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महिला आरक्षण पर क्यों छिड़ा उत्तर-दक्षिण विवाद? संसद में पहली बार क्यों गिरा केंद्र का संविधान संशोधन बिल?
नई दिल्ली | संसद के विशेष सत्र के दौरान लोकसभा में शुक्रवार को महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन प्रस्ताव गिर गया। यह प्रस्ताव संविधान में 131वें संशोधन के लिए लाया गया था।। ऐसा पहली बार हुआ कि मोदी सरकार की ओर से लाए गए किसी संविधान संशोधन विधेयक को पास नहीं कराया जा सका।
क्या है 2023 का महिला आरक्षण विधेयक
दरअसल, मोदी सरकार 2023 में महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) लायी जो सदन में सर्वसम्मति से पास हुआ।
पर सरकार ने इस विधेयक की अधिसूचना अब जाकर तीन साल बाद जारी की।
यानी तीन साल पहले पास हुआ महिला आरक्षण विधेयक अब कानून बनकर लागू हुआ है।
अब कानून बन चुके इस विधेयक के जरिए लोकसभा व विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण मिलना है। लेकिन इसमें जनगणना व परिसीमन की शर्त है।
आगे बढ़ने से पहले परिसीमन को समझ लें
परिसीमन का मतलब जनसंख्या के अनुपात में सीटों के बंटवारे से है, यह काम परिसीमन आयोग करता है। देश में अंतिम परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार 2008 में पूर्ण हुआ।
लेकिन इसमें सीटों की संख्या नहीं बढ़ाई गई सिर्फ सीटों (लोकसभा/राज्यसभा) की सीमा में आंतरिक बदलाव हुए।
देश में 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभी सीटों की संख्या को फ्रीज़ कर दिया गया है।
महिला आरक्षण विधेयक के किस बदलाव का विरोध हुआ?
सरकार इसी विधेयक में संशोधन का बिल लायी जो लोकसभा में गिर गया।
नए बदलाव के प्रस्ताव में केंद्र सरकार चाहती है कि मूल विधेयक से जुड़ी ‘जनगणना कराने के बाद परिसीमन होने’ की शर्त हटा ली जाए।
सरकार का तर्क है कि जनगणना में देरी होने से परिसीमन में देर लगेगी और इससे महिला आरक्षण लागू होने में देर होगी।
इसलिए सरकार नवीनतम उपलब्ध जनगणना (2011) के हिसाब से परिसीमन कराने का प्रस्ताव इस बिल मेें लायी।
15 साल पुरानी जनगणना पर सीटें बढ़ाना बना मुद्दा
इस संविधान संशोधन प्रस्ताव में कहा गया कि लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 कर दी जाएं और 2029 के आम चुनाव से इन सीटों पर 33% आरक्षण महिलाओं को दिया जाए।
इसी मुद्दे पर संशोधन विधेयक पर विपक्ष ने कड़ा विरोध किया।
विपक्ष ने विशेष संसद सत्र के दौरान सरकार पर आरोप लगाया कि “नए संशोधन के जरिए सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों में वृद्धि करना चाहती है जो दक्षिणी राज्यों के साथ भेदभावपूर्ण होगा क्योंकि इससे उनकी सीटें घट सकती हैं।”
ऐसा इसलिए माना जाता है क्योंकि दक्षिण के राज्य जनसंख्या नियंत्रण योजना को प्रभावी ढंग से लागू कर पाए हैं और वहां उत्तर के मुकाबले जनसंख्या वृद्धि कम है।
पीएम मोदी की गारंटी काम नहीं आई
हालांकि पीएम मोदी ने विपक्षी दलों को आश्वासन देते हुए कहा कि राज्यों की सीटों के अनुपात में कोई बदलाव नहीं होगा, यह उनकी गारंटी है।
इस पर विपक्षी गठबंधन विशेषकर कांग्रेस के सांसद ने गृहमंत्री अमित शाह से सदन में कहा कि वे ‘लिखित आश्वासन’ दें। हालांकि ऐसा नहीं हुआ।
हालांकि सरकार के आश्वासन पर सांसद अखिलेश यादव ने यहां तक कह दिया कि “सरकार के पिछले ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर हम उनके वादे पर यकीन नहीं कर पाएंगे।”
एक-तिहाई बहुमत नहीं मिलने से प्रस्ताव गिरा
आखिर में इस संशोधन प्रस्ताव पर वोटिंग हुई तो समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े, जबकि इस संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए एक-तिहाई यानी 352 वोटों की जरूरत थी।

