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चुनावी डायरी

चुनाव लड़ने को RJD छोड़कर JDU से जुड़ गए रजौली विधायक को जेल जाना होगा

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  • रजौली विधानसभा सीट से राजद से सिटिंग विधायक थे प्रकाशवीर।
  • 20 साल पहले आचार संहिता तोड़ने के मामले में 7 साल की सजा।
  • सजा के खिलाफ अपील की पर विशेष कोर्ट ने सजा बरकरार रखी।

नवादा | अमन कुमार

बीस साल पहले चुनाव के दौरान आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले पूर्व विधायक प्रकाश वीर को जेल जाना होगा। बिहार के नवादा में कोर्ट ने आदेश जारी करके पूर्व विधायक प्रकाश वीर को एक सप्ताह में कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है। प्रकाश वीर ने हाल में रजौली सीट से विधायकी के इस्तीफा देकर जदयू को ज्वाइन किया था और टिकट मिलने के इंतजार में थे। इस बीच एमपी-एमएलए की स्पेशल कोर्ट ने अपना आदेश जारी कर दिया है जो विधायक के लिए बड़ा झटका है।

तृतीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह एमपी-एमएलए स्पेशल सेशन कोर्ट के न्यायाधीश सुभाषचंद्र शर्मा की अदालत ने बुधवार को प्रकाशवीर की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने पूर्व विधायक को सात दिनों के भीतर एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट सह प्रथम अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है।

यह मामला रजौली थाना कांड संख्या–111/2005 से जुड़ा है। पूर्व विधायक प्रकाशवीर पर वर्ष 2005 में आचार संहिता उल्लंघन का आरोप लगा था। इस मामले में एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट सह प्रथम अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने 29 जुलाई 2022 को उन्हें छह माह का साधारण कारावास तथा एक हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई थी।

इस आदेश के खिलाफ प्रकाशवीर ने वर्ष 2022 में अपील संख्या–16/22 के रूप में जिला एवं सत्र न्यायालय में चुनौती दी थी। मामले की लंबी सुनवाई के बाद बुधवार को अदालत ने उनके खिलाफ पारित निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया और अपील को खारिज कर दिया।

अपर लोक अभियोजक अजीत कुमार ने अदालत में अभियोजन पक्ष का पक्ष मजबूती से रखा। अदालत ने यह माना कि अभियुक्त के खिलाफ लगाए गए आरोप साक्ष्यों से प्रमाणित होते हैं।

अदालत के इस आदेश से पूर्व विधायक प्रकाशवीर की मुश्किलें बढ़ गई हैं। अब उन्हें सात दिनों के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण करना होगा, अन्यथा गिरफ्तारी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है कि पूर्व विधायक को अब कानूनी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।

यह फैसला एक बार फिर इस बात की पुष्टि करता है कि जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में कानून सबके लिए समान है और आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों को न्यायपालिका गंभीरता से लेती है।

बोलते पन्ने.. एक कोशिश है क्लिष्ट सूचनाओं से जनहित की जानकारियां निकालकर हिन्दी के दर्शकों की आवाज बनने का। सरकारी कागजों के गुलाबी मौसम से लेकर जमीन की काली हकीकत की बात भी होगी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए। साथ ही, बोलते पन्ने जरिए बनेगा .. आपकी उन भावनाओं को आवाज देने का, जो अक्सर डायरी के पन्नों में दबी रह जाती हैं।

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