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नवादा(बिहार) : जिला एवं सत्र न्यायाधीश शिल्पी सोनीराज की मौत, मौके पर पहुंची FSL टीम

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  • नवादा जिला व सत्र न्यायाधीश की अचानक मौत हुई।
  • सरकारी आवास में अचेत मिली, पोस्टमार्टम हो रहा।
  • शारीरिक रूप से स्वस्थ थीं, मौत के कारण स्पष्ट नहीं।

(नोटइस खबर को वीडियो पर देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

नवादा | अमन कुमार

नवादा सिविल कोर्ट की जिला व सत्र न्यायाधीश शिल्पी सोनीराज का आकस्मिक निधन हो गया है। मौत के कारणों का पता लगाने के लिए प्रारंभिक जांच शुरू कर दी गई है। दिवंगत न्यायाधीश के सरकारी आवास पर FSL की टीम पहुंचकर जांच कर रही है। उनके निधन से न्यायिक और प्रशासनिक गलियारों में शोक की लहर है। 53 साल की जिला व सत्र न्यायाधीश शिल्पी सोनीराज 6 जनवरी की सुबह अपने सरकारी आवास पर अचेत मिली। केयर टेकर उन्हें एक निजी अस्पताल ले गए जहां मृत घोषित किया गया। जज शिल्पी सोनीराज अविवाहित थीं और उनका परिवार भोजपुर जिले में रहता है।

जिला व सत्र न्यायाधीश शिल्पी सोनीराज

जिला व सत्र न्यायाधीश शिल्पी सोनीराज

बता दें कि जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District and Sessions Judge) किसी जिले का सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी होता है, जो दीवानी (Civil) और आपराधिक (Criminal) दोनों मामलों की सुनवाई करता है।

सरकारी वकील ने निधन की पुष्टि की

जिले के सरकारी वकील (Public Prosecutor) मनोज कुमार ने न्यायाधीश के निधन की पुष्टि की, लेकिन मौत के सटीक कारणों के बारे में अभी तक कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। एसपी अभिनव धीमान ने मौत के कारणों पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

7 फरवरी को जिला जज एवं सत्र न्यायाधीश को श्रद्धांजलि दी गई।

7 फरवरी को जिला जज एवं सत्र न्यायाधीश को श्रद्धांजलि दी गई।

उन्होंने मीडिया से कहा कि जज के शव का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है और फॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए हैं, ये दोनों रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के सही कारणों का पता लग सकेगा। उन्होंने District व Sessions Judge के सरकारी आवास के केयर टेकर के हवाले से बताया कि जज शिल्पी सोनीराज रात में चाय पीकर अपने कमरे में सोने गई थीं, सुबह करीब साढ़े पांच बजे उन्हें अचेत पाया गया।

सूचना पर पहुंचा जिला प्रशासन

बता दें कि District व Sessions Judge के निधन की सूचना मिलते ही नवादा के जिलाधिकारी रवि प्रकाश, पुलिस अधीक्षक अभिनव धीमान, एसडीओ अमित अनुराग और डीएसपी हुलास कुमार सहित कई अधिकारी और न्यायाधीश अस्पताल पहुंच गए थे।

एक टूर्नामेंट में की थी सार्वजनिक मौजूदगी

जिला न्यायाधीश शिल्पी सोनीराज बीती 25 जनवरी को आयोजित एक फ्रेंडली क्रिकेट टूर्नामेंट में सार्वजनिक रूप से मौजूद रही थीं। उन्हें जानने वाले लोग बताते हैं कि वे काफी स्वस्थ थीं इसलिए उनके असमय हुए देहांत पर न्यायिक प्रशासन से जुड़े लोग अचंभित हैं। गुरुवार को जिला अदालत परिसर में उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे।

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।

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जनहित में जारी

‘वंदे मातरम को गाना एक प्रोटोकॉल, इसे न गाने पर दंड का कोई प्रावधान नहीं’: सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट (साभार- इंटरनेट)
सुप्रीम कोर्ट (साभार- इंटरनेट)
  • याचिकाकर्ता का दावा था- ‘वंदे मातरम गाने के निर्देश सामाजिक दवाब बना सकते हैं।’

नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ गाने को एक प्रोटोकॉल बताते हुए कहा कि इसका पालन करना अनिवार्य नहीं है। वंदे मातरम न गाने पर किसी भी सज़ा का प्रावधान नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “अगर राष्ट्रगीत न गाने को लेकर किसी के ऊपर ऐक्शन होता है, तब हम इसे देखेंगे।”

यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश समेत तीन जजों की बेंच ने एक याचिका को खारिज कर दिया है।

यह याचिका हाल में राष्ट्रगान को लेकर गृहमंत्रालय की ओर से जारी हुए सर्कुलर के खिलाफ दायर की गई थी।

वंदे मातरम पर क्या है नया निर्देश

गौरतलब है कि गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को एक आदेश जारी किया था। जिसमें कहा गया था कि अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों या अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम’ बजाया जाएगा। इस दौरान हर व्यक्ति का खड़ा होना अनिवार्य होगा।

नए नियम में कहा गया था कि इसे राष्ट्रगान से पहले बजाया जाएगा। साथ ही, राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे, जिनकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकेंड है। अब तक मूल गीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे।

पब्लिक प्लेस के लिए यह निर्देश अनिवार्य नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सर्वोच्च अदालत ने बुधवार को अपने आदेश में कहा कि पब्लिक प्लेस और सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए जारी यह निर्देश अनिवार्य नहीं है।

CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने याचिका की सुनवाई की। बेंच ने कहा कि गृह मंत्रालय की एडवाइजरी में वंदेमातरम न गाने पर किसी भी तरह की सजा का प्रावधान नहीं है।

तीन जजों की बेंच ने कहा- “ये दिशानिर्देश केवल एक प्रोटोकॉल हैं और इनका पालन करना अनिवार्य नहीं है।”

जजों ने कहा कि “जब याचिकाकर्ता के खिलाफ राष्ट्रगान न गाने के लिए दंडात्मक कार्रवाई होगी, या फिर उनके लिए इसे गाना अनिवार्य किया जाएगा, तब हम इन सब बातों पर ध्यान देंगे।”

याचिकाकर्ता का दावा- ‘गाने को मजबूर किया जाएगा’

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले के याचिकाकर्ता मुहम्मद सईद नूरी नाम के एक व्यक्ति हैं जो एक स्कूल चलाते हैं।

उनकी ओर से वकील संजय हेगड़े ने पैरवी करते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा कि “भले ही राष्ट्रगीत गाने का नियम सलाहकारी हो लेकिन सामाजिक दवाब के कारण लोग मजबूर हो सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि सलाह (Advisory) की आड़ में लोगों को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है।”

‘अंदेशे पर ऐक्शन नहीं लेंगे, अगर भेदभाव हो तब आइए’

इस पर CJI ने कहा- “हमें वह नोटिस दिखाइए जिसमें आपको राष्ट्रगान बजाने के लिए मजबूर किया गया है।” साथ ही यह भी टिप्पणी की कि “आप एक स्कूल चलाते हैं, हमें यह भी नहीं पता कि वह मान्यता प्राप्त है या नहीं।”

जस्टिस बागची ने कहा कि यह सिर्फ एक दृष्टिकोण है और लोग इससे असहमत हो सकते हैं। अगर आपके खिलाफ कोई ऐक्शन होता है या नोटिस आता है, तो आप फिर से कोर्ट आ सकते हैं।” सुप्रीम कोर्ट के जजों ने याचिकाकर्ता से कहा कि “फिलहाल यह याचिका भेदभाव के एक अस्पष्ट अंदेशे के अलावा और कुछ नहीं है।”

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Passive Euthanasia: 13 साल कोमा में रहे हरीश राणा का ‘इच्छा मृत्यु’ के बाद हुआ अंतिम संस्कार

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दिल्ली में हरीश राणा के अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद लोग। (साभार - एक्स)
  • भारत में पैसिव यूथेनेशिया का पहला मामला, 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने दी थी अनुमति।

नई दिल्ली | 13 साल का लंबा इंतजार और दर्द अब शांत हो गया है। देश में पैसिव यूथेनेशिया यानी निक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति पाने वाले पहले शख्स हरीश राणा अब हमारे बीच नहीं रहे।

इच्छा मृत्यु को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद बीती 13 मार्च को 35 वर्षीय मरीज हरीश राणा को उनके घर से दिल्ली एम्स में भर्ती कराया गया था।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान हुआ था हादसा। (साभार – एक्स)

जहां दस दिनों तक 10 डॉक्टरों की निगरानी में हरीश का लाइफ सपोर्ट धीरे-धीरे हटाया गया। इस प्रक्रिया के जरिए हरीश को प्राकृतिक मौत के करीब पहुंचाया गया, फिर आखिरकार दस दिनों के बाद उन्होंने 24 मार्च को अंतिम सांस ली।

पीटीआई के मुताबिक, हरीश राणा के पार्थिव शरीर का 25 मार्च को दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में अंतिम संस्कार किया गया है।

हरीश राणा के निधन पर उनके परिवार ने उनकी कॉर्निया (आंखें), हार्ट वाल्व और अन्य अंगों को दान कर मानवता की एक अनूठी मिसाल पेश की है।

हरीश राणा के जन्मदिन पर केक काटते उनके मम्मी-पापा, बेटे की हालत देखकर इच्छा मृत्यु की लगाई थी गुहार (फाइल फोटो)

हरीश, गाजियाबाद के रहने वाले थे और पिछले 13 साल से बिस्तर पर जिंदा लाश की तरह पड़े रहे। 2013 में जब वे इंजीनियरिंग के छात्र थे तो हॉस्टल की चौथी मंजिल से नीचे गिरने के बाद उनका पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया था।

बेटे हरीश के अंतिम समय में उनके साथ मौजूद रहे माता-पिता। एम्स में ही उन्हें अलग कमरे में रखा गया, उनकी काउंसलिंग भी की गई। (साभार – एक्स)

इच्छामृत्यु से जुड़ा फैसला देने के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ के दो जज जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन भावुक हो गए थे।

फैसला देने से पहले वे दोनों ही मरीज हरीश राणा की मां निर्मला, पिता अशोक राणा से भी मिले और उनके दर्द को समझा था।

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जनहित में जारी

UCC Bill : उत्तराखंड के बाद गुजरात में लागू होगी समान नागरिक संहिता, विधेयक पास हुआ

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नई दिल्ली | गुजरात विधानसभा में मंगलवार को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) बिल पारित हुआ है। ऐसा करने वाला गुजरात, उत्तराखंड के बाद देश का दूसरा राज्य बन गया।

गौरतलब है कि पिछले साल उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता कानून लागू हो चुका है। गुजरात में पारित हुआ यह विधेयक निकट भविष्य में राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून बन जाएगा।

गुजरात विधानसभा में पास हो गया यह विधेयक।

गुजरात के यूसीसी बिल में शादी, तलाक, विरासत और लिव-इन रिलेशनशिप को एक ही कानूनी दायरे में लाने का प्रस्ताव है।

प्रस्तावित कानून का शीर्षक ‘गुजरात यूनिफॉर्म सिविल कोड- 2026’ है, पूरे राज्य में लागू होगा। साथ ही गुजरात की भौगोलिक सीमाओं के बाहर रहने वाले गुजरातियों पर भी लागू होगा।

यह बहुविवाह पर रोक लगाता है। साथ ही, यह कानून शादी और लिव-इन संबंधों, दोनों के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाता है।

हालांकि बिल के ये प्रावधान अनुसूचित जनजातियों (ST) पर लागू नहीं होंगे। उनकी पारंपरिक और संवैधानिक रूप से सुरक्षित प्रथाओं को इससे बाहर रखा गया है।

गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने मंगलवार को विधानसभा में यह विधेयक पेश किया जो सात घंटे की बहस के बाद पास हो गया।

इस विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने एक सप्ताह पहले राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।

यूसीसी बिल पास होने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए जनता को बधाई दी और इसे समानता सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक सुधार बताया।

जबकि विपक्षी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इस विधेयक का सदन में जोरदार विरोध करते हुए तर्क दिया कि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और मुस्लिम विरोधी है।

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