केंद्र सरकार से कहा है कि ICE को हटाया जाए। साथ ही उन्होंने कहा कि घटना का वीडियो बताता है कि यह कितना घिनौना कृत्य है। उन्होंने कहा कि हम संघीय सरकार पर इस जांच का नेतृत्व करने के लिए भरोसा नहीं कर सकते। इस घटना की जांच राज्य संभालेगा।

हालांकि DW के मुताबिक, मिनेसोटा ब्यूरो ऑफ क्रिमिनल एप्रीहेंशन के प्रमुख ड्रू इवांस ने पत्रकारों को बताया कि संघीय एजेंटों ने शनिवार को उनकी टीम को जांच शुरू करने से रोक दिया।

रेनी गुड की हत्या मामले की जांच भी लटकी

जनवरी के पहले सप्ताह में हुई रेनी गुड नाम की महिला की हत्या के मामले में भी जांच को लेकर राज्य सरकार सवाल उठा रही है। फेडरल एजेंट्स ने चलती गाड़ी न रोकने को लेकर रेनी के ऊपर गोलियां चला दी थी, जिसमें उसकी मौत हो गई थी। इसके बाद प्रदर्शन हुए तो दवाब में आकर संघीय सरकार ने जांच कराने के आदेश दे दिए मगर इस जांच में राज्य सरकार को शामिल नहीं किया। इसके बाद लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या इस मामलेे में ट्रंप प्रशासन उस ICE को दोषी ठहरा पाएगा जिसका बचाव वह लगातार करता आ रहा है?


क्या है ICE, इनकी शक्तियां ?

आईसीई का पूरा नाम ‘आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन एजेंसी’ है। इस एजेंसी में काम करने वाले एजेंट्स, अमेरिका के संघीय कानून प्रवर्तन अधिकारी (Federal Law Enforcement Officers) हैं। ये होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के तहत आते हैं। इनका काम देश में अवैध रूप से रहने वाले विदेशियों की पहचान करने, उन्हें हिरासत में लेने और निर्वासित (deport) करना है। ट्रंप के दूसरे शासनकाल में इनकी शक्तियों और भूमिका में इजाफा हुआ है क्योंकि संघीय सरकार के लिए अवैध प्रवासन एक राजनीतिक मुद्दा है, जिसके बल पर वह दोबारा सत्ता में आई। इनके पास शक के आधार पर किसी को हिरासत में लेने का अधिकार है।

शक के आधार पर आम अमेरिकी भी प्रताड़ित

प्रोपब्लिका नामक सामाजिक संगठन के मुताबिक, पिछले साल अक्तूबर तक 170 ऐसे मामले सामने आए जब ICE एजेंटों ने आम अमेरिकी नागरिकों को अवैध प्रवासी होने के शक में हिरासत में लेकर प्रताड़ित किया।

 

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