दुनिया गोल
7 साल बाद US पहुंचे सऊदी क्राउन प्रिंस को मीडिया से सवालों से ट्रंप ने क्यों बचाया?
- अमेरिकी अखबार के पत्रकार जमाल खशोगी की 2018 में हुई के बाद सऊदी राजकुमार की पहली अमेरिकी यात्रा।
नई दिल्ली |
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Mohammed Bin Salman – MBS) 7 साल बाद अपनी पहली आधिकारिक यात्रा (Official Visit) पर मंगलवार (18 nov) को अमेरिका पहुंचे, जहां व्हाइट हाउस (White House) में उनका भव्य स्वागत किया गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने इस मौके पर एक बड़ा ऐलान करते हुए सऊदी अरब को ‘प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी’ (Major Non-NATO Ally – MNNA) का दर्जा देने की घोषणा की।
सऊदी अरब के राजकुमार की अमेरिकी यात्रा की अहमियत को इससे समझा जा सकता है कि ओवल ऑफिस में जब उनसे अमेरिकी मीडिया ने कड़े सवाल पूछने शुरू किए तो राष्ट्रपति ट्रंप नाराज हो गए और उन्होंने कहा एक चैनल को ‘फेक न्यूज’ (Fake News) फैलाने वाला कह डाला।
US का 19वां ‘गैर-नाटो सहयोगी’ बना सऊदी
ट्रंप ने व्हाइट हाउस में आयोजित ब्लैक-टाई डिनर (Black-Tie Dinner) के दौरान कहा कि सऊदी अरब अब अमेरिका के उन 19 विशेष सहयोगी देशों (Strategic Allies) की सूची में शामिल हो गया है, जिनमें इजरायल, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश हैं। इस दर्जे का मतलब है कि अब सऊदी अरब को अमेरिकी सैन्य हार्डवेयर (US Military Hardware) और उन्नत हथियारों (Advanced Weapons) तक त्वरित पहुंच मिलेगी।
हालांकि, इस समझौते में नाटो सहयोगियों की तरह सुरक्षा की गारंटी(Security Guarantee) शामिल नहीं है, लेकिन यह सऊदी अरब को अमेरिकी हथियारों के भंडारण और रखरखाव (Arms Storage & Maintenance Hub) के लिए एक प्रमुख केंद्र बना देगा।
इजरायल-सऊदी के रिश्ते सुधरवाना है प्राथमिकता
बैठक के दौरान ट्रंप ने सऊदी अरब और इजरायल के बीच संबंधों को सामान्य करने (Normalization Talks) पर जोर दिया। ट्रंप चाहते हैं कि सऊदी अरब भी अब्राहम समझौते (Abraham Accords) में शामिल हो। क्राउन प्रिंस ने कहा कि वे सभी मध्य पूर्वी देशों के साथ अच्छे संबंध चाहते हैं, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि इजरायल के साथ सामान्यीकरण के लिए फलस्तीनी राज्य का निर्माण (Palestinian State) एक जरूरी शर्त होगी। दोनों नेताओं ने इस मुद्दे पर आगे काम करने और दो-राज्य समाधान (Two-State Solution) का रास्ता तैयार करने पर सहमति जताई।
प्रिंस सलमान से कड़े सवालों से भड़के ट्रंप
प्रेस कॉन्फ्रेंस (Press Conference) के दौरान माहौल तब तनावपूर्ण हो गया जब पत्रकारों ने कड़े सवाल पूछने शुरू किए। एबीसी न्यूज (ABC News Reporter) की रिपोर्टर ने जब अमेरिकी अखबार के पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या और 9/11 हमलों में सऊदी अरब की भूमिका पर सवाल उठाया, तो ट्रंप ने इसे खारिज कर दिया। उन्होंने रिपोर्टर को डांटते हुए कहा कि वे मेहमान को शर्मिंदा कर रही हैं और एबीसी को ‘फेक न्यूज’ करार दिया।
खशोगी और 9/11 पर प्रिंस की सफाई
क्राउन प्रिंस ने 9/11 के सवाल पर बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ओसामा बिन लादेन ने सऊदी लोगों का इस्तेमाल सिर्फ अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों (US-Saudi Relations) को खराब करने के लिए किया था। खशोगी मामले पर उन्होंने कहा कि यह एक दर्दनाक और गैर-कानूनी घटना (Unlawful Incident) थी, जिसके बाद उन्होंने अपने सिस्टम में सुधार (System Reforms) किया है ताकि ऐसी गलती दोबारा न हो। गौरतलब है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने माना था कि पत्रकार खशोगी की हत्या का आदेश खुद प्रिंस सलमान ने दिया था।
अमेरिका के लिए सऊदी क्यों जरूरी है?
अमेरिका के लिए सऊदी अरब सिर्फ तेल का कुआं नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक साझेदार (Economic Partner)भी है।
1.ऊर्जा बाजार में पकड़: भले ही अमेरिका को अब सऊदी तेल की उतनी जरूरत न हो, लेकिन सऊदी की सरकारी कंपनी अरामको (Saudi Aramco) अमेरिका में कई बड़ी रिफाइनरियों की मालिक है। टेक्सास के पोर्ट आर्थर में स्थित अमेरिका की सबसे बड़ी रिफाइनरी (Largest US Refinery) अरामको की ही है। इसके अलावा, अमेरिका के कई राज्यों में शेल ब्रांड (Shell Gas Stations) के पेट्रोल पंपों पर अरामको का ही नियंत्रण है।
2.हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार: सऊदी अरब अमेरिकी हथियारों का सबसे बड़ा ग्राहक है। ट्रंप प्रशासन ने मई 2017 में ही रियाद के साथ 110 अरब डॉलर के हथियार सौदे (Arms Deal – $110 Billion) पर हस्ताक्षर किए थे। अमेरिकी एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर (Aerospace & Defense Industry) लाखों लोगों को रोजगार देता है, और सऊदी अरब के ऑर्डर इस उद्योग की रीढ़ हैं।
3.आर्थिक निवेश: सऊदी अरब ने अमेरिकी कंपनियों और शेयर बाजार (US Stock Market) में भारी निवेश किया है। उनका सॉवरेन वेल्थ फंड ‘पीआईएफ’ (Public Investment Fund – PIF) उबर और मैजिक लीप जैसी अमेरिकी टेक कंपनियों (US Tech Companies) में बड़े हिस्सेदार के तौर पर मौजूद है।
written by Mahak Arora (content writer)
दुनिया गोल
ट्रंप ने गज़ा शांति योजना का Phase-2 किया जारी, जानिए अंतरिम सरकार कैसे शांति लाएगी?
- गजा में नया प्रशासन NCAG बनेगा, हमास पर सख्ती बढ़ेगी।
गज़ा में हथियारबंद लोग पूरी तरह हटाए जाएंगे
अस्थायी प्रशासनिक समिति बनेगी, 15 सदस्य होंगे
‘बोर्ड ऑफ पीस’ को लेकर घोषणा जल्द
योजना का पहला चरण अमेरिका की नजर में सफल
- ट्रंप प्रशासन ने दावा किया कि फेज वन में ऐतिहासिक मानवीय सहायता (Humanitarian Aid) पहुंचाई गई।
- अमेरिका का दावा है कि गज़ा में सीजफायर कायम रहा।
- सभी जीवित बंधकों को वापस लाया गया, साथ ही 28 मृत बंधकों में से 27 के शव वापस लाए जा चुके हैं।
- अमेरिका ने मिस्र, तुर्की और कतर को मध्यस्थता के लिए धन्यवाद दिया।
गज़ा के असल हालात : संघर्ष विराम के बाद 442 मौतें
फिलिस्तीन के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, बीते 11 अक्तूबर को गज़ा में संघर्ष विराम लागू हुआ, तब से यहां 442 लोग मारे जा चुके हैं और 1236 लोग घायल हो चुके हैं। गज़ा में अब तक हुईं कुल मौतों की संख्या 71,412 है और 171,314 लोग घायल हैं। मरने वाले लोगों में 70% महिलाएं और बच्चे हैं।
दुनिया गोल
वेनेजुएला पर कब्जे के बाद ट्रंप अब लगातार पड़ोसी देशों पर दावा क्यों कर रहे हैं?
नई दिल्ली|
6 देशों पर ट्रंप की नजर
- ग्रीनलैंड: “यह अमेरिका के लिए रणनीतिक जरूरी है। हम इसे खरीद लेंगे या ले लेंगे।”
- पनामा कैनाल: “यह अमेरिका ने बनाया था, अब पनामा ने बहुत ज्यादा टैरिफ लगा दिया। हम इसे वापस ले सकते हैं।”
- कनाडा: “कनाडा 51वाँ राज्य बन सकता है। हम दोनों मिलकर मजबूत होंगे।”
- क्यूबा: “क्यूबा पर फिर से दबाव बढ़ाना होगा।”
- कोलंबिया: “कोलंबिया से ड्रग्स आ रहे हैं, हमें हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।”
- मैक्सिको: यहां पर भी ट्रंप ने ड्रग्स को संभावित हमले का आधार बनाया है।
ट्रंप ने पुरानी विदेश नीति की नई व्याख्या की
नए देशों पर दावे के पीछे के कारणों को समझिए
ऊर्जा सुरक्षा: वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर कब्जा करने के बाद ट्रंप अमेरिका को ऊर्जा आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। पनामा कैनाल पर कब्जा करने के पीछे उनकी नीयत अमेरिका के लिए तेल ट्रांसपोर्ट को सस्ता और सुरक्षित बनाने की है। चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना: चीन ने ग्रीनलैंड, पनामा और लैटिन अमेरिका में काफी बड़ी तादाद में निवेश किया है। ट्रंप इसे अमेरिकी हितों के खिलाफ मानते हैं और कहते हैं कि रूस और चीन उनके पड़ोसी नहीं हो सकते इसलिए उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए ये देश चाहिए।
चुनावी राजनीति: ट्रंप अपने वोटर बेस के सामने एक मजबूत अमेरिका का संदेश देना चाहते हैं, इस साल मध्यावधि (मिड-टर्म) चुनाव से पहले उनके ये कदम उन्हें अपने वोटर के बीच लोकप्रिय बनाए रखने में मददगार हो सकते हैं।
रूस और चीन के साथ तनाव: ईरान और वेनेजुएला पर दबाव बढ़ाने के साथ ट्रंप, रूस-चीन के प्रभाव को कम करना चाहते हैं।
दुनिया गोल
ट्रंप ने ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर लगाया 25% एक्स्ट्रा टैरिफ, चीन पर सबसे ज्यादा असर, भारत पर कितना फर्क पड़ेगा ?
- ईरान में महंगाई के विरोध में शुरू हुआ प्रदर्शन पूरे देश में फैला।
- 16 दिन से जारी प्रदर्शन में 648 मौतें, 5 दिन से इंटरनेट बंद।
- ट्रंप ने ईरान पर हमला करने की धमकी दी, फिर टैरिफ लगाया।
“तत्काल प्रभाव से ईरान से बिजनेस करने वाले किसी भी देश को अमेरिका के साथ सभी ट्रेड पर 25% टैरिफ देना होगा।”डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर ईरानी व्यापार पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की।
चीन पर सबसे ज्यादा असर: 90% ईरानी तेल का खरीददार
इस आदेश का सबसे बड़ा असर चीन पर होने जा रहा है क्योंकि वह ईरान के कुल तेल निर्यात का 90% से ज्यादा हिस्सा खरीदता है। इससे पहले ट्रंप वेनेजुएला पर नियंत्रण करके चीन को झटका दे चुके हैं क्योंकि चीन वेनेजुएला के तेल का बड़ा खरीददार था। 2025 में चीन ने ईरान से औसतन 1.3-1.5 मिलियन बैरल तेल प्रति दिन आयात किया, जो ब्रेंट क्रूड से $7-10 प्रति बैरल सस्ता है।
अमेरिका-चीन के बीच तनाव बढ़ेगा – पिछले साल अमेरिका-चीन के बीच टैरिफ युद्ध देखने को मिला था जब ट्रंप ने चीन पर सौ फीसदी से ज्यादा टैरिफ की घोषणा की थी, इसकी प्रतिक्रिया में चीन ने भी अमेरिका के ऊपर टैरिफ लगा दिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच बातचीत हुई और अभी चीन के ऊपर अमेरिका का करीब 34% टैरिफ है।
अमेरिकी दवाब में भारत पहले से कम ईरानी तेल खरीद रहा
चाबहार पोर्ट को लेकर दवाब बढ़ेगा – नए टैरिफ से ईरान स्थित चाबहार पोर्ट को लेकर भारत पर दवाब बढ़ सकता है, भारत ने इस प्रोजेक्ट पर $500 मिलियन का निवेश किया है। अमेरिका ने पिछले साल चाबहार पोर्ट के जरिए व्यापार किए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था, हालांकि बाद में प्रतिबंध हटाने की अवधि छह महीने के लिए बढ़ा दी गई। अब देखना होगा कि अमेरिका आगे चाबहार पोर्ट को लेकर क्या रुख रखता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत को वैकल्पिक स्रोत सऊदी, UAE से तेल लेना पड़ेगा।
इन देशों पर भी असर : UAE, तुर्की, EU
- ईरानी तेल के बड़े खरीददार में चीन के बाद UAE और तुर्की आते हैं, जो करीब 3-6% तेल खरीदते हैं।
- यूरोपीय संघ (EU) से जुड़े जर्मनी, इटली, नीदरलैंड्स जैसे देश ईरान से कृषि से जुड़े सामान, खाद्य पदार्थों, इंडस्ट्रियल उत्पादों का व्यापार करती हैं, हालांकि पहले से ईरान में जारी प्रतिबंधों के चलते इसकी संख्या घटती रही है, फिर भी नए टैरिफ के चलते इन देशों के अमेरिकी उत्पाद महंगे हो जाएंगे।

ईरान में विरोध प्रदर्शनों के दौरान बहुत बड़ी संख्या में लोग जुड़ रहे हैं जिनकी तस्वीरें इंटरनेट बैन के बावजूद ईरान से बाहर पहुंच रही हैं। (तस्वीर- साभार X)
ईरान में 16 दिनों से जारी प्रदर्शनों में अब तक 648 मौतें
ट्रंप ने कहा था- प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलीं तो हमला करेंगे

ईरान (प्रतीकात्मक फोटो)
पहले से खस्ता ईरानी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर

अयातुल्ला अली ख़ामेनेई, ईरानी सर्वोच्च नेता
चरम पर पहुंचे प्रदर्शन के बीच वार्ता को राजी सरकार
12 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरानी अधिकारियों ने उनके सामने बातचीत की पेशकश रखी है। दूसरी ओर, ईरानी मीडिया की ओर से कहा गया है कि ईरानी सरकार प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों के साथ वार्ता करना चाहती है, सरकार ने बातचीत की पेशकश की है।
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