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चुनावी डायरी

बिहार चुनाव 2025: कहां चूके तेजस्वी यादव.. जमीन पर ‘वोट चोरी’ नहीं बना मुद्दा, ‘जंगल राज’ का जवाब नहीं ढूंढ़ सके

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पटना |

बिहार चुनाव 2025 का नतीजा फिलहाल तेजी से साफ़ हो रहा है और ये रुझान महागठबंधन के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। गिनती जारी है, माहौल गर्म है, हर पार्टी अपनी-अपनी उम्मीदों से चिपकी बैठी है… लेकिन आंकड़ों की तस्वीर यह बता रही है कि महागठबंधन वह असर नहीं छोड़ पाया, जिसकी उसे उम्मीद थी। NDA बिहार में सूपड़ा साफ करने की तैयारी में है।

ऐसे में बड़ा सवाल उठता है- आख़िर महागठबंधन के सीएम चेहरे तेजस्वी यादव कहां पर चूक गए?

आइए समझते हैं महागठबंधन की हार के वो पांच बड़े कारण, जिन्होंने पूरी बाज़ी पलट दी।

1. नेतृत्व की अस्पष्टता और साझेदारों में तालमेल की कमी

  • महागठबंधन की सबसे बड़ी दिक्कत यह रही कि शुरुआत से ही गठबंधन एकजुट नज़र नहीं आया।
  • सीट शेयरिंग, सीएम चेहरे की घोषणा, प्रचार रणनीति—हर जगह खींचतान दिखी। तेजस्वी अकेले सब संभालते दिखे।
  • तेजस्वी यादव ने खूब प्रचार किया, लेकिन साझेदार पार्टियों को विश्वास में लेने की कोशिश कमजोर पड़ गई।
  • मतदाता ने साफ महसूस किया कि यह गठबंधन अंदर से कमजोर है और हर दल अपनी-अपनी लाइन चल रहा है।

2. महिला व युवाओं पर घोषणाएं काम नहीं आईं

बिहार के ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में नया वोटर उभर रहा था –

1. महिलाएँ
2. पहली बार वोट करने वाले युवा
3. गैर-परंपरागत जातीय समूह

  • राजद ने काफी पहले घोषणा कर दी थी कि सत्ता में आने पर वे महिलाओं को सहायता राशि देंगे। इसके काउंटर के तौर पर NDA सरकार मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना ले आई जिससे महिलाओं के खातों में 10 हजार रुपये की राशि ठीक चुनाव से पहले व चुनाव के दौरान भी गई।
  • दूसरी ओर, तेजस्वी यादव ने घोषणा की कि सरकार बनाने के 20 दिन के भीतर वे हर परिवार को सरकारी नौकरी देंगे। पर इस चुनावी वादे का कोई स्पष्ट रोडमैप वे नहीं रख पाए, जिसके चलते युवाओं ने उन पर विश्वास नहीं किया।
  • हालांकि यह भी गौर करने वाली बात है कि महिलाओं से उलट युवा वोटरों को जाति से हटकर नहीं देखा जा सकता है।

3. कांग्रेस बना कमजोर कड़ी, गुटबाजी ने नुकसान 

  • कांग्रेस ने बीते सितंबर में वोटर अधिकार यात्रा निकालकर माहौल बनाया पर फिर राहुल गांधी छठ के बाद बिहार लौटे। इस अवधि में कांग्रेस जमीन से गायब दिख रही थी।
  • टिकट वितरण को लेकर कांग्रेस में ही विवाद हो गया। कई सीटों पर गलत उम्मीदवार और सहयोगियों के साथ ही फाइट से स्थिति बिगड़ी।

 

4. ‘वोट चोरी’ का मुद्दा नहीं चला, जंगल राज का काउंटर नहीं दे सके 

महागठबंधन ने वोट चोरी को प्रमुख मुद्दा बनाया जिसका ग्राउंड पर कोई असर नहीं दिखा। इसके अलावा, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा जैसे मुद्दे उठाए पर NDA के जंगल राज के आरोप का राजद कोई काउंटर नहीं कर सकी।

पीएम मोदी और नीतीश कुमार ने अपने हर भाषण में बिहार के युवाओं को जंगल राज की याद दिलाई।

 

5. उम्मीदवार चयन, बूथ प्रबंधन और ग्राउंड टीम की कमजोरी

कई सीटों पर महागठबंधन ने ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया जिन्हें जनता जानती भी नहीं थी।
जहां मजबूत प्रत्याशी होने चाहिए थे, वहां नए चेहरे उतारे गए।

बूथ प्रबंधन भी कई जगह बिखरा रहा—

1. राजद के पुराने किले भी इस बार कमजोर पड़े
2. संगठन चुनावी मोड में देर से आया
3. स्थानीय नाराजगी को समझने में देरी हुई

जिसका सीधा फायदा एनडीए को मिला।

यह हार सिर्फ गणित की नहीं, तैयारी की हार है

महागठबंधन हार इसलिए नहीं रहा कि सीटें कम मिल रही हैं – वह इसलिए हार रहा है क्योंकि उसकी रणनीति, नेतृत्व, संगठन और नैरेटिव—चारों जगह बड़ी चूकें हुईं।

 

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