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दंगों की आंच में रोमांस | कविता

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दंगों के हालात में एक इंसान के तौर पर आपेक्षित संवेदनशीलता जब न दिखे तो एक कवि का मन किस तरह के सवाल उठाता है, ये कविता वैसे ही सवालों से श्रोता को घेर लेती है। दिल्ली दंगों का एक साल पूरा होने के मौके पर इस कविता को सुनिए। दिल्ली के विनोद श्रीवास्तव की इस कविता को आवाज दी है शिवांगी ने।

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।